एक आम सी प्रेम कहानी
भाग - १२
लेखिका "अनामिका"
उधर निहारिका के घर में माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
उसकी माँ किचन में कुछ काम कर रही थीं कि तभी हॉल से उनके फ़ोन की घंटी बज उठी। वह काम छोड़ बाहर आईं तो देखा कि स्क्रीन पर मलय की माँ—जो उनकी पुरानी सहेली भी थीं—का नाम चमक रहा था। उनका चेहरा खुशी से खिल उठा।
उन्होंने तुरंत फ़ोन उठाकर मुस्कुराते हुए कहा, "हेलो! कैसी हो? क्या कर रही हो और आज अचानक मेरी कैसे याद आ गई?"
दूसरी तरफ से मलय की माँ बोलीं, "अरे, कल कैफ़े में हमारी जो बात हुई थी, वह तो अधूरी ही रह गई थी। अब हम सोच रहे हैं कि जब मलय और निहारिका दोनों एक-दूसरे को इतना पसंद करते ही हैं, तो फिर देर किस बात की? क्यों न हम सब इस संडे रिश्ता लेकर तुम्हारे घर आ जाएं?"
यह सुनते ही निहारिका की माँ की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने तुरंत कहा, "हाँ-हाँ, क्यों नहीं! हम इंतज़ार करेंगे।"
दोनों के बीच कुछ देर हँसी-खुशी बातें हुईं और फ़ोन कट गया। लेकिन जैसे ही निहारिका की माँ मुस्कुराते हुए पीछे मुड़ीं, उनके कदम वहीं ठिठक गए। हॉल में सोफ़े पर बैठे उसके पापा अख़बार पढ़ रहे थे। उन्होंने अख़बार नीचे करते हुए पूछा, "क्यों, क्या हुआ? कौन आ रहा है और किससे बातें हो रही थीं?"
उनकी गंभीर आवाज़ सुनकर माँ थोड़ा घबरा गईं। सहमी हुई आवाज़ में बोलीं, "वह... मैंने आपको कल बताया था न? मलय के घरवाले... वे लोग इस संडे रिश्ता लेकर आना चाहते हैं।"
यह सुनते ही उसके पापा का पारा चढ़ गया। वह ग़ुस्से में तमतमाते हुए बोले, "हमारी इस बारे में कल ही बात हुई थी न? और तुमने उन्हें संडे को बुला भी लिया! मुझसे बिना पूछे यह फ़ैसला कैसे ले लिया तुमने?"
अभी यह बहस चल ही रही थी कि दरवाज़े पर खड़ी निहारिका ने यह सब देख लिया। वह बुरी तरह घबरा गई और चुपचाप सर झुकाए अंदर आकर खड़ी हो गई।
उस पर नज़र पड़ते ही उसके पापा उसकी तरफ़ मुड़े और कड़क आवाज़ में बोले, "तुम! तुम यह सब क्या कर रही हो? अपने बारे में कुछ सोच भी रही हो या नहीं? तुम्हारी अभी पढ़ाई करने की उम्र है। पढ़ाई-लिखाई छोड़कर क्या तुम शादी-ब्याह के लिए तैयार हो गई हो? आगे कुछ करना चाहती हो या नहीं?"
