अध्याय 2
नया घर, नई उलझनें
शिवांशी की नींद किसी झटके के साथ टूटी।
उसका शरीर ठंडे पसीने से तर-बतर था और दिल सीने के अंदर किसी हथौड़े की तरह बज रहा था। उसने फौरन उठकर बैठने की कोशिश की, लेकिन सर में एक तेज़ टीस उठी। अंधेरे कमरे में उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। कुछ पलों के लिए उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहाँ है। चारों ओर एक भारी और दमघोंटू सन्नाटा था, जिसमें केवल उसकी अपनी तेज़ और उखड़ी हुई साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।
"सिर्फ एक सपना था..." उसने लंबी और कँपकँपाती साँस ली, खुद को यकीन दिलाने की कोशिश करते हुए। "सिर्फ एक बुरा सपना।"
लेकिन वह गीली मिट्टी की सड़ी हुई महक, वो अजीब से प्राचीन मंत्र... सब कुछ इतना साफ़ था कि शिवांशी को अपने हाथों पर अब भी उस ठंडे जंगल की नमी महसूस हो रही थी। उसने अपने तकिए के पास रखा पानी का गिलास उठाया। उसके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे, जिससे पानी की कुछ बूंदें उसकी टी-शर्ट पर गिर गईं। कमरे की हवा में एक पुरानी लकड़ी और सीलन की मिली-जुली गंध थी, जो इस पुश्तैनी बंगले की दीवारों में सदियों से बसी हुई थी।
बाहर शाम ढल चुकी थी और नीली रात ने खिड़की के कांच पर अपनी पकड़ बना ली थी। यह इस नए घर में उसकी पहली गहरी नींद थी, और उसने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी कि उसकी शुरुआत इतनी डरावनी होगी।
"नया शहर, नई जगह... शायद इसीलिए दिमाग अजीब चीज़ें दिखा रहा है," उसने खुद को तसल्ली दी। वह एक समझदार और तार्किक लड़की थी, जिसे भूत-प्रेत की कहानियों से ज़्यादा विज्ञान पर भरोसा था। परंतु उसके भीतर महादेव के प्रति भी गहरी आस्था थी, जो उसे हर डर से लड़ने की शक्ति देती थी। उसने सोचा कि शायद पैकिंग की थकान और इस पुराने पुश्तैनी बंगले के सन्नाटे ने मिलकर उसके अवचेतन मन के साथ कोई खेल खेला है। घर की ऊँची छतें और कोनों में जमा अंधेरा उसे चिढ़ा रहा था, लेकिन उसने मन ही मन तर्क गढ़ा कि पुरानी इमारतों में ध्वनि और रोशनी का खेल अक्सर भ्रम पैदा करता है।
उसने बिस्तर से उतरकर कमरे की लाइट जलाई। अचानक फैला पीला उजाला आँखों को चुभने लगा। फर्श पर अभी भी सामान से भरे कुछ गत्ते के डिब्बे खुले पड़े थे। शिवांशी ने सोचा कि अगर वह काम में लग जाएगी, तो वह डरावना अहसास चला जाएगा। उसने गहरी साँस ली, और हवा में छनकर आती रात की चमेली और गीली घास की खुशबू को महसूस किया, जो पास के जंगल से आ रही थी।
वह कपड़ों वाला एक गत्ते का डिब्बा उठाने के लिए आगे बढ़ी। जैसे ही उसने झुककर डिब्बे के कोनों को पकड़ा, उसे एक अजीब सी आवाज़ सुनाई दी।
सरसर... सरसर…
जैसे कोई पुरानी, सूखी रस्सी ज़मीन पर घिसट रही हो।
शिवांशी के हाथ वहीं रुक गए। उसका दिमाग तुरंत तर्क ढूँढने लगा—शायद चूहा होगा? या कोई पुरानी प्लास्टिक की थैली जो हवा से हिली हो? लेकिन इस घर में अभी कोई पंखा नहीं चल रहा था। कमरे की दीवारों पर लगा पुराना वॉलपेपर कहीं-कहीं से उखड़ रहा था, और उस दरार से आती हवा की एक ठंडी लहर उसकी गर्दन को छूकर निकल गई, जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए।
उसने धीरे से, बहुत सावधानी से डिब्बे के अंदर झाँका। जैसे ही उसकी नज़र कपड़ों के बीच पड़ी, उसकी चीख़ गले में ही फंसकर रह गई।
एक काला, चिकना नाग कपड़ों की तह के ऊपर कुंडली मारकर बैठा था।
शिवांशी की हिम्मत जवाब दे गई। वह चीखती हुई पीछे की तरफ भागी और हड़बड़ाहट में उसका पैर एक छोटे स्टूल से जा टकराया। वह ज़मीन पर गिरी, लेकिन उसकी नज़रें उस डिब्बे से नहीं हटीं। उस सांप की काली खाल लाइट की रोशनी में किसी कीमती लेकिन शापित पत्थर की तरह चमक रही थी, और उसकी स्थिरता डराने वाली थी। वह हिल नहीं रहा था, बस देख रहा था।
"पापा! पापा जल्दी आइये!"
