अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 59: दो बहनें और एक अधूरी कहानी
"दीदी..."
नैना के मुँह से निकला वह एक शब्द पूरे कमरे में गूँज गया।
अनन्या जैसे पत्थर की मूर्ति बन गई।
उसकी आँखें नैना पर टिकी थीं।
उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि नैना ने उसे दीदी कहा था।
लेकिन उसके भीतर कुछ था...
जो उस एक शब्द को पहचान चुका था।
एक पुरानी याद...
एक छोटी-सी बच्ची...
दो चोटियाँ...
हाथ में रंगीन पेंसिल...
और एक छोटी बच्ची अनन्या के पीछे भागते हुए कह रही थी—
"दीदी, मेरा भी नाम कहानी में लिखो ना..."
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
सिर में तेज़ दर्द उठा।
"नहीं..."
आरव ने तुरंत उसे संभाला।
"अनन्या!"
उसने आँखें खोलीं।
"मुझे याद आ रहा है..."
"थोड़ा-थोड़ा..."
कबीर ने नैना की तरफ देखा।
"तो आखिरकार..."
"तुम्हें याद आ ही गया।"
नैना की आँखों से आँसू बह रहे थे।
लेकिन उसकी आँखों का काला रंग अभी भी पूरी तरह नहीं गया था।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
"मुझे सब याद नहीं..."
"लेकिन इतना याद है..."
"मैं तुम्हारे साथ रहती थी।"
अनन्या ने एक कदम आगे बढ़ाया।
"तुम मेरी बहन थी..."
नैना ने धीरे से सिर हिलाया।
"थी नहीं..."
"हूँ।"
अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले।
वह नैना की ओर बढ़ी।
लेकिन अचानक नैना के शरीर के चारों ओर काली स्याही घूमने लगी।
अनन्या वहीं रुक गई।
भक्षक की आवाज़ गूँजी—
"भावुक होने का समय नहीं है।"
"तुम दोनों की मुलाकात..."
"मेरी योजना का हिस्सा थी।"
आरव ने गुस्से से कहा—
"उसे छोड़ दो!"
भक्षक हँसा।
"मैंने उसे पकड़ा नहीं है..."
"मैंने सिर्फ उसके अंदर छिपा डर जगाया है।"
कबीर ने तुरंत कहा—
"नैना!"
"तुम्हें उसकी आवाज़ नहीं सुननी।"
नैना ने अपना सिर पकड़ लिया।
"मैं कोशिश कर रही हूँ..."
भक्षक की आवाज़ उसके भीतर गूँज रही थी—
"तुम्हारी बहन ने तुम्हें छोड़ दिया था।"
"उसने तुम्हारी कहानी मिटा दी।"
"उसने तुम्हें भुला दिया।"
नैना की आँखें फिर काली होने लगीं।
"दीदी..."
उसकी आवाज़ टूट गई।
"क्या यह सच है?"
अनन्या चुप रही।
यही उसकी सबसे बड़ी गलती होती।
इस बार उसने झूठ नहीं बोला।
उसने कहा—
"हाँ।"
नैना ने उसकी ओर देखा।
"तुमने मुझे भुला दिया था?"
अनन्या की आँखों से आँसू बहने लगे।
"हाँ..."
"लेकिन इसलिए नहीं कि मैं तुमसे दूर जाना चाहती थी।"
"मैंने तुम्हें इसलिए अपनी यादों से मिटाया..."
"क्योंकि मुझे लगा था..."
"अगर मैं तुम्हें याद रखूँगी..."
"तो भक्षक तुम्हें ढूँढ लेगा।"
नैना की आँखों में दर्द था।
"तो तुमने मुझे बचाने के लिए..."
"मुझे ही भूल गई?"
अनन्या ने सिर झुका लिया।
"हाँ।"
नैना के चेहरे पर आँसू बहने लगे।
"मुझे तुमसे नफरत करनी चाहिए।"
अनन्या ने धीरे से कहा—
"अगर तुम्हें करनी है..."
"तो करो।"
"लेकिन..."
"मुझे तुमसे प्यार करना बंद नहीं होगा।"
नैना की काली आँखों में सुनहरी चमक की एक हल्की रेखा दिखाई दी।
भक्षक अचानक गरजा—
"चुप!"
