कुछ दिनों बाद करण अपना काम खत्म करके घर वापस आ गया…घर में फिर से वही हलचल और अपनापन लौट आया था। शिवांश दौड़ता हुआ उसके पास गया और उसकी गोद में चढ़ गया। करण मुस्कुराया और उसे कसकर पकड़ लिया…
करण बोला -
मेरा बेटा कितना बड़ा हो गया है…
शिवांश खिलखिलाकर हँसने लगा…कुछ देर बाद माहौल थोड़ा शांत हुआ…
कबीर ने थोड़ी झिझक के साथ करण को सब
बताया—
भैया… एक बात और है…
करण ने उसकी तरफ देखा…कबीर ने धीरे से बताया कि श्रेया फिर से प्रेग्नेंट है…कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया…करण के चेहरे पर हल्की कसक आई…लेकिन उसने जल्दी ही खुद को संभाल लिया।
उसके मन में पुराने भाव कुछ पल के लिए उठे…पर फिर उसने खुद को समझा लिया…
करण (मन ही मन) बोला -
मैंने भी तो यही किया था…
वो हल्का सा मुस्कुराया…
करण बोला -
ठीक है…
फिर उसने शिवांश को अपनी गोद में उठाया और प्यार से बोला—
अब तो तैयार हो जाओ…शिवांश का भाई या बहन आने वाले हैं…
शिवांश उसकी गोद में खिलखिलाकर हँसने लगा…और कमरे में फिर से वही अपनापन लौट आया…जहाँ रिश्ते जटिल जरूर थे… लेकिन प्यार अब भी सब कुछ संभाल रहा था…
समय फिर से धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा था…घर में अब एक नया संतुलन बन चुका था। शिवांश बड़ा हो रहा था…और उसके साथ-साथ आने वाले नए बच्चे की भी तैयारियाँ चल रही थीं।
श्रेया अब दूसरी बार प्रेग्नेंट थी…और इस बार उसके पेट में जो बच्चा था, वो कबीर का था। लेकिन घर में एक बात अब भी वैसी ही थी…प्यार और देखभाल में कोई कमी नहीं आई थी। करण अब भी श्रेया की उतनी ही care करता था…जितनी पहले करता था।
और कबीर भी…हर पल उसके साथ रहता, उसका ध्यान रखता। कभी दवाइयाँ…कभी आराम…कभी उसकी छोटी-छोटी जरूरतें…दोनों मिलकर श्रेया का ख्याल रखते थे…
एक दिन शाम का समय था। श्रेया सोफे पर बैठी थी…
थोड़ी थकी हुई। कबीर उसके पास बैठा था और पानी दे रहा था…जबकि करण शिवांश के साथ खेल रहा था।
श्रेया हल्के से मुस्कुराई…
श्रेया बोली -
आप दोनों अभी भी वैसे ही हो…
कबीर ने मुस्कुराकर कहा—
कैसे?
श्रेया ने धीरे से जवाब दिया—
मेरी इतनी care करने वाले…
करण दूर से सुनकर हल्का सा मुस्कुराया…
करण बोला -
अब आदत हो गई है…
शिवांश दौड़ता हुआ श्रेया के पास आया…और उसकी गोद में चढ़ गया। कमरे में एक सुकून भरा माहौल था…
जहाँ रिश्तों की उलझनें अब धीरे-धीरे अपनापन बन चुकी थीं…और घर अब सिर्फ एक घर नहीं…बल्कि एक पूरा परिवार बन चुका था…
शिवांश अब थोड़ा और बड़ा हो गया था…और उसकी मासूमियत और शरारतें भी बढ़ गई थीं। लेकिन एक बात बिल्कुल साफ थी… उसे करण के साथ रहना सबसे ज्यादा पसंद था। जैसे ही वह घर में आता, शिवांश तुरंत उसके पीछे-पीछे घूमने लगता।
वो बोलता -
पापा… पापा…
दिनभर उसकी यही आवाज़ घर में गूंजती रहती थी।
करण जहाँ भी बैठा होता, शिवांश उसी की गोद में चढ़ जाता…और उससे चिपककर बैठ जाता। कबीर भी पास रहता…और कभी-कभी मुस्कुराकर उसे देखता।
कभी शिवांश कबीर की तरफ भागता…और कभी फिर से करण के पास लौट आता।
कबीर हँसकर कहता—
अरे भाई… ये तो दोनों पापा के बीच फँस गया है…
श्रेया भी हल्के से मुस्कुरा देती…
श्रेया बोली -
इसे दोनों ही अच्छे लगते हैं…
लेकिन अंदर ही अंदर सब जानते थे…शिवांश के दिल में करण के लिए एक खास जगह थी।बवो चाहे जितना कबीर के साथ खेल ले…पर जब भी उसे डर लगता या सुकून चाहिए होता…वो सीधा करण की गोद में चला जाता। करण उसे कसकर पकड़ लेता…