उसकी आवाज़ सुनकर पापा और दादी सीढ़ियों से भागते हुए आए। लकड़ी की पुरानी सीढ़ियों के चरमराने की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी। शिवांशी का चेहरा सफेद पड़ चुका था।
"क्या हुआ शिवांशी? क्या बात है?" पापा ने उसे ज़मीन से उठाते हुए पूछा, उनकी आवाज़ में चिंता साफ़ थी।
"सांप... उस डिब्बे में!" शिवांशी ने काँपते हाथ से इशारा किया।
पापा ने पास पड़ा एक डंडा उठाया और बेहद सावधानी से डिब्बे के पास गए। जब उन्होंने अंदर झाँककर उस जीव को देखा, तो उनके चेहरे पर भी डर की एक लकीर खिंच गई। "काफी बड़ा है। इस सुनसान इलाके में और जंगल के पास ऐसे जीव निकलना आम बात है। रुक, मैं इसे मार देता हूँ।"
"नहीं!" शिवांशी ने अचानक लगभग चिल्लाते हुए उन्हें रोका। उसे खुद नहीं पता था कि उसने ऐसा क्यों कहा। "मारिये मत। बस... बस बाहर छोड़ दीजिये। किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया उसने।"
पापा ने उसे अजीब नज़रों से देखा, फिर गहरी साँस लेकर बोले, "ठीक है, पर यहाँ रहना अब सुरक्षित नहीं लग रहा।" उन्होंने बड़ी मशक्कत के बाद, डंडे के सहारे, सांप को डिब्बे समेत बालकनी से नीचे बगीचे में सरका दिया।
"चलो, हाथ-मुँह धो लो। हम सब साथ में नीचे बैठकर चाय पीते हैं," दादी ने उसका कंधा सहलाते हुए कहा। लेकिन शिवांशी की नज़रें खिड़की से बाहर उस घने जंगल को घूर रही थीं। जंगल से अब झींगुरों और किसी अनजाने पक्षी की तीखी आवाज़ें आ रही थीं, जो सन्नाटे को और भी भारी बना रही थीं।
दादी का हाथ शिवांशी के कंधे पर था, और शिवांशी ने महसूस किया कि वह हाथ असामान्य रूप से काँप रहा था। दादी कुछ बुदबुदाईं, शब्द साफ नहीं थे, लेकिन उनमें एक अजीब सी चेतावनी थी। "ये घर पुराना है ना... और जंगल भी घना है। यहाँ सांप आते रहना तो आम बात है। तुम इतना मत सोचो और नीचे आ कर चाय पियो," उन्होंने अपनी बूढ़ी, कांपती आवाज़ में कहा। लेकिन उनकी आँखों में कुछ और ही कहानी थी।
जब वे दोनों नीचे चले गए, शिवांशी कमरे में एक पल के लिए अकेली बची। उसने खिड़की बंद करने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी उसकी नज़र दीवार के पास बनी एक दरार पर पड़ी।
वहाँ से एक और सांप निकलकर चुपचाप बाहर की ओर रेंग रहा था।
शिवांशी की आवाज़ जैसे कहीं खो गई थी। उसने अपनी आँखें मलीं। 'क्या मुझे वहम हो रहा है? एक साथ दो-दो? नहीं, ये मेरी आँखों का धोखा है। थकावट है ये सब।' उसने खुद को ज़ोर से डाँटा। उसने कमरे की दीवारों की पुरानी लकड़ी को छुआ, उसकी खुरदरी सतह और सदियों पुरानी महक ने उसे हकीकत से जोड़ने की कोशिश की।
रात बढ़ती गई। बाहर मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बादलों की कड़कड़ाहट कमरे की खिड़कियों को हिला रही थी। खिड़की के कांच पर गिरती बूंदें ऐसी लग रही थीं मानो हज़ारों उंगलियाँ एक साथ कांच को खटखटा रही हों, अंदर आने की भीख माँग रही हों। शिवांशी बिस्तर पर लेटी छत को घूर रही थी।
अचानक बिजली कड़की।
उस एक पल की तेज़ नीली रोशनी में, खिड़की के बाहर दीवार पर एक विशाल परछाईं उभरी। ऐसा लगा मानो कोई विशाल जीव पूरे घर को अपनी पकड़ में लिए खड़ा हो। हवा में एक अजीब सा भारीपन आ गया था, जैसे कमरे की ऑक्सीजन कम हो गई हो।
शिवांशी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह हिम्मत करके उठकर खिड़की के पास गई। उसने बाहर झाँका, पर वहाँ बारिश और अंधेरे के अलावा कुछ नहीं था। केवल पेड़ों की टहनियाँ हवा में हिंसक रूप से झूम रही थीं, जो किसी कंकाल के हाथों जैसी लग रही थीं।
"पागल हो गई हूँ मैं," वह बुदबुदाई। "वो सिर्फ किसी पेड़ की परछाईं थी। बारिश में पेड़ों के आकार बदल जाते हैं। शिवांशी, होश में आओ।"
उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और कंबल के अंदर छिप गई। उसका तर्क कह रहा था कि ये सब इत्तेफाक हैं—नया घर, थकावट, बारिश और कुछ जंगली जानवर। लेकिन उसका डर कह रहा था कि कहानी इससे कहीं ज़्यादा गहरी है। उसे लगा जैसे घर की दीवारें धीरे-धीरे पास आ रही हैं, और बाहर जंगल में कोई चीज़ उसे पुकार रही है।
वह घंटों तक अंधेरे में जागती रही, हर आवाज़ पर चौंकती रही। कभी लकड़ी के फर्श के चटकने की आवाज़, तो कभी हवा के झोंके से खिड़की का हिलना। वह खुद को बार-बार समझा रही थी कि कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो ये सब 'वहम' बनकर उड़ जाएगा।
पर कहीं न कहीं, उसके मन के सबसे गहरे कोने में एक छोटा सा शक जन्म ले चुका था। एक ऐसा शक, जिसे उसका दिमाग मानने को तैयार नहीं था, पर उसकी रूह कांप रही थी।
नियति ने अपना जाल बिछा दिया था, और शिवांशी अब उस जाल का हिस्सा बन चुकी थी—चाहें वह इसे माने या न माने। जंगल की गहरी फुफकार अब बारिश के शोर में घुल चुकी थी।