तभी अचानक कमरे से शिवांश के रोने की आवाज़ आने लगी…हल्की-सी नींद टूटने जैसी आवाज़ थी, लेकिन धीरे-धीरे वह तेज़ हो गई। श्रेया तुरंत खड़ी हो गई…
श्रेया (हल्की चिंता में) बोली -
लगता है जाग गया।
वो जल्दी से कमरे की तरफ बढ़ी… और कबीर भी उसके पीछे आ गया। कमरे में शिवांश रो रहा था…
उसके छोटे-छोटे हाथ हवा में हिल रहे थे।
श्रेया ने उसे गोद में उठाया और प्यार से कहा—
शांत हो जा बेटा…
लेकिन बच्चा अभी भी बेचैन था…
श्रेया ने उसे चेक किया और हल्के से बोली—
लगता है डायपर चेंज करना पड़ेगा…
कबीर पास खड़ा देख रहा था…
और तुरंत बोला—
मैं ले आता हूँ…
वो जल्दी से सामान लेने चला गया…श्रेया बच्चे को संभालती रही…और उसे धीरे-धीरे शांत करने लगी।
कुछ ही देर में कबीर वापस आ गया…और दोनों मिलकर बच्चे की care करने लगे। शिवांश धीरे-धीरे शांत हो गया। और फिर से हल्की-सी मुस्कान के साथ उनकी गोद में आराम करने लगा। श्रेया ने उसे देखकर राहत की सांस ली…
श्रेया (हल्की मुस्कान लिए) बोली -
अब ठीक है…
कबीर ने भी मुस्कुरा दिया…
कबीर बोला -
ये छोटा सा पूरा घर हिला देता है…
दोनों हल्का सा हँस पड़े…और उस पल कमरे में एक मासूम सी warmth फैल गई…जैसे सब कुछ कुछ देर के लिए बिल्कुल normal हो गया हो…॥
शिवांश अब बिल्कुल शांत होकर खेल रहा था…
उसकी छोटी-छोटी हरकतें कमरे में एक अलग ही मासूमियत भर रही थीं। कबीर उसे गोद में लिए बैठा था…और उसे बहुत गौर से देख रहा था।
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला—
ये तो बिल्कुल मुझपे गया है… शरारती कहीं का…
श्रेया हल्की हँसी हँस पड़ी…
श्रेया बोली -
अच्छा जी…?
कबीर ने बच्चे के गाल को हल्के से छुआ…
कबीर बोला -
देखो ना… आँखों में वही शरारत है…
तभी शिवांश ने अचानक अपनी छोटी-सी उंगली आगे बढ़ाई…और कबीर की एक उंगली पकड़ ली। कबीर एक पल को रुक गया…उसने बच्चे की पकड़ देखी और मुस्कुरा दिया।
कबीर (धीमे) बोला -
अरे… पकड़ लिया मुझे?
श्रेया पास आकर बैठ गई…और प्यार से देखने लगी।
श्रेया बोली -
ये आपको बहुत पसंद करता है…
कबीर ने बच्चे को थोड़ा और करीब कर लिया…
कबीर बोला -
और मैं इसे…
उसकी आवाज़ हल्की हो गई। लेकिन उसमें अपनापन बहुत गहरा था। शिवांश अब आराम से उसकी उंगली पकड़े-पकड़े खेलने लगा…और कमरे में एक शांत सी खुशी फैल गई…जैसे उस छोटे से बच्चे ने तीनों के बीच की हर उलझन को कुछ पल के लिए भुला दिया हो…॥
रात का समय था…घर में हल्की-हल्की शांति छाई हुई थी। शिवांश गहरी नींद में सो चुका था…उसकी मासूम सांसों की आवाज़ कमरे में गूंज रही थी। कमरे की हल्की रोशनी में…श्रेया और कबीर साथ लेटे हुए थे।
दोनों के बीच अब पहले जैसी झिझक नहीं थी…
पर फिर भी एक अलग सा अपनापन धीरे-धीरे बन रहा था।
कबीर आमतौर पर खुला और फ्रेंडली स्वभाव का था…
वो अपनी भावनाएँ आसानी से दिखा देता था। वो हल्के से मुस्कुराया…और श्रेया की तरफ देखता रहा।
श्रेया ने धीरे से पूछा—
क्या सोच रहे हो?
