Shakti ke Shiv - 21 in Hindi Women Focused by sheetal books and stories PDF | Shakti ke Shiv - 21

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Shakti ke Shiv - 21



अगली सुबह



शक्ति ने फोन उठाया और अलिशा को कॉल किया।

"अलिशा, मुझे उस नंबर की नई location चाहिए।"

"जी दीदी, अभी पता करवाती हूँ।"

कुछ मिनट बाद अलिशा का फोन आया।

"दीदी... location मिल गई है।"

"कहाँ?"

अलिशा ने जगह का नाम बताया।

शक्ति कुछ पल चुप रही।

"ठीक है। किसी को कुछ मत बताना। मैं खुद देखती हूँ।"

उसने फोन रखा और फाइल उठाई।

तभी उसकी नज़र मेज़ पर रखे उस छोटे से लिफाफे पर पड़ी, जो उसे पिछली रात उस रहस्यमयी घर में मिला था।

शक्ति ने उसे फिर से देखा।

उस पर लिखा सिर्फ़ एक शब्द अब भी साफ़ था—

"शक्ति।"

उसके चेहरे पर हल्की-सी गंभीर मुस्कान आई।

"तुम मुझे ढूँढ़ने पर मजबूर कर रहे हो..."

उसने लिफाफा बंद किया।

"लेकिन अब मैं भी देखती हूँ कि तुम्हारी मंज़िल कहाँ है।"

शक्ति कमरे से बाहर निकल गई।

उसे नहीं पता था कि जिस location की तरफ़ वो बढ़ रही थी...

वहीं दूसरी तरफ़ कोई और भी अपनी एक अलग तलाश में आगे बढ़ रहा था।


उधर शिवाय अपनी गाड़ी में बैठा पुराने documents देख रहा था।

उसकी नज़र एक पुराने पते पर जाकर रुक गई।

"यही आख़िरी location थी..."

उसने तुरंत Kushal को फोन किया।

"कुशल, मुझे इस address की पूरी जानकारी चाहिए।"

कुशल ने पूछा—

"अभी?"

"हाँ। और किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि हम इसकी तलाश कर रहे हैं।"

"ठीक है, सर। मैं पता लगाता हूँ।"

कॉल कट गई।

शिवाय ने कुछ पल उस कागज़ को देखा।

जिस सवाल का जवाब वो ढूँढ़ रहा था...

शायद अब उसकी तलाश उसे एक कदम और आगे ले जाने वाली थी।

उसने गाड़ी start की और वहाँ से निकल गया।

शिवाय ने गाड़ी की रफ्तार थोड़ी बढ़ा दी।

उसकी आँखों के सामने बार-बार वही पुराना पता घूम रहा था, जो उसे इतने सालों बाद मिला था। तेईस साल... एक लंबा वक्त होता है, लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब इंसान वक्त बीत जाने के बाद भी ढूँढ़ता रहता है।

कुछ देर बाद शिवाय ने गाड़ी सड़क के किनारे रोक दी।

उसने फोन निकाला और Kushal को दोबारा कॉल किया।

"कुछ पता चला?"

कुशल ने तुरंत जवाब दिया—

"हाँ, सर। Address तो वही है जो documents में दर्ज है, लेकिन वहाँ अब वो पुराना घर नहीं है।"

शिवाय की भौंहें सिकुड़ गईं।

"मतलब?"

"वहाँ करीब दस साल पहले एक नई building बन गई थी। लेकिन पुराने records में उस जगह का मालिकाना हक़ किसी और के नाम था।"

शिवाय कुछ पल चुप रहा।

"उस पुराने मालिक का नाम?"

कुशल ने नाम बताया।

शिवाय का चेहरा गंभीर हो गया।

वही नाम...

जिसे उसने अपनी पुरानी फाइलों में कई बार देखा था।

"कुशल, उस आदमी की पूरी जानकारी निकालो। परिवार, पुराना address, business... सब कुछ।"

"जी सर।"

"और एक बात..."

"जी?"

"ये काम बहुत सावधानी से करना। मुझे नहीं चाहिए कि उसे पता चले कि कोई उसके बारे में पूछताछ कर रहा है।"

"समझ गया, सर।"

कॉल खत्म हुई।

शिवाय ने सामने देखा।

सड़क पर गाड़ियाँ अपने रास्ते जा रही थीं, लेकिन उसके लिए वक्त जैसे वहीं रुक गया था।

तेईस साल पहले जो हुआ था, उसकी कुछ तस्वीरें आज भी उसके दिमाग में बिल्कुल साफ़ थीं।

एक अधूरी कहानी...

