I want to be a tree in Hindi Moral Stories by prachi Gurjar books and stories PDF | मैं पेड़ बनना चाहती हूँ

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मैं पेड़ बनना चाहती हूँ

शहर की सबसे ऊँची इमारत की 12वीं मंज़िल पर मेरा कमरा था। खिड़की से सिर्फ़ कंक्रीट, शोर और भागती हुई गाड़ियाँ दिखती थीं।  नाम है मीरा। उम्र 26। नौकरी, डेडलाइन, बॉस की डाँट  सब था। बस साँस नहीं थी।एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त़ मैं फुटपाथ पर गिर पड़ी। चक्कर। डॉक्टर बोला, “तुम्हें कुछ नहीं हुआ है। बस तुम इंसान होना भूल गई हो।”उसी रात छत पर गई। बगल वाले प्लॉट में एक अकेला नीम का पेड़ खड़ा था। आँधी आई, पानी बरसा, धूप चमकी वो हिला नहीं।  मैंने उससे पूछा, “तुम्हें डर नहीं लगता?”  हवा चली। लगा जैसे पेड़ ने कहा, “मैं डरता नहीं। मैं सहता हूँ।”बस उसी दिन से मैंने पेड़ बनना सीखना शुरू किया।पहला सबक़: जड़ें  मैंने फोन बंद किया। लोगों से मिलना कम किया। रोज़ सुबह 5 बजे उठकर छत पर बैठती। आँख बंद करके सुनती अपनी साँस, दिल की धड़कन, चिड़ियों की आवाज़।  पहले-पहल मुश्किल था। दिमाग़ भागता था  कल की मीटिंग, EMI, रिश्तेदारों के ताने।  पर धीरे-धीरे शांत होना आ गया।  पेड़ चिल्लाते नहीं। वो चुपचाप ज़मीन पकड़ते हैं। मैंने भी अपनी ज़मीन पकड़ ली  खुद को।दूसरा सबक़: सहना  बारिश आई। नौकरी चली गई। घर वालों ने कहा, “शादी कर ले, सेटल हो जा।”  दोस्त हँसे, “कवि बन गई है क्या?”  मैं रोई। बहुत रोई। पर उखड़ी नहीं।  नीम को देखा। उसके पत्ते झड़ते हैं, डाल टूटती है, बच्चे पत्थर मारते हैं  फिर भी अगले बसंत वो नई कोंपलें ले आता है।  मैंने भी अपनी टूटी डालों को देखा और कहा, “ठीक है। नई उग आएँगी।”तीसरा सबक़: देना  एक दिन देखा, नीम के नीचे एक बूढ़ी अम्मा बैठी हैं। धूप तेज़ थी।  मैं नीचे गई, पानी दिया। अम्मा बोलीं, “बेटा, इस पेड़ की छाँव में सुकून है।”  मेरे अंदर कुछ हिला।  मैंने लिखना शुरू किया अपनी कहानियाँ, अपनी टूटन, अपनी उम्मीद। इंस्टाग्राम पर डाला।  एक लड़की का मैसेज आया: “दीदी, आपकी पोस्ट पढ़कर आज पहली बार लगा मैं अकेली नहीं हूँ।”  पेड़ फल, फूल, छाँव देता है। बिना हिसाब। मैंने भी बिना हिसाब देना सीख लिया।चौथा सबक़: झुकना, टूटना नहीं  आँधी आई। बहुत तेज़। नीम की एक मोटी डाल चरमरा कर झुक गई। लगा अब गई।  पर सुबह देखा  डाल टूटी नहीं थी। बस झुक कर आँधी को निकल जाने दिया था। फिर सीधी खड़ी हो गई।  उसी हफ़्ते पापा अस्पताल में भर्ती हुए। पैसा नहीं था। मैंने अपना लैपटॉप बेच दिया, ट्यूशन पढ़ाए, रात-रात भर जागी।  झुकी, पर टूटी नहीं।  पापा ठीक होकर बोले, “तू तो नीम जैसी निकली। कड़वी है, पर जान बचाती है।” मैं हँस दी।आज 2 साल हो गए।  नौकरी फिर मिल गई, पर अब मैं नौकरी नहीं करती  काम करती हूँ।  छत पर अब 12 गमले हैं। तुलसी, एलोवेरा, मनीप्लांट। और एक छोटा नीम का पौधा, जो मैंने बीज से उगाया है।लोग पूछते हैं, “इतनी शांत कैसे हो?”  मैं खिड़की से बाहर नीम को देखकर मुस्कुराती हूँ और कहती हूँ:  “मैं इंसान हूँ। पर आजकल पेड़ बनना सीख रही हूँ।  जड़ें मेरी खुद में हैं।  आँधियाँ आती हैं, मैं झुक जाती हूँ।  धूप चुभती है, मैं छाँव बन जाती हूँ।  और जब कोई पत्थर मारता है... मैं फल गिरा देती हूँ।”क्योंकि पेड़ बदला नहीं लेते।  पेड़ बस बड़े हो जाते हैं।