Mr. & Ms. Fake
Episode 14 – The Contract Secret
अगली सुबह...
सिंह हाउस में हमेशा की तरह चहल-पहल थी।
दादी मंदिर में पूजा कर रही थीं।
चिंटू पूरे घर में क्रिकेट खेल रहा था।
"चिंटू! अगर फिर से फूलदान तोड़ा ना, तो आज टीवी बंद!"
दादी की आवाज़ सुनते ही चिंटू बैट छिपाकर सीधा पढ़ने बैठ गया।
तभी...
डिंग डॉन्ग...
डोरबेल बजी।
नौकर ने दरवाज़ा खोला।
बाहर काले सूट में एक आदमी खड़ा था।
उसके हाथ में एक भूरी फाइल थी।
"मुझे मिस्टर आर्यवीर सिंह से मिलना है।"
उसे अंदर बैठा दिया गया।
कुछ देर बाद आर्यवीर नीचे आया।
"जी, कहिए?"
उस आदमी ने फाइल टेबल पर रख दी।
"क्या आप इन्हें पहचानते हैं?"
आर्यवीर ने फाइल खोली...
और उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
वह वही कॉन्ट्रैक्ट था...
जिस पर उसने और सान्वी ने नकली रिश्ते के लिए साइन किए थे।
उसके हाथ काँपने लगे।
"ये यहाँ कैसे आया?"
उसी समय...
दादी भी हॉल में आ गईं।
"क्या हुआ बेटा?"
आर्यवीर ने घबराकर फाइल बंद कर दी।
"कुछ... नहीं दादी।"
लेकिन इससे पहले कि वह फाइल उठा पाता...
चिंटू दौड़ता हुआ आया।
"भैया, ये क्या है?"
उसने शरारत में फाइल उठा ली।
"अरे... वापस दो!"
चिंटू पूरे हॉल में भागने लगा।
आर्यवीर उसके पीछे।
पूरा घर यह नज़ारा देखकर हँसने लगा।
चिंटू चिल्ला रहा था—
"पकड़ो... पकड़ो... भैया का सीक्रेट!"
आख़िरकार चिंटू का पैर कालीन में उलझ गया।
वह गिरने ही वाला था कि सान्वी, जो अभी-अभी घर पहुँची थी, दौड़कर उसे संभाल लिया।
फाइल उसके हाथ से नीचे गिर गई।
सभी की नज़र उसी पर टिक गई।
रिया...
जो दरवाज़े के बाहर खड़ी यह सब देख रही थी...
धीरे से मुस्कुराई।
"बस... अब सब खत्म।"
लेकिन तभी...
वह सूट वाला आदमी अचानक बोला—
"सॉरी, एक मिनट!"
सबने उसकी तरफ देखा।
"गलती हो गई।"
"क्या मतलब?"
उसने दूसरी फाइल निकाली।
"असल में दोनों फाइलों का कवर एक जैसा था।"
उसने पहली फाइल वापस लेकर दूसरी फाइल आर्यवीर को दी।
"ये आपके ऑफिस का लीगल एग्रीमेंट है।"
आर्यवीर ने राहत की साँस ली।
दूसरी फाइल सचमुच ऑफिस की थी।
फिर उसने जल्दी से पहली फाइल अपने हाथ में ले ली।
"और ये?"
आदमी मुस्कुराया।
"ये किसी और क्लाइंट की निजी फाइल थी। गलती से साथ आ गई।"
वह माफी माँगकर चला गया।
बाहर निकलते ही...
रिया गुस्से से उसके पास पहुँची।
"तुमने क्या किया?"
आदमी घबरा गया।
"मैडम... मैं झूठ नहीं बोल सकता था। अगर मैं वो फाइल वहीं छोड़ देता तो मामला पुलिस तक पहुँच सकता था।"
रिया ने गुस्से में उसकी तरफ देखा।
"निकालो मेरी नज़रों से!"
आदमी तुरंत वहाँ से चला गया।
रिया ने मुट्ठी भींच ली।
"हर बार... आख़िरी पल पर सब बिगड़ जाता है।"
उधर...
आर्यवीर और सान्वी बगीचे में खड़े थे।
दोनों कुछ देर तक चुप रहे।
फिर सान्वी बोली—
"आज अगर वो कॉन्ट्रैक्ट दादी के हाथ लग जाता..."
आर्यवीर ने बात पूरी की—
"...तो सब खत्म हो जाता।"
सान्वी ने गहरी साँस ली।
"शायद अब हमें ये कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर देना चाहिए।"
आर्यवीर उसकी तरफ देखने लगा।
"मतलब?"
"कागज़ रहेगा, तो खतरा भी रहेगा।"
आर्यवीर ने जेब से वही कॉन्ट्रैक्ट निकाला।
दोनों कुछ पल उसे देखते रहे।
फिर आर्यवीर ने मुस्कुराते हुए कहा—
"चलो..."
उसने कागज़ के दो टुकड़े किए।
सान्वी ने भी बाकी टुकड़े फाड़ दिए।
हवा के साथ वे छोटे-छोटे कागज़ उड़ने लगे।
सान्वी मुस्कुराई।
"अब कोई सबूत नहीं बचा।"
आर्यवीर भी मुस्कुराया।
"लेकिन..."
"क्या?"
"अब हमारा रिश्ता सिर्फ़ इस कागज़ पर नहीं टिका है।"
सान्वी उसकी बात सुनकर कुछ पल चुप रह गई।
उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
उसी समय...
दादी बालकनी से दोनों को देख रही थीं।
उन्होंने देखा कि दोनों हँसते हुए एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं।
दादी मुस्कुराईं।
"भगवान..."
"इन दोनों की हँसी हमेशा सलामत रखना।"
लेकिन...
उसी समय रिया ने अपनी कार में बैठते हुए एक और फोन मिलाया।
"अब प्लान बदल गया है।"
"कॉन्ट्रैक्ट नहीं..."
"अब इनके दिल ही इनके खिलाफ़ इस्तेमाल होंगे।"
उसकी रहस्यमयी मुस्कान बता रही थी कि तूफ़ान अभी बाकी है।
क्रमशः...