Pyar ki Paribhasha - 6 in Hindi Love Stories by Rishav raj books and stories PDF | प्यार की परीभाषा - 6

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प्यार की परीभाषा - 6

मंदिर वाली मुलाकात के बाद चीज़ें उम्मीद से ज़्यादा जल्दी आगे बढ़ गईं। दोनों परिवारों के बीच दो-तीन बार बात हुई, और आखिरकार बिना किसी ज्यादा बहस या दिखावे के शादी की तारीख तय हो गई—अगले महीने की एक साधारण सी सुबह, उसी मंदिर में। 

तुषार रोज़ की तरह चुपचाप उठा और बाथरूम की तरफ चला गया ठंडे पानी से मुँह धोते हुए भी दिमाग में वही बातें घूम रही थीं—शादी, जिम्मेदारियाँ, और एक अजीब सा खालीपन बाथरुम उसके कमरे में ही अटैच था 

जब वह बाहर हॉल में आया, तो माहौल थोड़ा अलग था
पायल सोफे पर बैठी थी, चेहरा सख्त, आँखों में साफ़ गुस्सा। महेश पास ही कुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। सुशीला नाश्ता बना रही थीं

तुषार धीरे से जाकर अपने पिता के पास बैठ गया,

तुषार - मम्मी, एक कॉफी दे देना 

उसकी आवाज़ हमेशा की तरह धीमी थी लेकिन जैसे ही उसने बैठना खत्म किया, पायल अचानक उठकर उसके सामने आकर खड़ी हो गई

“क्या ज़रूरत थी इस रिश्ते को हँ कहने की?” उसकी आवाज़ में गुस्सा खुलकर था, “तुमने उसे ठीक से देखा भी था? होश में थे? प्लीज़ ये सब रोक दो , लोग हँसेंगे हम पर”

कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया अगले ही सेकंड अख़बार ज़ोर से टी टेबल पर पटकने की आवाज आई

“चुप हो जाओ पायल! तुम होश में भी हो” महेश की आवाज़ गूँज उठी

पायल एक पल को चुप हुई, लेकिन पीछे नहीं हटी
तभी किचन से सुशीला बाहर आईं उनके हाथ में करछी थी, लेकिन आवाज़ बिल्कुल ठंडी और साफ़ थी, “वो छोटी है, पर गलत नहीं है ज़रा रिश्तेदारों के बारे में भी सोचिए लोग क्या कहेंगे? और तुषार का क्या? क्या वो उसे लेकर कहीं जा पाएगा गर्व से अपनी पत्नी कह पाएगा?”

तुषार की उँगलियाँ आपस में कस गईं, लेकिन उसने सिर नहीं उठाया

महेश ने तुरंत उसकी तरफ देखा, आवाज़ धीमी कर ली, “तुषार… तुम्हें रवीना से दिक्कत  है?”

सवाल सीधा था तुषार ने बिना सोचे सिर हिलाया, “नहीं, पापा मुझे घिन नहीं आती मैं—”

“बस,” महेश ने बीच में ही रोक दिया उन्होंने कुर्सी से उठते हुए साफ़ आवाज़ में कहा, “बात खत्म शादी होगी”

कमरे में कोई कुछ नहीं बोला

“अब सब लोग तैयारी पर ध्यान देंगे,” महेश ने आगे कहा, “रीति रिवाज के हिसाब से सोने की चैन और कपड़े हम लेंगे बाकी बात मैं रवीना के पिता से कर लूंगा जल्दी ही हम लोग उनके परिवार के साथ खरीदारी के लिए जाएंगे तैयार रहना”

उनकी आवाज़ में ऐसा ठहराव था कि कोई बहस की जगह ही नहीं बची इतना कहकर वो कमरे से बाहर चले गए।

पायल ने झुंझलाकर सोफे पर बैठते हुए मोबाइल उठा लिया, “देख लेना बाद में मत कहना ”

सुशीला बिना कुछ बोले वापस किचन में चली गईं, लेकिन उनके चेहरे पर असहमति साफ़ थी तुषार वहीं बैठा रहा
कॉफी उसके सामने रखी थी, लेकिन उसने हाथ नहीं लगाया उसके दिमाग में ना पायल की बातें गूंज रही थीं, ना माँ की बस एक सवाल अटका हुआ था क्या वो सच में इस रिश्ते को निभा पाएगा?