एक गायब हुआ सच...

और एक ऐसा सवाल जिसका जवाब उसे आज तक नहीं मिला था।

उसने अपनी मुट्ठी भींच ली।

"इस बार मैं खाली हाथ वापस नहीं जाऊँगा।"

शिवाय ने गाड़ी फिर start की।

उसे नहीं पता था कि उसकी तलाश अभी लंबी थी।

लेकिन इस बार उसके हाथ में पहली बार ऐसा सुराग था, जो उसे उस पुराने राज़ के बेहद करीब ले जा सकता था।

उधर…

शक्ति अपनी गाड़ी से उस location की तरफ़ बढ़ रही थी।

उसे लगातार महसूस हो रहा था कि कोई उसकी गाड़ी का पीछा कर रहा है।

उसने शीशे में देखा।

पीछे एक काली गाड़ी कुछ दूरी बनाए हुए थी।

शक्ति ने रास्ता बदला।

कुछ देर बाद उसने जानबूझकर अपनी गाड़ी एक सुनसान-सी गली की ओर मोड़ दी। पीछे आने वाली गाड़ी भी उसी तरफ मुड़ गई।

शक्ति के चेहरे पर हल्की-सी गंभीर मुस्कान आई।


उसने गाड़ी थोड़ी आगे ले जाकर रोक दी और मौका देखकर एक दूसरी संकरी गली में निकल गई।

वहाँ एक बंद पड़े रास्ते के पीछे छिपकर वह सामने देखने लगी।

कुछ ही सेकंड बाद वही आदमी वहाँ पहुँचा।

उसने चारों तरफ देखा।

"कहाँ गई?"

उसकी आवाज़ में झुंझलाहट साफ़ थी।

तभी पीछे से शक्ति की आवाज़ आई—

"मुझे ढूँढ़ रहे थे?"

वह आदमी अचानक पलटा।

शक्ति उसके सामने उस पर बंदूक ताने खड़ी थी।

" भागने की कोशिश मत करना।"

शक्ति के इतना कहते ही वह आदमी दूसरी तरफ़ भाग पड़ा।

"रुको!"

शक्ति भी उसके पीछे दौड़ पड़ी।

वह आदमी गली से निकलकर मुख्य सड़क की तरफ भागा। शक्ति लगातार उसके पीछे थी।

कुछ दूर तक पीछा करने के बाद दोनों एक भीड़भाड़ वाले बाज़ार में पहुँच गए।

आदमी ने पीछे मुड़कर देखा।

शक्ति अब भी उसके पीछे थी।

तभी सामने से आती एक चलती बस दिखाई दी।

वह आदमी बिना देर किए बस में चढ़ गया।


बस आगे निकल गई।

तभी अचानक शक्ति के सामने एक लड़की आ गई और वह उससे टकरा गई। शक्ति दो कदम आगे बढ़ी।

लेकिन गुस्से में वह वहीं रुक गई। 

उसने झुंझलाकर पैर ज़मीन पर पटका।

"इतनी मेहनत के बाद फिर हाथ से निकल गया!"

वह एक लड़की से टकरा गई थी।

लड़की की सब्ज़ियाँ सड़क पर बिखरी पड़ी थीं।

"अरे..."

शक्ति ने एक पल उस बस की ओर देखा, फिर उसकी नज़र उस लड़की पर गई, जिससे वह गलती से टकरा गई थी। उस आदमी के चक्कर में शक्ति ने अब तक उस लड़की पर ध्यान ही नहीं दिया था।

लड़की अपनी सब्ज़ियाँ समेटने लगी।

शक्ति ने सड़क की तरफ देखा और गहरी साँस ली।

उसके हाथ से एक बार फिर एक अहम सुराग निकल चुका था।

शक्ति कुछ पल तक उस लड़की को देखती रही, फिर नीचे बिखरी सब्ज़ियों को समेटने के लिए झुक गई।

"रुकिए, मैं आपकी मदद करती हूँ।"

लड़की ने नाराज़गी से उसकी तरफ देखा।

"देखकर नहीं चल सकतीं क्या?"

शक्ति ने बिना कुछ कहे सब्ज़ियाँ उठानी शुरू कर दीं।

तभी लड़की की नज़र अचानक शक्ति के चेहरे पर टिक गई।

वह कुछ पल उसे पहचानने की कोशिश करती रही।

फिर उसकी आँखें बड़ी हो गईं।

"अरे... तुम तो वही हो ना?"