कबीर ने कुछ पल चुप रहकर उसकी तरफ देखा…फिर धीरे से करीब आ गया। उसने बहुत हल्के से श्रेया को अपनी बाहों में लिया…श्रेया थोड़ा सा सिहर गई…
कबीर (धीमे, भावुक होकर) बोला -
श्रेया…
श्रेया ने उसकी तरफ देखा…
कबीर बोला -
I love you so much…
उसकी आवाज़ में कोई शोर नहीं था…बस सच्चाई थी… गहराई थी…श्रेया कुछ पल चुप रही…फिर उसकी आँखों में एक नरमी आ गई। कमरे में सन्नाटा था…सिर्फ शिवांश की हल्की नींद भरी सांसें थीं…और उस सन्नाटे में…उनके बीच एक नया एहसास धीरे-धीरे जगह बना रहा था…जो अब सिर्फ आदत नहीं…बल्कि दिलों से जुड़ा हुआ अपनापन बन चुका था…॥
शिवांश गहरी नींद में था…और कमरे में एक शांत-सा, सुकून भरा माहौल फैला हुआ था। कबीर अब भी श्रेया के पास था…उसकी आँखों में एक अलग ही अपनापन झलक रहा था। श्रेया ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया…और कबीर के गाल पर रख दिया। उसकी आँखों में हल्की मुस्कान थी…
श्रेया (धीमे) बोली -
I love you too, Kabir ji…
कबीर एक पल के लिए चुप हो गया…जैसे उसने ये शब्द दिल तक महसूस किए हों। फिर उसने बिना कुछ कहे…श्रेया को धीरे से अपनी बाहों में ले लिया। एक मजबूत लेकिन नरम-सा hug…
कबीर (भावुक होकर) बोला -
थैंक यू, श्रेया…
उसकी आवाज़ में सिर्फ प्यार था…और एक गहरी शांति भी। श्रेया ने आँखें बंद कर लीं…और उस पल को महसूस किया। कमरे में सिर्फ एक सुकून था…जहाँ कोई जल्दबाज़ी नहीं थी… कोई शोर नहीं था…सिर्फ तीन ज़िंदगियाँ…जो धीरे-धीरे एक रिश्ते की गर्माहट में बंधती जा रही थीं…
अचानक कमरे में शिवांश के रोने की आवाज़ गूंज उठी…सुकून भरा माहौल एक पल में टूट गया।श्रेया और कबीर दोनों तुरंत सतर्क हो गए… श्रेया उठने लगी ही थी कि कबीर पहले ही बच्चे की तरफ बढ़ गया।
उसने शिवांश को धीरे से अपनी गोद में उठा लिया।
कबीर (प्यार से) बोला -
अरे… क्या हुआ मेरे छोटे से बच्चे को…
वो उसे हल्के से झुलाने लगा…और धीरे-धीरे उसकी आवाज़ नरम होती गई। कुछ ही पल में बच्चा थोड़ा शांत होने लगा…कबीर ने श्रेया की तरफ देखा…
कबीर (धीमे) बोला -
श्रेया… तुम सो जाओ…तुम बहुत थक जाती हो…
श्रेया ने मना करने की कोशिश की…
श्रेया बोली -
नहीं, मैं भी…
लेकिन कबीर ने हल्के से सिर हिलाया…
कबीर बोला -
नहीं… मैं संभाल लूँगा, तुम आराम करो…
