प्रश्न ~ लड़कियों को पढ़ाई के लिऐ अथवा काम के लिऐ बहुत कम घर से बाहर भेजा जाता है। क्योंकि समाज में एक डर है कि कही उनके साथ कुछ बुरा न हों जाए ?
उत्तर ~ ठीक है मान लिया समाज में अनेक प्रकार के तथ्य है,कि समाज में बहुत तरह की हिंसा है ठीक है तथ्य है।
लेकिन आप इसको गुब्बारे की तरह नहीं फुला सकते हो कि अब हम घर से बाहर एक कदम भी नहीं रख सकते अगर रखा तो हम लुट जायेगे, नोच लेगा पूरा समाज... हम मानते है समाज में बहुत तरह की हिंसा (शोषण) है... लेकिन ये भी मत भूलिए गा कि उसी समाज में हम भी रहते हैं।
हम गलती ये करते हैं कि हम समाज में जो कुछ देखते हैं उन्हें पूरा नहीं देखते हैं। हमे जो दिखाया जाता है वो देखते हैं... या कई बार हम देखते भी है तो उसे समझना नहीं चाहते।
ऐसा कभी नहीं हुआ की समाज पूरा साफ सुथरा रहा हो.... अगर आज अपको चारों तरफ ये सुनने को मिल रहा है कि आज ये हिंसा हुई... आज ये घटना घटी ...वैसी घटना घटी तो ऐसा नहीं है कि ये घटनाएं पहले नहीं घटती थीं बल्कि सच तो ये है कि पहले और भी घटना घटती थीं। आप इतिहास में कुछ समय पहले जाओ जब स्त्रियों का खतरनाक शोषण और बहुत सी प्रथा मिलती है।
अब तो स्त्री कुछ समर्थ है, तो वो हिंसा होने पर चिल्ला कर बता तो सकती है , की मेरे साथ इस प्रकार का दुराचार हुआ है , अब पुलिस के पास जाकर बता तो सकती है, बहुत सारे सुरक्षा को लेकर नियम है, कानून है गलती करने वाले को सजा का प्रावधान है।
लेकिन पहले तो ये भी नहीं होता था,अपको याद है ? जब आपने इतिहास में सती प्रथा पढ़ी होगी.. जब सती प्रथा में स्त्री को पति के साथ जलाया जाता था और उसकी आवाज किसी को सुनाई न दे इसलिए ढोल, नगाड़े , बजाए जाते थे... है न बहुत अजीब..... मेरा कहने का मतलब ये नही है की महिलाओं की स्थति बहुत अच्छी हो गईं हैं अब कुछ करने की जरूरत नहीं है।
जब हम ऐसी घटनाओं के बारे में सोचते हैं जैसे बलात्कार, घरेलू हिंसा, छेड़छाड़ जैसी घटनाएं समाज में बढ़ रहीं हैं ,तो हम सोचते हैं कि येसी घटना हमारे घर के बाहर है सड़क पर है या कही और हमसे दूर है। लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि इससे ज्यादा घटना हमारे घर के अंदर होती है। एक बहुत बड़ा अनुपात (संख्या)है जिसमें महिलाएं और लड़की घर में बहुत तरह के शोषण और हिंसा का शिकार होती है, कभी संबंधी, कभी पति, कभी घर के सदस्य और दोस्त उसमें शामिल पाए जाते है।
अगर कोई तुम्हे कहें कि घर से बाहर मत निकलो खतरा है,तो उससे पूछो कि घर के अंदर क्या सुरक्षा हैं?
