आगे के भाग में आप ने सुना की कैसे दोनों मां बेटी के पर दुखों का समंदर आन पड़ा है। अब क्या होगा दोनों की तकदीर में क्या अभी भी उनके जीवन में मुसीबतें आना बाकी है ?
कहते हैं ना कि जब इंसान पे दुख आता है तब संघर्ष करने का समय होता है। किसी भी इंसान के जीवन में सिर्फ सुख या सिर्फ दुख नहीं होता। अगर आप इस समय दुखी हो इसका मतलब जल्द ही आपके जीवन में सुख आने वाला है।
पर क्या करें किसे पता था कि दृष्टि के जीवन अभी तक एक बहुत बड़ी चुनौती बाकी थी।
एक औरत ससुराल में सभी दुख सहन कर सकती हैं अगर उसका पति उसके साथ हो तो प्रर दृष्टि के जीवन में ये सुख भी नहीं था ।
उसका पति तो उसकी और देखता तक नहीं था। एक बात थी कि वह उसके माता-पिता की तरह रूढ़ीवादी विचारों का समर्थन नहीं करता था पर वो दृष्टि को जानता तक नहीं था और उसकी शादी भी हो गयी । दृष्टि तो कब की भुल चुकी थी अपने सपनों को क्योंकि उसे कहीं न कहीं पता था कि उसके सपने कभी सच नहीं होंगे।
कहते हैं ना कि कुछ समय जानवर के साथ भी रह लो तो उससे भी लगाव हो जाता है तो फिर वो तो इंसान है। शादी के दो साल हो चुके हैं अब तो दिपक भी दृष्टि के साथ अच्छा व्यवहार करता था। अब वे दोनों काफी अच्छे दोस्त बन चुके थे पर अभी तक दिपक ने दृष्टि को अपनी पत्नी का दर्जा नहीं दिया था।
दिपक एक पढ़ा लिखा लड़का था उसका बचपन से एक ही सपना था पायलट बनना पर कुछ कारण से वह परीक्षा नहीं दे पा रहा था।
पर इस साल उसने ठान लिया कि वह परीक्षा देगा । ये बात दृष्टि को बताने पर उसकी आंखों से आंंसु की धार छलक पड़ी ।
ऐसे उसे रोते देखकर दिपक ने कहा " क्या हुआ तुम ऐसे उदास क्यों हो गयी ।"। बहुत पुछने पर उसने बताया कि उसका भी पायलट बनने का सपना था पर उसके पिता के कारण वह परीक्षा नहीं दे पायी थी।
दिपक ने कहा कि " कोई बात नहीं तब नहीं दे पायी तो कोई बात नहीं अब देदो ।"
ये सुनकर दृष्टि खुशी से झूम ने लगी । उसे लगा था कि वो कभी अपना सपना पूरा नहीं कर पाएगी वो उसे सच होता दिख रहा था।
दुसरे पर वो फिर उदास हो गई।
फिर दिपक ने पूछा " अब क्या हुआ तुम फिर से क्यो दुखी हो गयी क्या तुम खुश नहीं हो । "
दृष्टि ने कहा " ऐसी बात नहीं है में बहुत खुश हूं पर क्या बाकी घरवाले मानेंगे । वे मुझे इसके लिए अनुमति नहीं देंगे ।
तब दिपक उसे समझाता है कि"
तुम चिंता मत करो मैं अपने माता-पिता को मना लुंगा । वे लोग मेरी बात जरूर मानेंगे।
दुसरी तरफ कजरी भी बस यही आशा मे थी कि उसकी बेटी जरुर आएगी । बस जेसे की उसे आखरी बार सही सलामत देखने के लिए ही जिंदा हो ।
क्या दिपक के कहने से उसके माता-पिता मानेंगे दृष्टि को आगे परीक्षा देने के लिए ?
क्या दिपक दृष्टि को अपनी के रुप में स्वीकार करेगा ?