वधू मूल्य
बरसात के बादल उस दिन जैसे आसमान में ठहरे हुए थे। हवा में हल्की नमी थी और आँगन में तुलसी के पास खड़ी करुणा बार-बार घर के अंदर और बाहर झांक रही थी। उसके हाथ में दीवार से उतारा गया कैलेंडर था, जिसमें उसने लाल पेन से सावन की पूर्णिमा के दिन पर गोला बना रखा था—राखी।
उसकी आँखों में हल्की चमक थी, लेकिन उस चमक के पीछे एक अनकही बेचैनी भी थी।
“इस बार तो जाना ही है…” उसने धीरे से खुद से कहा और अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया। हल्की पीली सूती साड़ी, जिसमें नीले फूल बने थे, उसके गोरे चेहरे पर सादगी की परछाईं डाल रही थी। माथे पर छोटी सी बिंदी और आँखों में उम्मीद का धुंधलका।
तभी पीछे से सास की आवाज़ आई—
“क्यों जी, क्या देख रही हो इतनी देर से कैलेंडर में?”
करुणा चौंक गई। जल्दी से कैलेंडर को दीवार पर टांगते हुए बोली—
“कुछ नहीं मम्मी जी… बस ऐसे ही।”
सास ने तीखी नजरों से उसे देखा। उनकी रेशमी साड़ी का किनारा फर्श पर घिसटता हुआ चल रहा था, जैसे हर कदम के साथ कोई अहंकार भी खिंच रहा हो।
“ऐसे ही कुछ नहीं होता… जरूर मायके जाने की सोच रही होगी!”
करुणा के होंठ सूख गए। उसने धीमे स्वर में कहा—
“राखी है न मम्मी जी… सोचा था… अगर आप लोग इजाजत दें तो…”
बात पूरी होने से पहले ही सास का चेहरा कसैला हो गया।
“हर त्योहार पर मायके जाने का शौक है तो शादी क्यों की थी? यहाँ की जिम्मेदारियाँ कौन निभाएगा?”
करुणा की आँखें झुक गईं। मन के भीतर जैसे कोई टीस उठी—“जिम्मेदारी? क्या सिर्फ यही है मेरा अस्तित्व?”
उसे याद आया—पिछले एक साल में कितने त्योहार आए और चले गए। होली की दूज, दीवाली की दूज… हर बार भाई का फोन आता—
“दीदी, आ जाओ न… हम लेने आ जाएँ?”
और हर बार ससुराल से साफ मना।
“अभी काम है… बाद में देखेंगे…”
“तबियत ठीक नहीं है…”
“घर में मेहमान हैं…”
बहाने बदलते रहे, लेकिन सच्चाई वही रही—उसे मायके जाने नहीं दिया गया।
करुणा के मन में अतीत की परतें खुलने लगीं।
जब मौसी रिश्ता लेकर आई थीं, तो घर में जैसे खुशियों का सैलाब आ गया था।
“लड़का बहुत अच्छा है… करोड़ों की प्रॉपर्टी… ठेकेदारी करता है… नौकर-चाकर सब हैं…”
मौसी के चेहरे पर गर्व था।
पापा ने चश्मा ठीक करते हुए धीरे से पूछा था—
“कोई मांग तो नहीं है?”
“अरे नहीं-नहीं! उन्हें बस अच्छे घर की लड़की चाहिए।”
लेकिन उसी दिन बाद में मौसी ने मम्मी से धीरे से पूछा था—
“फलदान में कार तो देंगे न?”
मम्मी के चेहरे का रंग उड़ गया था। पापा ने जब वरुण के पापा को फोन किया, तो उधर से हँसी आई—
“हमने कब कहा? आपकी साली की इच्छा होगी…”
उस हँसी में छिपा अर्थ पापा समझ गए थे, लेकिन उन्होंने चुप्पी ओढ़ ली।
शादी बड़े धूमधाम से हुई। करुणा लाल बनारसी साड़ी में सजी थी, हाथों में मेहंदी, आँखों में सपने। वरुण सचमुच किसी फिल्मी हीरो जैसा लग रहा था—गोरा रंग, लंबा कद, सूट में सजा हुआ।
लेकिन वह चमक, वह आकर्षण… सब जैसे शादी के बाद धीरे-धीरे धुंधला गया।
तीन महीने बीतते न बीतते सास ने सीधे कहना शुरू कर दिया—
“अपने बाप से कहो, कम से कम एक कार तो दे दें। क्या दस लाख में ही पिंड छुड़ाना चाहते हैं?”
करुणा के चेहरे पर अपमान की लकीरें उभर आईं। उसने हिम्मत करके वरुण से कहा—
“आप कुछ कहते क्यों नहीं?”
