उत्तर प्रदेश मदरसा एजुकेशन बोर्ड एक्ट 2004, जिसे मुलायम सिंह सरकार ने विधानमंडल से पारित करवाया था, उसपर टिप्पणी देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मदरसा के माध्यम से प्रदान की जानेवाली कामिल-फाजिल डिग्री को असंवैधानिक करार दे दिया है।
शिखर कोर्ट ने कहा है,‘‘मदरसों से प्रदाय की जानेवाली स्नातक और परास्नातक डिग्री (कामिल-फाजिल) यूजीसी एक्ट के विरूद्ध होने से ये असंवैधानिक हैं।’’
सवाल यही कि जब मदरसों से प्रदाय की जानेवाली डिग्रियां अवैध हैं, तब देश में धर्मविषयक तालीम की क्या जरूरत, जो असंवैधानिक डिग्रियां बांटकर डिग्रीधारियों को जहां काहिल व जाहिल बना रहे हैं, वहीं आतंकियों व जेहादियों की फौज खड़ी कर रहे है।
क्या देश-प्रदेश की सरकारें कभी यह पता लगाने की कोशिश करी हैं कि मदरसों से शिक्षित होकर कितने युवा आतंकी, उग्रवादी, अलगाववादी, पत्थरबाज, दंगाबाज, पिस्टलबाज, तलवारबाज, उपद्रवी, उत्पाती और अपराधी बने हैं और कितने ऐसे हैं, जो डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, अफसर, तकनीशियन व सफल कारोबारी आदि बने हैं?
यही नहीं, मदरसों से पढ़कर ऐसे कितने फिरकापरस्त निकले हैं, जो भारत में रहकर व भारत का खा-पी कर पाकिस्तान व फिलिस्तीन जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और कभी भूल कर भी भारत माता का जयकारा नहीं करते; वंदे मातरम व जय हिंद नहीं कहते।
ऐसे कितने शोहदे हैं, जो भारत तेरे टुकड़े होंगे कहते हैं और कितने ऐसे हैं, जो दाऊद इब्राहिम, मसूद अजहर, जाकिर नाईक, याबूब मेमन, हसन नसरुल्लाह, हाफिज सईद, अफजल गुरु, याकूब मेमन, बिन लादेन इत्यादि आतंकी आकाओं को अपना आदर्श मानते हैं?
क्या ऐसी अहम जानकारियां रखना सरकारों का काम नहीं है? यदि नहीं, तो ऐसी निहायत जरूरी जानकारी कौन रखेगा? जब पानी सर से ऊपर निकल जाएगा और देश में गृहयुद्ध के माध्यम से गजवा-ए-हिंद करने का प्रयास किया जाएगा, तब क्या सरकारें सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटती रहेंगी?
कटुप्रश्न यह भी कि क्या सरकारें फखत रेवड़ियां बांट कर खजाना खाली करने के लिए होती हैं और आमजनों पर विविध किस्म के टैक्स की लूट करने के लिए या उन खतरनाक प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने के लिए, जो देश पर मंडरा रही हैं।
गौर-ए-काबिल है कि मदरसों को पांचवीं (तहतानियां), आठवीं (फौकानिया), दसवीं (मुंशी-मौलवी), बारहवीं (आलिम), स्नातक (कामिल) तथा परास्नातक (फाजिल) डिग्री देने का अधिकार दिया गया है।
इसमें तहतानियां, फौकानिया, मुंशी-मौलवी और आलिम के सर्टिफिकेट को मान्यता देने में मदरसों को ज्यादा अड़चन इसीलिए नहीं हुआ क्योंकि ये लोवर व हायर प्रमाणपत्र यूपी एजुकेशन बोर्ड के अंडरकवर में आते हैं।
लेकिन, कामिल व फाजिल डिग्रियां उच्चशिक्षा के अधीन आते हैं, इसीलिए मामला वहां जाकर अटक गया।
संविधान का आर्टिकल 30 (1) अल्पसंख्यक समाज को शिक्षण संस्थाएं खोलने का अधिकार देता है, किंतु इसके अंतर्गत संस्थाओं की डिग्री को मान्यता देने का अधिकार नहीं है। उच्चशिक्षा के लिए यह अधिकार यूजीसी को ही प्राप्त है।
चूंकि मदरसा बोर्ड, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 की धारा 2(एफ) के तहत मान्यता प्राप्त नहीं है, इसीलिए इसके द्वारा प्रदत्त कामिल एवं फाजिल की डिग्रियां विधिसम्मत नहीं है।
इसकी एक वजह यह भी कि मदरसों में स्तरीय व गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा प्रदान नहीं की जाती, इसीलिए यूजीसी ने मदरसों को उच्च शिक्षा के लिए मान्यता देना जरूरी नहीं समझा।
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