काली स्याही नैना के शरीर के चारों ओर और तेज़ी से घूमने लगी।
कबीर चिल्लाया—
"अनन्या!"
"उसका डर बढ़ रहा है!"
अनन्या ने नैना की तरफ हाथ बढ़ाया।
"नैना!"
"मेरी तरफ देखो।"
नैना ने धीरे-धीरे उसकी ओर देखा।
"तुम्हें कुछ याद करने की जरूरत नहीं।"
"बस..."
"मेरा हाथ पकड़ लो।"
नैना काँपते हुए आगे बढ़ी।
उसकी उँगलियाँ अनन्या की उँगलियों से छूने ही वाली थीं कि—
धड़ाम!
काली स्याही का एक तेज़ झटका दोनों को अलग कर गया।
अनन्या पीछे जा गिरी।
आरव ने उसे पकड़ लिया।
"अनन्या!"
नैना चीख उठी—
"दीदी!"
उसकी चीख के साथ पूरी इमारत काँप गई।
दीवारों पर लिखी हजारों अधूरी कहानियाँ चमक उठीं।
एक-एक करके सारे पन्ने हवा में उड़ने लगे।
कबीर ने ऊपर देखा।
"यह क्या हो रहा है?"
अधूरी किताब हवा में उठ गई।
उसके पन्ने तेजी से पलटने लगे।
फिर एक पन्ने पर दो नाम चमके—
अनन्या
नैना
उन दोनों नामों के बीच एक सुनहरी रेखा बन गई।
कबीर की आँखें फैल गईं।
"यही है..."
आरव ने पूछा—
"क्या?"
"इन दोनों का रिश्ता..."
"सिर्फ बहनों का रिश्ता नहीं है।"
अनन्या ने उसकी ओर देखा।
"फिर क्या है?"
कबीर ने कहा—
"दोनों एक ही कहानी के दो हिस्से हैं।"
"अनन्या..."
"कहानी की लेखिका।"
"और नैना..."
वह रुक गया।
"कहानी की आवाज़।"
नैना ने हैरानी से पूछा—
"आवाज़?"
कबीर ने कहा—
"अनन्या कहानी लिख सकती है।"
"लेकिन नैना..."
"कहानी के अंदर मौजूद भावनाओं को जगा सकती है।"
आरव ने समझते हुए कहा—
"इसलिए भक्षक उसे अपने कब्जे में लेना चाहता है।"
कबीर ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"अगर भक्षक नैना को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लेता है..."
"तो वह हर कहानी के अंदर मौजूद डर को जगा सकता है।"
अनन्या ने नैना की तरफ देखा।
"तो हमें इसे रोकना होगा।"
अचानक...
नैना ने अपना सिर उठाया।
उसकी आँखों में अब आधी काली और आधी सुनहरी रोशनी थी।
उसने भक्षक की तरफ देखा।
"तुमने कहा था..."
"मैं तुम्हारी कहानी का हिस्सा हूँ।"
भक्षक हँसा।
"हाँ।"
नैना ने कहा—
"लेकिन तुमने एक बात भूल की।"
भक्षक शांत हो गया।
नैना की आवाज़ बदलने लगी।
अब उसमें अजीब शक्ति थी।
"तुमने मुझे डर दिया..."
"लेकिन मेरी बहन ने मुझे प्यार दिया।"
"तुमने मुझे मेरी यादें छीनकर कमजोर करना चाहा..."
"लेकिन उसने मुझे वापस पहचान लिया।"
काली स्याही उसके शरीर से बाहर निकलने लगी।
भक्षक पीछे हट गया।
"नहीं..."
नैना ने हाथ आगे बढ़ाया।
"तुम लोगों के डर से ताकतवर होते हो।"
"लेकिन..."
"तुम प्यार को समझते ही नहीं।"
सुनहरी रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।
भक्षक की काली आकृति पीछे हटने लगी।
"तुम मुझे हरा नहीं सकती!"
नैना ने कहा—
"मैं तुम्हें हरा नहीं रही।"
"मैं..."