वरुण ने मोबाइल से नजर हटाए बिना कहा—
“माँ-बाप की इच्छा होती है… तुम समझा करो।”
उसके शब्दों में न कोई अपनापन था, न जिम्मेदारी।
एक दिन बात इतनी बढ़ गई कि ससुर गुस्से में चिल्ला उठे—
“लगता है वरुण को तलाक दिलाना पड़ेगा!”
करुणा के हाथ काँपने लगे। वह जैसे पत्थर हो गई। उस रात उसने मम्मी को फोन किया, रोते-रोते सब बताया।
दो दिन बाद पापा आ गए। उनकी सफेद शर्ट पसीने से भीगी हुई थी, चेहरे पर थकान और आँखों में चिंता।
ससुर का लहजा उस दिन ठंडा था, लेकिन शब्द चुभने वाले—
“आपने हमारी हैसियत के हिसाब से शादी नहीं की… अब कार दे दीजिए, समझिए बेटी का हिस्सा दे रहे हैं।”
पापा के होंठ काँप गए।
“हम… हम गाँव की खेती बेच देंगे…”
करुणा ने देखा—उसके पिता, जो हमेशा उसके लिए पहाड़ जैसे मजबूत थे, आज कितने छोटे लग रहे थे।
कुछ दिनों बाद सात लाख रुपए दे दिए गए। पापा ने हाथ जोड़ते हुए कहा—
“बस अब और मत कहिए…”
कुछ दिन शांति रही। घर में व्यवहार थोड़ा नरम हुआ। लेकिन वह सुकून ज्यादा दिन टिक नहीं पाया।
एक सुबह सास ने ताना मारा—
“बाँझ लड़की पल्ले बाँध दी… एक साल हो गया, अभी तक कोई खबर नहीं!”
करुणा के हाथ से चाय का कप गिरते-गिरते बचा। उसका चेहरा पीला पड़ गया।
“मैं क्या कहूँ? किससे कहूँ?”
उसके मन में चीख उठी।
वरुण महीने में कभी-कभार ही उसके पास आता था। वह भी जैसे कोई औपचारिकता निभा रहा हो।
उस रात करुणा आईने के सामने खड़ी थी। उसने खुद को देखा—
सिंदूर, चूड़ियाँ, बिछिया… सब कुछ था।
बस एक चीज़ नहीं थी—सम्मान।
राखी का दिन नजदीक आ रहा था।
उस रात करुणा छत पर खड़ी थी। हवा में ठंडक थी, लेकिन उसके मन में आग जल रही थी।
“कब तक सहूँगी?”
“क्या मैं सिर्फ दहेज चुकाने के लिए लाई गई हूँ?”
“क्या मेरा कोई अस्तित्व नहीं?”
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उनमें कमजोरी नहीं, दृढ़ता थी।
अगली सुबह उसने सास के सामने सीधा कहा—
“मम्मी जी, मैं राखी पर मायके जाऊँगी।”
सास ने तमतमाकर कहा—
“हमसे पूछे बिना?”
करुणा ने पहली बार आँख उठाकर देखा—
“मैं पूछ नहीं रही… बता रही हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
ससुर अखबार से नजर उठाकर उसे देखने लगे। वरुण भी हैरान था।
“बहुत हिम्मत आ गई है तुममें!” ससुर गरजे।
करुणा ने शांत स्वर में कहा—
“हिम्मत नहीं… समझ आ गई है। मैंने वधू मूल्य चुका दिया है… अब सम्मान चाहिए।”
उसके शब्द धीमे थे, लेकिन हर अक्षर जैसे पत्थर की तरह गिर रहा था।
“अगर मुझे रोका गया… या फिर से दहेज के लिए दबाव डाला गया… तो मुझे कानून का सहारा लेना पड़ेगा।”
सास के चेहरे का रंग उड़ गया।
“धमकी दे रही है?”
“नहीं… अपने अधिकार की बात कर रही हूँ।”
उस दिन करुणा ने पहली बार अपने भीतर एक अजीब सी शांति महसूस की।
राखी के दिन वह मायके पहुँची। उसके भाई ने दरवाजे पर ही उसे गले लगा लिया।
“दीदी… इस बार सच में आ गई!”
करुणा की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार वे खुशी के थे।
उसने राखी बाँधी, माथे पर टीका लगाया। पापा दूर खड़े मुस्कुरा रहे थे, लेकिन उनकी आँखें भीग चुकी थीं।
करुणा ने मन ही मन सोचा—
“अब मैं सिर्फ बेटी या बहू नहीं… एक इंसान हूँ। और अब मैं अपने लिए जीना सीखूँगी।”
आसमान में बादल छंट रहे थे। धूप की हल्की किरणें धरती पर उतर रही थीं—जैसे करुणा के जीवन में एक नई शुरुआत हो रही थी!
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