शक्ति ने उसकी तरफ देखा।

लड़की ने हैरानी से कहा—

"वही घाट वाली लड़की... जिसे मेरे भाई ने उस दिन पानी में डूबने से बचाया था!"

शक्ति का हाथ वहीं रुक गया।

उसने लड़की को ध्यान से देखा।

अचानक उसे उस रात का पूरा दृश्य याद आ गया।

घाट...

पानी...

और फिर वही चेहरा, जो उस समय शिवाय के साथ खड़ा था।

शक्ति ने गौर से पूछा—

"अरे हाँ... तुम तो वही हो ना, जो उस दिन उस आदमी के साथ थी?"

लड़की मुस्कुराई।

"हाँ। वो आदमी मेरा बड़ा भाई है।"

शक्ति के चेहरे पर एक पल के लिए अजीब-सी झिझक आई।

फिर उसने हल्की आवाज़ में कहा—

"ओह... अच्छा। Sorry, उस दिन मैंने तुम्हारे भाई के साथ बदतमीज़ी कर दी। मुझे उनसे इस तरह बात नहीं करनी चाहिए थी।”

लड़की ने सब्ज़ियाँ टोकरी में रखते हुए कहा—

"कोई बात नहीं। 

शक्ति कुछ कहती, उससे पहले ही लड़की मुस्कुरा दी।


शक्ति ने उसकी तरफ देखा

उसके चेहरे पर अनजाने में उस रात की एक झलक आ गई।

फिर उसने नज़रें हटा लीं।


लेकिन इस बार उसके मन में एक सवाल जरूर उठा—

अगर ये उसका भाई है... तो आखिर ये परिवार कौन है, जिसके रास्ते से मैं बार-बार टकरा रही हूँ?

शिवानी ने आख़िरी सब्ज़ी उठाकर टोकरी में रखी और खड़ी हो गई।

"वैसे... मेरा नाम शिवानी है। आपका?"

शक्ति ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

"शक्ति।"

शिवानी के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई।

"वाह! क्या बात है... ये नाम तो मेरी भाभी का भी है।"

शक्ति ने हल्के आश्चर्य से पूछा—

"अच्छा? वैसे तुम्हारी भाभी उस दिन घाट पर नहीं दिखीं मुझे।"

"नहीं, वो वहाँ नहीं थीं।"

शिवानी ने सहजता से कहा—

"वो मेरे शिवाय भैया की पत्नी हैं।"

शक्ति ने कुछ पल उसे देखा।

"शिवाय?"

उसके चेहरे पर साफ़ नासमझी थी।

शिवानी ने शक्ति के चेहरे के भाव पढ़ लिए।

"आपको नहीं पता शिवाय कौन हैं?"

शक्ति ने हल्का-सा सिर हिलाया।

शिवानी मुस्कुराई।

"दरअसल... जिन्होंने आपको उस दिन पानी से बचाया था, वो मेरे भाई शिवाय ही हैं।"

शक्ति के चेहरे पर हल्की हैरानी आई, फिर उसे जैसे बात समझ में आई।

"अच्छा... Sorry, मुझे पता नहीं था।"

"It's okay।"

तभी पीछे से एक गाड़ी आकर रुकी।

अलिशा जल्दी से गाड़ी से उतरी और शक्ति के पास आ गई।

"दीदी, क्या हुआ?"

शक्ति ने तुरंत उसे शांत रहने का इशारा किया।

वह शिवानी के सामने अपने काम या अपनी पहचान से जुड़ी कोई बात नहीं करना चाहती थी।

अलिशा समझ गई और चुप हो गई।

शिवानी ने दोनों को देखा, लेकिन कुछ पूछा नहीं।

शक्ति ने आख़िरी बार सड़क की तरफ देखा, जहाँ कुछ देर पहले वह आदमी बस में बैठकर भागा था।

मामला अभी खत्म नहीं हुआ था...

लेकिन आज उसकी मुलाकात अनजाने में उस परिवार के एक और सदस्य से हो चुकी थी, जिसका एक सदस्य उसकी ज़िंदगी में पहले ही दस्तक दे चुका था।

क्या ये सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक़ था... या उनकी किस्मत उन्हें बार-बार एक-दूसरे के रास्ते में ला रही थी?
जानने के लिए पढ़ते रहिए Shakti Ke Shiv...