"तुम्हें कहानी से बाहर कर रही हूँ।"
उसने अपनी हथेली बंद कर ली।
काली स्याही का एक बड़ा हिस्सा उसके शरीर से निकलकर हवा में चला गया।
फिर वह स्याही एक छोटे काले गोले में बदल गई।
कबीर ने उसे देखते ही कहा—
"नैना!"
"इसे मत छूना!"
लेकिन देर हो चुकी थी।
नैना ने उस गोले को हाथ में ले लिया।
भक्षक की आवाज़ आखिरी बार गूँजी—
"तुमने मुझे अपने अंदर से निकाल दिया..."
"लेकिन अब मैं कहाँ जाऊँगा?"
नैना ने धीरे से कहा—
"जहाँ हर अधूरा डर जाता है।"
उसने काला गोला हवा में छोड़ दिया।
वह सीधा अधूरी किताब की ओर चला गया।
किताब खुली।
और काला गोला उसके अंदर समा गया।
एक पल के लिए पूरी इमारत शांत हो गई।
फिर...
धड़ाम!
सारी खिड़कियाँ टूट गईं।
अंधेरा छा गया।
अनन्या ने नैना को पकड़ लिया।
"नैना!"
नैना बेहोश होकर उसकी बाँहों में गिर गई।
आरव ने तुरंत कहा—
"हमें इसे यहाँ से निकालना होगा।"
कबीर किताब के पास गया।
उसने आखिरी पन्ना देखा।
उस पर नया वाक्य लिखा था—
"भक्षक कहानी से बाहर नहीं गया..."
नीचे दूसरी पंक्ति उभरी—
"वह कहानी के सबसे गहरे हिस्से में चला गया है।"
कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।
"यह अच्छी बात नहीं है।"
आरव ने पूछा—
"क्यों?"
कबीर ने किताब बंद करते हुए कहा—
"क्योंकि अब वह दिखाई नहीं देगा।"
"लेकिन..."
"वह हर कहानी के अंदर छिप सकता है।"
अनन्या ने नैना को अपनी बाँहों में कसकर पकड़ लिया।
"तो हमें क्या करना होगा?"
कबीर ने किताब उसकी ओर बढ़ाई।
"अब हमें उसकी तलाश नहीं करनी।"
"हमें..."
"उस कहानी को ढूँढना होगा जिसमें वह छिपा है।"
अनन्या ने किताब खोली।
एक नया पन्ना सामने आया।
उस पर सिर्फ एक नाम लिखा था—
"अंतिम पुस्तकालय"
और उसके नीचे—
"जहाँ हर कहानी का पहला शब्द सुरक्षित है..."
अनन्या ने धीरे से पढ़ा।
"अंतिम पुस्तकालय..."
आरव ने पूछा—
"यह कहाँ है?"
कबीर ने बाहर की अंधेरी सड़क की ओर देखा।
उसके चेहरे पर पहली बार सच्चा डर दिखाई दिया।
"मुझे नहीं पता..."
फिर उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—
"क्योंकि उस जगह का रास्ता किसी नक्शे में नहीं है।"
अनन्या ने पूछा—
"तो रास्ता कैसे मिलेगा?"
कबीर ने अधूरी किताब की ओर देखा।
किताब के पन्ने अपने-आप पलटे।
और पहली बार...
उस पर एक पूरा वाक्य लिखा दिखाई दिया—
"जिस दिन तीन लोग एक ही कहानी को अपने-अपने तरीके से याद करेंगे..."
"उसी दिन अंतिम पुस्तकालय का दरवाज़ा खुलेगा।"
आरव ने अनन्या की ओर देखा।
नैना अभी भी बेहोश थी।
कबीर ने कहा—
"अब हमारी अगली परीक्षा..."
"यादों की होगी।"
और उसी क्षण...
नैना ने बंद आँखों से फुसफुसाया—
"दीदी..."
अनन्या उसके पास झुकी।
नैना ने धीरे से कहा—
"मुझे याद आ गया है..."
अनन्या का दिल जोर से धड़क उठा।
"क्या?"
नैना ने आँखें खोले बिना कहा—
"अंतिम पुस्तकालय कहाँ है..."
और अगले ही पल...
उसकी आँखें खुल गईं।
उनमें सुनहरी रोशनी थी।
क्रमशः...