करण (धीमे मुस्कुराकर) बोला -
मेरा बच्चा…
और शिवांश भी तुरंत शांत हो जाता…उस छोटे से घर में अब तीनों के बीच प्यार और जिम्मेदारी का एक ऐसा रिश्ता बन चुका था…जो हर दिन और गहरा होता जा रहा था…
नौ महीने बीत चुके थे…घर में फिर से एक बड़ी घड़ी आ चुकी थी। श्रेया को अचानक तेज़ लेबर पेन शुरू हुआ…
और माहौल एकदम बदल गया। सब घबरा गए…कबीर ने तुरंत गाड़ी निकाली और श्रेया को अस्पताल ले जाया गया…करण भी उनके साथ था…शिवांश घर पर था… लेकिन वह रो-रोकर परेशान हो रहा था…
शिवांश बोला -
मम्मी… मम्मी…
उसकी छोटी-सी आवाज़ बार-बार घर में गूंज रही थी।
कबीर ने उसे तुरंत अपनी गोद में उठा लिया…और उसे सीने से लगा लिया।
कबीर (प्यार से) बोला -
शांत हो जा बेटा… मम्मी ठीक हो जाएँगी…
शिवांश सिसकते हुए उसके गले से चिपक गया…उधर अस्पताल में…करण बहुत परेशान था…वह बार-बार बाहर-भीतर टहल रहा था…चेहरे पर चिंता साफ दिख रही थी। कबीर भी पहुंच गया था।
करण (धीमे) बोला -
सब ठीक होना चाहिए…
कबीर भी अंदर ही अंदर घबराया हुआ था…लेकिन वह खुद को संभाले हुए था…वह बस दरवाज़े की तरफ देख रहा था…जहाँ श्रेया अंदर थी…और तीनों की दुनिया फिर से एक नई शुरुआत के मोड़ पर खड़ी थी…
कुछ ही देर बाद ऑपरेशन थिएटर का दरवाज़ा खुला…
और डॉक्टर बाहर आईं, उनके हाथों में एक नन्ही-सी जान थी।
डॉक्टर (मुस्कुराते हुए) बोलीं -
बधाई हो… घर में लक्ष्मी आई है…
एक पल के लिए पूरा माहौल रुक सा गया…फिर अचानक खुशी फैल गई। कबीर की आँखों में चमक आ गई…उसका चेहरा खुशी से भर उठा। क्योंकि ये बच्ची उसकी थी…और शिवांश की छोटी बहन।
कबीर (भावुक होकर) बोला -
मेरी बेटी…
उसने आगे बढ़कर बच्ची को बहुत ध्यान से देखा…जैसे वह अपनी पूरी दुनिया देख रहा हो। करण भी पास खड़ा था…उसके चेहरे पर भी सुकून और खुशी दोनों थे।
करण हल्के से मुस्कुराया—
शिवांश की बहन आ गई…
कबीर ने बच्ची को अपनी बाहों में लेने का इंतज़ार किया…और उसकी आँखें भर आईं। उधर अंदर से श्रेया अभी थकी हुई थी…लेकिन उसके चेहरे पर भी एक शांत मुस्कान थी…क्योंकि घर में अब एक नई रोशनी आ चुकी थी…और उस रोशनी के साथ…तीनों की जिंदगी और भी पूरी हो गई थी…
सब धीरे-धीरे अस्पताल के कमरे में अंदर आ गए...श्रेया अभी भी बेड पर लेटी हुई थी, थकी हुई लेकिन चेहरे पर सुकून था। कबीर एक तरफ खड़ा था, उसकी गोद में शिवांश था…जो अपनी नन्ही बहन को देखकर हैरान था।
और करण दूसरी तरफ बैठा था…उसकी गोद में नवजात बच्ची थी, जो हल्के-हल्के रो रही थी। वो उसे बहुत ध्यान से देख रहा था…और हल्की मुस्कान उसके चेहरे पर थी।
करण ने प्यार से बच्ची को देखा और बोला—
बिल्कुल अपनी माँ पर गई है…रोती है तो पूरा लाल हो जाती है…।
ये सुनकर कबीर हल्का सा हँस पड़ा…श्रेया भी बेड पर लेटे-लेटे मुस्कुरा दी। शिवांश अपनी छोटी बहन को गौर से देख रहा था…और धीरे से कबीर की गोद में हिलने लगा।
कबीर ने उसे सहलाया और बोला—
देखो… ये तुम्हारी छोटी बहन है…
शिवांश मासूमियत से बस उसे देखता रहा…फिर धीरे-धीरे कमरे में एक सुकून फैल गया…जहाँ हर किसी की आँखों में थकान के साथ खुशी भी थी…करण ने बच्ची को थोड़ा और करीब कर लिया…और उसकी उंगली पकड़ ली। छोटी-सी उंगली…और पूरा परिवार उससे जुड़ गया था…।