उसकी आवाज़ में अपनापन था… और एक जिम्मेदारी भी। श्रेया कुछ पल उसे देखती रही…फिर धीरे से वापस लेट गई…कबीर शिवांश को गोद में लिए धीरे-धीरे झुलाता रहा…और धीरे-धीरे बच्चा फिर से शांत हो गया।
कमरे में फिर से वही हल्की शांति लौट आई…लेकिन अब इस शांति में एक नया एहसास था…जहाँ जिम्मेदारी भी थी, और प्यार भी…।
दिन धीरे-धीरे बीतते जा रहे थे…
और अब घर का माहौल पहले से काफी बदल चुका था। श्रेया और कबीर के बीच अब एक अजीब-सा लेकिन सहज रिश्ता बनने लगा था। वो पहले जितना झिझकते थे, अब उतना नहीं करते थे।
कबीर का स्वभाव ही ऐसा था—खुला, दोस्ताना और आसानी से बात करने वाला…इसलिए श्रेया को उसके साथ जल्दी comfort महसूस होने लगा। वो छोटी-छोटी बातें करते…कभी हँसी-मजाक… कभी बच्चे की शरारतें…और धीरे-धीरे श्रेया कबीर के साथ खुद को ज्यादा “relaxed” महसूस करने लगी।
एक शाम…श्रेया किचन में थी और कबीर पास में खड़ा कुछ मदद कर रहा था।
कबीर (मुस्कुराते हुए) बोला -
तुम हमेशा इतना serious क्यों रहती हो?
श्रेया हल्की मुस्कान देती है…
श्रेया बोली -
मैं serious नहीं हूँ…
कबीर हँस पड़ा।
कबीर बोला -
अच्छा? तो फिर ये face क्या है?
श्रेया भी हल्का सा हँस देती है…शायद ये पहली बार था जब वो इतनी आसानी से किसी के साथ हँसी थी…कबीर उसकी हँसी देखकर थोड़ा शांत हो गया…और बस उसे देखता रह गया।बधीरे-धीरे श्रेया उसके साथ ज्यादा comfortable होने लगी…क्योंकि कबीर उसे जज नहीं करता था…बस समझने की कोशिश करता था। और यही चीज़ उसे कबीर के और करीब ले जा रही थी…बिना किसी कोशिश के…एक natural सा connection बनता जा रहा था…जो हर दिन थोड़ा और गहरा हो रहा था…
कबीर अब शिवांश के साथ काफी समय बिताने लगा था…वो उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखता था। कभी उसे गोद में उठाना…कभी उसके साथ खेलना…कभी उसे हँसाने की कोशिश करना…शिवांश अभी बहुत छोटा था…ठीक से शब्द भी नहीं बोल पाता था…लेकिन उसकी मासूमियत में एक अलग ही अपनापन था।
एक दिन शाम का समय था…कबीर उसे गोद में लिए कमरे में बैठा था…श्रेया पास ही कुछ काम कर रही थी…और बच्चा कबीर के साथ खेल रहा था। कबीर उसे हल्के से झुला रहा था…
कबीर (मुस्कुराते हुए) बोला -
बोलो… क्या बोलोगे आज?
शिवांश उसे देखता रहा…
फिर अपने छोटे-छोटे शब्दों में धीरे से बोला—
पा… पा…
कबीर एक पल के लिए चौंक गया…उसने तुरंत बच्चे को देखा। और फिर हल्की मुस्कान आ गई उसके चेहरे पर।
कबीर (धीमे, भावुक होकर) बोला -
क्या कहा तुमने…?