निहारिका का दिल दहल गया था। डर और घबराहट के मारे उसके आँसू छलकने को थे। वह कांपती आवाज़ में बस इतना ही कह पाई, "मैं... मैं कुछ नहीं जानती पापा। न फ़्यूचर के बारे में, न पढ़ाई के बारे में और न ही शादी के बारे में... मैं बस इतना जानती हूँ कि मैं उन्हें पसंद करती हूँ।"
अपनी शांत और मासूम बेटी के मुँह से पहली बार ऐसी बात सुनकर उसके पापा स्तब्ध रह गए। वह कुछ सोच में पड़ गए और फिर बिना कुछ कहे ग़ुस्से में सीधे अपने कमरे में चले गए।
अगली सुबह—नाश्ते की मेज़ पर
अगले दिन सुबह डाइनिंग टेबल पर उसके पापा चुपचाप बैठे थे। निहारिका डरते-डरते उन्हें नाश्ता परोस रही थी और माँ भी पास ही काम में लगी हुई थीं। माहौल में एक भारी ख़ामोशी थी।
अचानक उसके पापा ने नाश्ता करते हुए कहा, "ठीक है। अगर तुम सबकी यही मर्ज़ी है, तो बुला लो लड़के वालों को संडे को। लेकिन याद रखना... मैंने अभी शादी के लिए 'हाँ' नहीं कही है। तुम लोगों का मन था, इसलिए मैंने आने की इज़ाज़त दी है। मैं शादी के लिए हाँ तभी करूँगा, जब वे लोग मेरी कुछ शर्तें मानेंगे।"
इतना कहकर वह उठकर चले गए।
यह सुनते ही निहारिका और उसकी माँ के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। आखिर क्या शर्तें होंगी? क्या सब ठीक हो पाएगा? कमरे में आकर माँ ने निहारिका को गले से लगाया और समझाते हुए बोलीं, "घबराओ मत बेटा। तुम अपने पापा को जानती ही हो... और फिर तुमने पहली बार उनके सामने अपने दिल की बात रखी है, तो उनका ऐसा मिज़ाज होना जायज़ है। हिम्मत रखो, अब जो भी होगा, संडे को ही पता चलेगा।"
पूरा हफ्ता इसी उधेड़बुन और घबराहट में बीत गया कि शादी की शर्तें क्या होंगी और माहौल कैसा रहेगा। आखिरकार रविवार का दिन आ ही गया। सुबह निहारिका भी बहुत सुंदर तरीके से तैयार हुई थी, क्योंकि आज मलय और उसके घरवाले उसे देखने आने वाले थे।
सुबह करीब नौ बजे अचानक घर की घंटी बजी। निहारिका की मां ने उत्सुकता से दरवाजा खोला तो सामने अपनी पुरानी सहेली (मलय की मां) को देखकर उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने तुरंत उन्हें गले लगा लिया और हंसते हुए बोलीं, "मैं कब से तुम लोगों का ही रास्ता देख रही थी, आओ-आओ, अंदर आओ!" मलय ने आगे बढ़कर निहारिका की मां के पैर छूकर नमस्ते किया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया।
जैसे ही सब लोग अंदर दाखिल हुए, निहारिका के पापा अपने कमरे से बाहर आए। मलय के माता-पिता ने आगे बढ़कर उन्हें नमस्ते किया, तो उन्होंने भी थोड़े बेमन से हाथ जोड़ लिए। जब मलय ने झुककर उनके पैर छुए, तो उन्होंने बिना किसी खास उत्साह के उसके सिर पर हाथ रखा और सबको हॉल में बैठने का इशारा किया।
सब लोग हॉल में बैठकर औपचारिकता निभा ही रहे थे कि निहारिका चाय-नाश्ते की ट्रे लेकर पहुंची। उसने बहुत ही सादगी से मलय के माता-पिता के पैर छुए। मलय की मां ने प्यार से उसका हाथ थामा, आशीर्वाद दिया और अपने पास बैठने को कहा। निहारिका झिझकते हुए वहीं बैठ गई।
बातचीत का दौर शुरू ही हुआ था कि मलय के पापा ने मुस्कुराते हुए शादी का विषय छेड़ा। यह सुनते ही निहारिका के पापा का चेहरा गंभीर हो गया। वे बोले, "हां, मुझे भी शादी के सिलसिले में कुछ जरूरी बात करनी है।" यह सुनते ही निहारिका और उसकी मां के दिल की धड़कनें तेज हो गईं।
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया और बाकी सब भी उत्सुकता से देखने लगे कि आखिर वे क्या कहने वाले हैं।
बारहवा भाग समाप्त, कहानी जारी है....