उधर रवीना के घर में भी उसी दिन तारीख की बात पक्की हो चुकी थी सरोज पहली बार इतने समय बाद थोड़ी संतुष्ट दिख रही थीं, “कम से कम बिना ज्यादा खर्च के शादी हो जाएगी।”

काजल भी खुश थी,

काजल - और लड़का भी ठीक लगता है

रवीना चुपचाप सब सुन रही थी उसने ना खुशी जताई, ना डर बस अंदर ही अंदर खुद को समझा रही थी ये कोई सपना नहीं है ये बस एक और जिम्मेदारी है

शाम को जब माही आई, तो उसने रवीना के चेहरे को गौर से देखा, और मुस्कुरा दी दोनों रावीना के कमरे में गए 

माही - डर लग रहा है?

रवीना ने हल्की सी मुस्कान दी, “पता नहीं बस अजीब लग रहा है”

माही ने उसके कंधे पर हाथ रखा, “अजीब चीज़ें ही  कभी-कभी सही निकलती हैं तु ज्यादा सोच मत वैसे लड़का कैसा है”
रवीना - छः फीट हाइट है, बड़ा बेटा है घर का , handsome भी है ☺️

माही खुशी में उसके गालों को किस कर देती है 

माही - देखो तो खुश कितनी है 

रवीना उसे फोटो दिखाती है 
माही - ये तो वही है ओ हो 
रवीना ने कुछ नहीं कहा लेकिन इस बार उसने पहली बार पूरी तरह निराश भी महसूस नहीं किया शायद इसलिए क्योंकि सामने वाला भी उसके जैसा ही था

माही - सादी के बाद मुझे तो तुम भुल ही जाओगी लेकिन कम से कम मैसेज भी कर देना 😚

 ये सुनकर मीनाक्षी ने अपनी आँखें घुमाईं

"अब आँखें मत घुमाओ; इसे अपने पति के लिए बचाकर रखो वह तुम्हें इसके ढेरों मौके देगा," हेमा ने कहा। यह सुनकर मीनाक्षी के गाल शर्म से लाल हो गए और उसने वहाँ से भागने की कोशिश की, लेकिन हेमा ने अचानक गंभीर होते हुए उसे रोक लिया

माही - अब ध्यान से सुनो मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम बीजी  हो या  रोज़ मुझे फ़ोन करना भूल जाती हो लेकिन अगर कभी कुछ भी गड़बड़ होती है, तो तुम मुझे फ़ोन करोगी। तुम्हारी माँ शायद तुम्हारी बात न सुनें, लेकिन तुम्हारे पास तुम्हारे पिता, कीर्ति और मैं तो हैं ही। मैं किसी भी समय तुम्हारे लिए मौजूद रहूँगी। क्या तुम समझी?

माही ने बहुत ही गंभीरता से कहा, और रवीना अपनी दोस्त की इस फ़िक्र से भावुक होकर मुस्कुराई और अपना सिर हिला दिया 

अगला हफ्ता जैसे भागते-भागते निकल गया। तारीख पास आ रही थी और दोनों घरों में अपने-अपने तरीके से तैयारी चल रही थी। तय दिन पर दोनों परिवार शहर के एक बड़े कपड़ों के शोरूम में मिले।

दुकान के अंदर हल्की-सी भीड़ थी, चारों तरफ रंग-बिरंगी साड़ियाँ और कपड़े सजे हुए थे तुषार थोड़ा किनारे खड़ा था, बीच-बीच में अपने चश्मे को ठीक करता हुआ, जैसे खुद को किसी काम में व्यस्त दिखाने की कोशिश कर रहा हो। उधर सुशीला और पायल अपने लिए कपड़े देखने में लगी थीं, दोनों के चेहरे पर वही चुनींदा नापसंदगी वाली गंभीरता।

पास ही सरोज और रवीना के पिता साड़ियों के ढेर में से एक-एक निकालकर देख रहे थे। रवीना उनके साथ खड़ी थी, लेकिन उसका ध्यान बार-बार अनजाने में तुषार की तरफ चला जाता। हर बार वह जल्दी से नज़र हटा लेती, जैसे खुद को पकड़ लिया हो।

