Shahad ki Gudiya - 68 in Hindi Love Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (68)

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (68)

                  शहद की गुड़िया- प्रकरण  68

       " दादू के पिताजी ऊस वक़्त 80 प्लस हो गये थे. फिर भी उन्हें खाने का और घूमने का बड़ा शौक था."

       " उन की यही फिलसूफ़ी थी."

       " खाकर भी मरना हैं, नहीं खाकर भी मरना हैं. फिर खाकर क्यों नहीं मरना? "

        " वह जो भी मन में आये  खाते रहते थे.. जहाँ मन चाहा वहाँ जाते थे.. वह एसिडिटी के मरीज थे फिर भी खाने पीने में क़ोई परहेज रखना जरूरी नहीं मानते थे."

        "आम का रस उन के लिये खतरा था. फिर भी वह उस से दूर नहीं रह पाते थे.. अपनी  तकलीफो को बढ़ावा देते थे. साथ में हमें भी तकलीफ देते थे."

         " एक रात डोक्टर के मना करने पर वह लड़की के घर आमरस खाकर आये थे. उन कोई एसिडिटी हो गई थी. रात को दो बजे अस्पताल में जाने की जिद पकड़ी थी. उन्होंने पेट भर के आमरस खाया था. जो हजम नहीं हुआ था और उन्हें बार बार टोयलेट जाना पड़ता था. ऊस वजह से कपड़े भी गंदे हो गये थे. "

      " पिछली उम्र में उस का स्वभाव विचित्र हो गया था. बर्दास्त शक्ति भी क्षीण हो गई थी, फिर भी अपने आप को बदलने को तैयार नहीं थे."

      " उन का एक हीं गुरु मंत्र बन गया था जिसे वह बार बार दोहराते रहते थे :"

        " चित्त तु क्यों चिंता करता हैं कृष्ण को जो करना हैं वह करने दे. "

         " इस गुरु मंत्र की मदद लेकर वह अपनी मन मानी करते थे."

         " गीता बहन थे तब तक दादू को उन की क़ोई फ़िक्र नहीं थी. लेकिन उन के जाने के बाद पिताजी में काफ़ी बदलाव आ गया था."

       " भागवत गीता में उन्हें विशेष श्रद्धा थी.. वह हर जगह कहीं भी जाते थे तो यह पुस्तिका अपने साथ रखते थे."

        " अपना खुद का कह सके वैसा क़ोई नहीं था, फिर भी उन्हों ने मामा बुआ के संतानो के साथ सगे व्यकित से भी ज्यादा घनिष्ट रिश्ता निभाया था. हर क़ोई उन का ख्याल रखता था, मान देता था. "

        " उन के लडके लड़की पिताजी को मान देते थे लेकिन उन की पीढ़ियों को यह रिश्ते में क़ोई दिलचस्पी थी. "

        "फिर भी वह सब को मान देते थे, उन की कद्र भी करते थे."

        "  एक बार पिताजी बिना बताये बुआ के घर पहुंच गये थे. और वहाँ बीमार पड़ गये थे. उस वक़्त बुआ का लडका  उन्हें छोड़ने मुंबई आया था. इस बात से वह खफा हो गये थे औऱ साथ में घर की सारी फौज लेकर उसे मुंबई छोड़ने आ गये थे.  एक दादू के परिवार के साथ रहे थे. उन के घर खाना पीना किया था. पूरा मुंबई घूमे थे ऊपर से ताना मार गये थे."

        " अपने पिताजी का ख्याल रखो. उन्हें अकेले कहाँ मत भेजो.  हमे नाहक में दौड़कर मुंबई आना पडा हैं. "

       " उन को आना पड़ा था. वह सही था."

        " लेकिन फ़ौज लेकर आने की क्या जरूरत थी?"

        " दादू के पिताजी केवल दो दिन रहे थे बदले में चार आदमी एक हप्ता उन के घर रह गये थे. और पूरी वसूली कर गये थे. "

        " तब से दादू ने अपने पिताजी को सख्त शब्दों में चेतावनी दे दी थी."

         " अब से आप अकेले कहीं नहीं जाओगे. "

        "  और उन्हों ने जाना बंद कर दिया था."

         " लेकिन दादू ने बीवी बच्चों के साथ श्री नाथजी, अम्बाजी यात्रा का कार्यक्रम बनाया था. उन के पिताजी को बस का प्रवास रास नहीं आता था. इस लिये उन्हें ना तो  पूछा था, ना तो उन के लिये टिकिट बुक किया था."

       " उन को ना ले जाने के पीछे और एक वजह थी.. उन का दिमाग़ ख़राब हो गया था. वह बात बात में दादू, बेटे की बहुत और बच्चों से बात बात में भीड़ते रहते थे. जो मन में आये वह बोलते रहते थे. बेकार में संभाषण देते थे. उन को नीचा दिखाने की क़ोई कोशिश  छोड़ते नहीं थे..उस वजह से घर में सदैव कलह कंकाश का माहौल छाया रहता था. "

       "  दादू ने जाने से पहले उन को कार्यक्रम के बारे में बताया था और उन्हें कुछ दिन भाविका के घर में रहने की बात की थी. वह उस के लिये तैयार भी हो गये थे."

       " घर से निकलते समय दादू ने उन्हें खर्च के लिये कुछ पैसे भी दिये थे. तब उन्हों ने धीमी आवाज में दादू को कहां था. "

        " शायद मैं बाहर गांव जाऊंगा. "

         " दादू ऊस वक़्त  कुछ नहीं बोले थे. "

         " उन्होंने सोचा था. वह जा जाकर जाकर कहाँ जायेगे. सुरत में उन का  लंगोटिया यार रहता था.

          " सब लोग साथ में घर से निकले थे.

          दादू के परिवार कोई बोरिवली से बस पकड़नी थी. इस लिये सीधी रिक्शा पकड़ ली थी. और वह चलकर स्टेशन पहुंचे थे. "

         "वह अपने बेटे के परिवार के साथ आना चाहते थे. लेकिन दादू ने उन को एक बार भी पूछा नहीं था. उस बात से वह नाराज थे. फिर भी उन्हों ने कुछ नहीं कहां था. लेकिन मानो दादू के परिवार को उन की हाय लग गई थी.  "

        "'दादू उन के परिवार को लेकर समय से आधे घंटे पहले बस डिपो पहुंच गये थे. "

        " पहुंचते हीं उन्हें मनहूस खबर मिली थी."

        " श्री नाथजी जाने वाली बस मुंबई आते समय रास्ते बिगड  गई थी. "

         " रिफंड तो मिल गया था."

        "  लेकिन सब का मूड ख़राब हो गया था."

         " छुट्टी के दिन थे. ट्रैन में जाने का क़ोई चांस नहीं था."

           " सब का मूड ख़राब हो गया था. जाने के लिये कोई विकल्प नहीं बचा था. खाजगी मेटाडोर या टेक्सी का पैसा अफॉर्ड कर नहीं सकते थे. दूसरी बस भी उपलब्ध नहीं थी. "

              " दादू ऊस वक़्त गिल्ट महसूस कर रहे थे. अपने पिताजी को साथ नहीं ले गये तो भगवान ने उन कोई ऐसा सिला दिया था. दादू के कहने पर ऊस के पिताजी बेटी के घर रवाना हुए थे. "

        लेकिन उस वक़्त भगवान ने उन की लाज रखी थी.

        " एक एम्बुलेंस उन के पास आकर रुक गई थी."

   .    " ड्राइवर ने उन्हें सवाल किया था.  कहाँ जाना है?

                       00000000000  ( क्रमशः)