Mr. & Ms. Fake
Episode 24 – The Secret From His Past
अगली सुबह...
सिंह हाउस में दादी की शर्त के बाद पहली सुबह थी।
आर्यवीर हमेशा की तरह जल्दी उठ गया था।
लेकिन आज उसके चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी थी।
शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि आने वाला दिन उसकी जिंदगी में क्या लेकर आने वाला है।
नीचे डाइनिंग टेबल पर सान्वी पहले से बैठी थी।
आर्यवीर ने उसे देखा तो कुछ पल के लिए रुक गया।
सान्वी ने भी उसकी तरफ देखा।
दोनों के बीच कल रात की बातचीत याद आ गई।
"आगे से कुछ भी सुनो तो पहले मुझसे पूछना।"
सान्वी हल्का-सा मुस्कुराई।
"गुड मॉर्निंग।"
"गुड मॉर्निंग।"
कबीर ने दोनों को देखा और तुरंत बोला—
"वाह! कल तक एक-दूसरे से लड़ रहे थे, आज गुड मॉर्निंग भी हो रही है।"
चिंटू ने कहा—
"मुझे लगता है दादी की शर्त काम कर गई।"
आर्यवीर ने दोनों को घूरा।
"तुम दोनों नाश्ता करो।"
सान्वी हँस पड़ी।
माहौल कुछ हल्का हुआ ही था कि...
डोरबेल बजी।
नौकर दरवाज़ा खोलने गया।
कुछ सेकंड बाद वह वापस आया।
"साहब, आपसे मिलने कोई आए हैं।"
आर्यवीर ने पूछा—
"कौन?"
"नाम नहीं बताया। कह रहे हैं कि बहुत जरूरी काम है।"
आर्यवीर उठकर दरवाज़े की तरफ गया।
दरवाज़े के बाहर लगभग तीस साल का एक आदमी खड़ा था।
साधारण कपड़े...
हाथ में पुराना-सा चमड़े का बैग...
और चेहरे पर रहस्यमयी गंभीरता।
आर्यवीर ने उसे देखते ही भौंहें सिकोड़ लीं।
"आप कौन हैं?"
उस आदमी ने कुछ सेकंड उसे देखा।
फिर अपने बैग से एक पुरानी तस्वीर निकाली।
"पहले इसे देखिए।"
आर्यवीर ने तस्वीर हाथ में ली।
तस्वीर देखते ही उसका चेहरा बदल गया।
उसमें...
एक छोटा बच्चा था।
लगभग दस साल का।
वह बच्चा आर्यवीर था।
उसके साथ एक लड़की खड़ी थी।
दोनों के चेहरे पर मासूम मुस्कान थी।
लेकिन आर्यवीर की सबसे ज्यादा नजर उस लड़की पर थी।
वह लड़की...
नैना थी।
उसकी बचपन की सबसे करीबी दोस्त।
और...
जिसका नाम उसने पिछले कई सालों से किसी के सामने नहीं लिया था।
सान्वी पीछे से वहाँ आ चुकी थी।
उसने आर्यवीर के चेहरे पर अचानक आया बदलाव देख लिया।
"क्या हुआ?"
आर्यवीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उस आदमी ने कहा—
"आपको याद है नैना?"
आर्यवीर की आँखें ठंडी हो गईं।
"उसका नाम मेरे सामने मत लेना।"
सान्वी चौंक गई।
आदमी ने शांत स्वर में कहा—
"क्यों?"
"क्योंकि उसकी वजह से आपका पूरा परिवार बिखर गया था?"
आर्यवीर ने उसका कॉलर पकड़ लिया।
"तुम्हें उसके बारे में क्या पता है?"
सान्वी तुरंत आगे आई।
"आर्यवीर!"
उसने उसका हाथ पकड़ लिया।
आर्यवीर ने धीरे से उस आदमी को छोड़ा।
दादी भी वहाँ आ चुकी थीं।
जैसे ही उनकी नजर तस्वीर पर पड़ी...
उनके हाथ से पूजा की थाली लगभग छूट गई।
"ये तस्वीर..."
आदमी ने दादी की तरफ देखा।
"हाँ।"
"वही तस्वीर।"
दादी की आँखों में चिंता उतर आई।
"तुम यहाँ क्यों आए हो?"
आदमी बोला—
"सच्चाई बताने।"
आर्यवीर ने तीखे स्वर में कहा—
"कौन-सी सच्चाई?"
उस आदमी ने बैग से एक और लिफाफा निकाला।
"उस रात जो हुआ था..."
"...उसमें नैना दोषी नहीं थी।"
पूरा कमरा शांत हो गया।
सान्वी ने आर्यवीर की तरफ देखा।
उसकी आँखों में साफ़ दिखाई दे रहा था कि यह कोई सामान्य पुरानी कहानी नहीं थी।
सान्वी ने धीरे से पूछा—
"आर्यवीर..."
"तुम मुझे नैना के बारे में कुछ बताना चाहते हो?"
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में दर्द था।
"हाँ।"
"लेकिन अभी नहीं।"
सान्वी कुछ पल चुप रही।
फिर उसे दादी की कही बात याद आई—
"भरोसा मतलब सच से भागना नहीं।"
उसने धीरे से कहा—
"जब तुम्हें ठीक लगे, तब बताना।"
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
उसे उम्मीद थी कि सान्वी सवाल करेगी...
गुस्सा करेगी...
लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया।
वह बस उसके पास खड़ी रही।
वह आदमी फिर बोला—
"आपको शायद याद नहीं होगा..."