शिवांश फिर से मासूमियत से दोहराता है—
पा… पा…
श्रेया भी वहीं रुक गई…उसकी आँखों में हल्की नमी आ गई। कबीर ने बच्चे को कसकर अपनी बाहों में ले लिया…
कबीर (धीमे) बोला -
हाँ बेटा… मैं हूँ ना…
उसकी आवाज़ में खुशी भी थी…और एक गहरा सा अपनापन भी। श्रेया चुपचाप उन्हें देख रही थी…उस पल घर में एक अलग ही warmth थी…जैसे रिश्तों ने अपना नया नाम खुद ढूंढ लिया हो…।
दूर हरियाणा में करण अपने प्रोजेक्ट में काफी व्यस्त था…लेकिन दिन खत्म होते ही उसका ध्यान हमेशा घर पर ही चला जाता था। उसने अपना फोन उठाया और वीडियो कॉल लगाया…कुछ ही रिंग्स के बाद कॉल जुड़ गया। स्क्रीन पर शिवांश दिखा…कबीर उसे गोद में लिए हुए था और श्रेया पास बैठी थी। करण के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई…
करण (प्यार से) बोला -
अरे मेरे बेटे…
शिवांश स्क्रीन पर अपने पापा को देखकर मुस्कुराने लगा…और अपने छोटे-छोटे हाथ हिलाने लगा। कबीर ने फोन थोड़ा और पास किया…
कबीर (मुस्कुराते हुए) बोला -
देखो भैया… आज कुछ नया किया है इसने…
करण ने हल्के से हँसते हुए पूछा—
क्या?
श्रेया पास आकर बोली—
इसे बोलना आ गया है…
करण थोड़ा उत्साहित हो गया…
करण बोला -
क्या बोलता है?
तभी शिवांश ने मासूमियत से स्क्रीन की तरफ देखा…
और अपने छोटे-छोटे शब्दों में बोला—
पा… पा…
करण एक पल के लिए बिल्कुल चुप हो गया…फिर उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान फैल गई…
करण (भावुक होकर) बोला -
अरे वाह…
उसकी आँखों में खुशी साफ झलक रही थी…
करण (धीमे, प्यार से) बोला -
मेरा बेटा…
वो पल उसके लिए बहुत खास था…दूर रहकर भी उसे अपनापन महसूस हुआ…
वो हल्के से मुस्कुराया और स्क्रीन को देखते हुए
बोला—
बहुत अच्छा… बहुत अच्छा बेटा…
और उस वीडियो कॉल में…एक पिता की खुशी साफ झलक रही थी…जो दूर रहकर भी अपने बच्चे से जुड़ा हुआ था…जैसे ही वीडियो कॉल खत्म हुई…कमरे में हल्की-सी खामोशी छा गई।
शिवांश ने अचानक करवट ली और रोने लगा…उसकी छोटी-सी आँखों में आँसू आ गए थे। श्रेया तुरंत उसके पास आई…लेकिन उससे पहले ही कबीर ने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
कबीर (प्यार से) बोला -
अरे… क्या हुआ मेरे बच्चे को?
शिवांश रोते-रोते बस एक ही बात समझा पा रहा था—
उसे अपने पापा की याद आ रही थी। कबीर ने उसे धीरे से सीने से लगा लिया…और हल्के से झुलाने लगा।
कबीर (नरमी से) बोला -
ना ना… मेरा बेटा क्यों रो रहा है?
पापा हैं ना… देखो, छोटे पापा हैं ना…
वो उसे बार-बार सहलाता रहा…और अपनी आवाज़ से शांत करने की कोशिश करता रहा। श्रेया भी पास खड़ी उसे देख रही थी…उसकी आँखों में हल्की उदासी थी…
क्योंकि बच्चा अभी छोटा था…और उसे समझ नहीं था कि पापा दूर हैं लेकिन उसे बहुत प्यार करते हैं। कबीर ने उसे और कसकर अपनी बाहों में ले लिया…
कबीर (धीमे) बोला -
बस… चुप हो जा बेटा…हम हैं ना तुम्हारे साथ…
धीरे-धीरे शिवांश की रोने की आवाज़ कम होने लगी…
और वो कबीर के सीने में सुकून पाने लगा…कमरे में फिर से एक शांति लौट आई…लेकिन उस शांति में एक मासूम सा दर्द भी था…जो सिर्फ एक बच्चे की यादों से जुड़ा हुआ था…।