सरोज ने एक पीली सिल्क की साड़ी उठाकर रवीना के कंधे पर रख दी, “ये देख, शादी के लिए ठीक रहेगी।”

रवीना ने आईने में खुद को देखा वह कुछ बोलती उससे पहले ही, थोड़ी दूरी पर खड़े तुषार की नज़र उस पर पड़ी और इस बार वह एक पल ज़्यादा ठहर गई शायद बिना सोचे।

रवीना ने भी उसे देख लिया तुषार तुरंत संभल गया उसने नजरें हटा लीं और जेब से मोबाइल निकालकर स्क्रीन पर देखने लगा, जैसे बहुत जरूरी काम हो।

रवीना ने धीरे से साड़ी उतार दी, लेकिन उसके चेहरे पर एक हल्की-सी अनकही झिझक रह गई कुछ देर बाद जब रवीना के पिता पैसे देने के लिए अपना पर्स निकालने लगे, तो महेश ने तुरंत उनका हाथ रोक दिया, “नहीं, ये हमारी तरफ से होगा हमारे यहाँ शादी के कपड़े लड़के वाले लेते हैं”

उनके लहज़े में ऐसा साफ़पन था कि सामने वाले के पास मना करने की गुंजाइश ही नहीं बची रवीना के पिता ने हल्का-सा सिर हिलाकर बात मान ली।

वहाँ से सब लोग पास के ज्वेलरी शॉप में गए दुकान में अंदर बैठने की जगह थी औरतें एक तरफ बैठकर गहने देखने लगीं, जबकि पुरुष थोड़ा पीछे खड़े होकर बस देख रहे थे।

रवीना चुपचाप एक-एक डिज़ाइन देख रही थी उसकी उंगलियाँ एक चेन पर जाकर रुक गईं—सादा लेकिन खूबसूरत उसने उसे हाथ में उठाया, हल्का-सा पलटकर देखा फिर जैसे ही उसकी नज़र कीमत पर गई, उसका चेहरा बदल गया बिना कुछ कहे उसने चेन वापस रख दी और दूसरी तरफ देखने लगी, जैसे उसे वो पसंद ही नहीं आई हो।

तुषार थोड़ी दूरी पर खड़ा सब देख रहा था महेश की नज़र उस पर पड़ी उन्होंने भौंहें सिकोड़ते हुए उसे अलग खींच लिया, “तुषार, ये क्या है? अपनी ही शादी की खरीदारी में ऐसे खड़ा है जैसे कोई तमाशा देख रहा हो जाओ जाकर बात करो कुछ  बात  करो रवीना के लिए कुछ पसंद करो ”

तुषार ने हल्का-सा सिर झुका लिया उसकी उंगलियाँ आपस में उलझ गईं उसने एक गहरी सांस ली और धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ गया जहाँ रवीना बैठी थी तुषार कुछ सेकंड खड़ा रहा, फिर उसकी नज़र उसी चेन पर गई जिसे रवीना ने अभी छोड़ा था

उसने उसे उठाया और बिना ज्यादा सोचे, धीरे से रवीना के सामने रख दिया, “वो ये ठीक लग रही थी मतलब… अगर आपको ठीक लगे तो”

आवाज़ में हिचक थी, और हाथ उसने तुरंत जेब में डाल लिए—शायद कांपते हुए छुपाने के लिए।

रवीना ने चेन की तरफ देखा फिर उसकी तरफ एक छोटी-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई—धीमी, लेकिन सच्ची। उसे समझ आ गया था कि उसने ध्यान दिया था

उसने कुछ नहीं कहा, बस हल्का-सा सिर झुका लिया
उसी वक्त सुशीला की नज़र कीमत पर गई उनके चेहरे पर आपत्ति साफ़ दिखी, “ये थोड़ा—”

लेकिन वो अपनी बात पूरी करतीं, उससे पहले ही महेश आगे बढ़े उन्होंने चेन उठाई और सीधे सेल्समैन को दे दी, “इसे बिल कर दीजिए”

उनकी आवाज़ में इतना ठहराव था कि कोई फिर कुछ नहीं बोला तुषार वहीं खड़ा रहा, लेकिन इस बार उसकी नज़रें मोबाइल पर नहीं थीं