घर में सबसे ज्यादा असुरक्षित लड़की वो है जो जीवन भर घर के अंदर ही रह गई.. जिस लङकी के कदम खुले आकाश में नही निकले , जिसने दुनिया नहीं जानी, जिसने अपने हाथ मजबूत नहीं किए, जो शिक्षित नहीं है, जो कमाती नहीं है, जो अपने पैरो पर खड़ी नहीं हुई है, जिसके पास ज्ञान नहीं है , जिसका मन खुला नहीं है,जिसने खुद को नहीं जाना है, सबसे ज्यादा शोषण और हिंसा की संभावना इसी लङकी की है।
तो अगर आप शोषण से बचना चाहते हो तो और भी जरूरी है कि आप घर से बाहर निकलो और निकलने दो क्योंकि घर से बाहर खतरा है..निसंदेह खतरा है...लेकिन घर के भीतर और बड़ा खतरा है। क्योंकि जो जागरूक नहीं है, जिसके पास ज्ञान नही है, जिसके पास खुद की सुरक्षा करने का बल नही है , जिसको दुनिया की कोई समझ नहीं उसका कभी भी शिकार ,शोषण हो सकता है।
आप विचार कीजिए अगर आप किसी दूसरे पर निर्भर रहो कि , पैसे दे दो.. हाथ फैलाते रहो.. कपड़े दे दो , मकान दे दो , सुरक्षा दे दो,... तो अपको क्या लगता हैं कि जो तुम्हे ये देगा तुमसे इसकी कीमत नहीं वसूलेगा... वसूलेगा जरूर... मुफ्त में नही देगा... एक सीमा तक तो ठीक है मिलती है.. ,लेकिन जीवन भर तो नही...।
होता क्या है हमारे यहां किसी लडकी का रिमोट शादी से पहले माता पिता के पास होता है,जैसा वो उसे चलायेगे वो चलेगी और शादी के बाद बही रिमोट पति के हाथ में दे दिया जाता है पति जो कहेंगे वो करेगी, यहां लड़की की स्वतंत्रता का तो कुछ पता ही नही है बस लोग चलाते हैं वो चलती है।
"मेरा कहने का मतलब ये नही है की आप किसी की बात ही न मानो.. नही"
आप विचार कीजिए अगर कोई 20,21 साल का हो गया है फिर भी वो अपने दिमाक और विवेक से अपना काम नही कर पा रहा है, दूसरों के भरोसे है ... दूसरे जो कह रहें हैं वह कर रहा हैं तो ये हमारी परवरिश पर सवाल उठाता है। हमारी परिवरिश ऐसी क्यों हैं कि इतनी लम्बी उम्र होने बाद भी हम किसी को सशक्त न बना पाए, कि वह अपने निर्णय खुद तय कर सकें। जितना हक और अधिकार लड़के को है उतने अधिकार लड़की को भी है दोनो कानूनी रूप से बराबर है... लेकिन फिर भी ये समाज मानने को तैयार ही नहीं है। लड़की को भी किसी पर निर्भर होने की जरूरत नहीं है,वो भी अपने पैरो पर खड़ी हो सकती है,अपने निर्णय खुद ले सकती है,जो चाहें वो सब कुछ कर सकती है।
जैसे ~ चिड़िया को सुरक्षा सबसे ज्यादा पिजड़े में मिलती है पर वह खुले आसमान, आजादी से चूक जाती हैं। पिजड़े में सुरक्षा हैं आजादी नहीं और जहां आजादी हैं वहां सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।
इस बात को भूलिएगा नहीं कि पिजड़े (घर) खूब सुरक्षा देते हैं अपको, पर वो आपके पंख (ज्ञान से वंचित) भी कतर देते हैं। पिजड़ों (घर) में खाना भी मिल जाता है , सुरक्षा भी मिल जाती है। अगर आप सुरक्षित रहना चाहते हो तो... पिजड़ा में रहो.. क्योंकि बाहर खतरा तो है.... लेकिन अगर आपको उड़ान भरना है तो आपको पिंजड़ा छोड़कर खुले आसमान में निकलना तो पड़ेगा। अब ये अपका चुनाव है की "पिंजड़ा" चाहिए या "आजादी"।
तो ये अपको चुनाव करना पड़ेगा की या तो आप पिजड़ा का चुनाव करो या फिर दुनिया में संघर्ष करके अपना स्थान बना कर इतिहास रचो अपना ऐसा स्थान बनाओ की कोई शिकारी (बुरा समाज) हमला करने से पहले हजार बार सोचे।
~ कपिल तिवारी “यथार्थ”