"लेकिन नैना ने आखिरी बार आपको एक चिट्ठी दी थी।"
आर्यवीर का चेहरा सफेद पड़ गया।
"कौन-सी चिट्ठी?"
"वही..."
"जो आपको कभी मिली ही नहीं।"
दादी ने तुरंत पूछा—
"तुम्हारे पास है?"
उस आदमी ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
उसने एक पुराना लिफाफा निकाला।
उस पर धूल जमी हुई थी।
ऊपर लिखा था—
"आर्य के लिए..."
आर्यवीर ने काँपते हाथों से लिफाफा लिया।
उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं।
उसने लिफाफा खोलने की कोशिश की।
लेकिन अचानक...
सान्वी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"आर्य..."
वह उसकी तरफ देखने लगा।
सान्वी ने धीरे से कहा—
"अकेले मत पढ़ना।"
आर्यवीर की आँखें नम हो गईं।
उसने पहली बार महसूस किया...
कोई उसके अतीत से डरकर उससे दूर नहीं जा रहा था।
बल्कि उसके साथ खड़ा था।
आर्यवीर ने चिट्ठी खोली।
अंदर सिर्फ कुछ लाइनें थीं।
उसने पढ़ना शुरू किया—
"आर्य, अगर तुम ये चिट्ठी पढ़ रहे हो तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं हूँ। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—मैंने तुम्हें कभी धोखा नहीं दिया..."
आर्यवीर की साँस रुक गई।
आगे लिखा था—
"जिस रात सब कुछ हुआ, उस रात मैंने तुम्हें बचाने के लिए..."
चिट्ठी वहीं खत्म हो गई।
बाकी पन्ना फटा हुआ था।
आर्यवीर ने अविश्वास से उसे देखा।
"बाकी कहाँ है?"
वह आदमी शांत स्वर में बोला—
"मेरे पास नहीं।"
"लेकिन मुझे पता है कि बाकी हिस्सा किसके पास है।"
"किसके पास?"
उस आदमी ने जवाब देने से पहले दादी की तरफ देखा।
फिर बोला—
"उस इंसान के पास..."
"...जिसने आज से कई साल पहले आपके परिवार से एक बड़ा राज़ छुपाया था।"
दादी का चेहरा अचानक बदल गया।
आर्यवीर ने उनकी तरफ देखा।
"दादी?"
दादी ने कुछ नहीं कहा।
सान्वी ने पहली बार महसूस किया...
यह राज़ सिर्फ़ आर्यवीर के अतीत का नहीं था।
इसमें उसका पूरा परिवार शामिल था।
उसी समय...
रिया अपने कमरे में थी।
उसके फोन पर एक मैसेज आया।
"वह आदमी सिंह हाउस पहुँच चुका है।"
रिया के चेहरे का रंग उड़ गया।
"क्या?"
उसने तुरंत दूसरा मैसेज पढ़ा—
"अगर उसने सच बता दिया तो सब खत्म हो जाएगा।"
रिया ने फोन कसकर पकड़ लिया।
उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।
"नहीं..."
"उसे किसी भी कीमत पर चुप कराना होगा।"
लेकिन तभी...
उसके कमरे के दरवाज़े पर किसी की आवाज़ आई।
"किसे चुप कराना है?"
रिया जम गई।
धीरे-धीरे उसने पीछे मुड़कर देखा।
दरवाज़े पर...
अनन्या खड़ी थी।
उसके हाथ में वही फोन था।
और उसके चेहरे पर पहली बार दोस्ताना मुस्कान नहीं...
बल्कि गंभीरता थी।
"रिया..."
"अब तुम मुझे सब कुछ बताओगी।"
रिया कुछ बोल नहीं पाई।
अनन्या ने एक कदम आगे बढ़ाया।
"क्योंकि जिस खेल को तुम इतने दिनों से खेल रही हो..."
"...उसमें अब मैं भी शामिल हूँ।"
उधर...
आर्यवीर चिट्ठी हाथ में लिए खड़ा था।
सान्वी उसके पास थी।
उसने धीरे से आर्यवीर का हाथ पकड़ लिया।
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
"तुम जा सकती हो, सान्वी।"
सान्वी ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये तुम्हारा अतीत है..."
"लेकिन अगर तुम चाहो तो..."
उसने उसकी बात पूरी होने से पहले ही कहा—
"मैं तुम्हारे अतीत से प्यार करने नहीं आई हूँ, आर्यवीर।"
"मैं तुमसे प्यार करने लगी हूँ।"
आर्यवीर एकदम शांत हो गया।
सान्वी को खुद एहसास नहीं हुआ कि उसके मुँह से क्या निकल गया।
दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
सान्वी की आँखें फैल गईं।
"मैंने..."
आर्यवीर धीरे से मुस्कुराया।
"मैंने सुन लिया।"
सान्वी शर्म से नज़रें झुका गई।
लेकिन तभी...
दादी की आवाज़ आई—
"आर्य..."
दोनों ने उनकी तरफ देखा।
दादी के हाथ में एक पुराना फोटो एलबम था।
उन्होंने उसे खोला।
एक तस्वीर सामने थी।
नैना...
आर्यवीर...
और उनके पीछे खड़ा एक तीसरा व्यक्ति।
आर्यवीर ने तस्वीर देखते ही कहा—
"ये..."
उसकी आवाज़ काँप गई।
"ये तो..."
दादी ने धीमे स्वर में कहा—
"हाँ। यही वो आदमी है, जिसने नैना की जिंदगी बर्बाद की थी।"
और तस्वीर में मौजूद वह आदमी...
आज भी जिंदा था।
क्रमशः...