एपिसोड 42— गायब हुई फाइल और घर का गद्दार
सिटी हॉस्पिटल से वापस लौटते समय अर्जुन के दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—
दादा की स्टडी... तीसरा खाना... और वो दस्तावेज।
उसने बाइक की स्पीड बढ़ा दी।
पीछे कार में आयत और उसकी माँ नूरजहाँ बैठी थीं। आयत खिड़की से बाहर देख रही थी, लेकिन उसका दिमाग अभी भी पुराने हॉस्पिटल में हुई घटनाओं में उलझा हुआ था।
आज उसे पंद्रह साल बाद अपनी माँ मिली थी।
लेकिन अपनी माँ को पाने की खुशी से ज्यादा उसके सामने सवाल खड़े थे।
उसके पिता की मौत...
रुद्र वशिष्ठ...
उसके दादा...
और वो रहस्यमयी चीज़, जिसके लिए रुद्र इतने सालों से उसे ढूँढ रहा था।
आयत ने धीरे से पूछा,
"अर्जुन... क्या आपको लगता है कि मेरे अंदर सच में कोई ऐसी चीज़ है, जिसके बारे में मुझे खुद नहीं पता?"
अर्जुन ने कुछ पल चुप रहकर कहा,
"मुझे नहीं पता। लेकिन एक बात पता है..."
"क्या?"
"रुद्र तुम्हें सिर्फ डराने के लिए ये सब नहीं कर रहा। उसके पीछे कोई बहुत बड़ा मकसद है।"
आयत ने अपनी माँ की तरफ देखा।
नूरजहाँ चुप थीं।
अर्जुन ने रियर-व्यू मिरर में उन्हें देखा।
"आपको कुछ पता है, है ना?"
नूरजहाँ ने तुरंत नजरें झुका लीं।
"जो मुझे पता है, वो इतना ही है कि तुम्हारे दादा ने आयत को बचाने के लिए बहुत बड़ा फैसला लिया था।"
"कैसा फैसला?"
"मुझे नहीं पता।"
अर्जुन ने लंबी साँस ली।
"आज सब पता चल जाएगा।"
वशिष्ठ हवेली
करीब आधे घंटे बाद अर्जुन हवेली पहुँचा।
गाड़ी रुकते ही वह तेजी से अंदर गया।
आयत और नूरजहाँ भी उसके पीछे-पीछे अंदर आईं।
हवेली में मौजूद नौकर उन्हें देखकर हैरान रह गए।
आयत की नजर चारों तरफ घूम रही थी।
इतनी बड़ी हवेली उसने पहली बार देखी थी।
लेकिन अर्जुन के पास उसे देखने का वक्त नहीं था।
वह सीधे अपने दादा की पुरानी स्टडी की तरफ बढ़ा।
दरवाजा खुला हुआ था।
अर्जुन अचानक रुक गया।
उसका चेहरा गंभीर हो गया।
"ये दरवाजा खुला कैसे है?"
नूरजहाँ भी वहीं रुक गईं।
अर्जुन ने धीरे से दरवाजा खोला।
कमरे में सब कुछ बिखरा हुआ था।
किताबें नीचे पड़ी थीं।
दराजें खुली थीं।
और मेज पर रखी पुरानी फाइलें जमीन पर फैली थीं।
अर्जुन ने तुरंत अलमारी की तरफ देखा।
वह दौड़कर उसके पास गया।
तीसरा खाना खोला।
खाली।
अर्जुन की मुट्ठी कस गई।
"फाइल गायब है।"
आयत ने पूछा,
"कौन-सी फाइल?"
"वही... जिसमें तुम्हारे अतीत का सच था।"
आयत के चेहरे पर चिंता आ गई।
"लेकिन ये यहाँ से किसने ली?"
अर्जुन ने कमरे को ध्यान से देखा।
अचानक उसकी नजर फर्श पर पड़ी।
वहाँ मिट्टी का एक छोटा-सा निशान था।
जैसे किसी के जूते से गीली मिट्टी लगी हो।
अर्जुन नीचे बैठा।
उसने निशान को गौर से देखा।
फिर उसकी नजर खिड़की पर गई।
खिड़की खुली थी।
"कोई बाहर से आया था..."
आयत ने पूछा,
"तो क्या वो फाइल लेकर भाग गया?"
अर्जुन ने सिर हिलाया।
"शायद।"
तभी पीछे से आवाज आई—
"अर्जुन!"
सबने पलटकर देखा।
गौरव दरवाजे पर खड़ा था।
उसके साथ विवेक भी था।
अर्जुन ने हैरानी से पूछा,
"तुम दोनों यहाँ?"
गौरव ने कहा,
"तू फोन नहीं उठा रहा था। इसलिए घर आ गए।"
फिर उसकी नजर आयत और नूरजहाँ पर गई।
वह कुछ पूछता, उससे पहले अर्जुन ने कहा,
"अभी सवाल मत पूछ। मामला बहुत बड़ा है।"
गौरव ने गंभीर होकर सिर हिलाया।
घर में कौन था?
अर्जुन ने हवेली के सभी नौकरों को बुलाया।
एक-एक करके सब सामने खड़े हो गए।
अर्जुन ने पूछा,
"पिछले एक घंटे में इस स्टडी के पास कौन आया था?"
सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
तभी पुराने नौकर रामदीन ने कहा,
"साहब... मैं तो करीब आधे घंटे पहले यहाँ सफाई करने आया था।"
"दरवाजा तब खुला था?"
"नहीं साहब। तब बंद था।"
"और उसके बाद?"
रामदीन ने सोचा।
"एक आदमी आया था।"
अर्जुन तुरंत उसकी तरफ मुड़ा।
"कौन?"
"मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।"
"कैसा दिखता था?"
रामदीन ने कहा,
"लंबा था... काले कपड़े पहने थे... और चेहरे पर मास्क था।"
अर्जुन ने पूछा,
"किधर गया?"
"पीछे के गेट की तरफ।"
अर्जुन ने गौरव की तरफ देखा।
"चल।"
दोनों बाहर की तरफ दौड़ पड़े।
पीछे का रास्ता
पीछे का गेट खुला हुआ था।
गौरव ने कहा,
"यहाँ से कोई बाहर गया है।"
अर्जुन ने जमीन पर देखा।
कुछ दूर तक जूतों के निशान थे।
फिर निशान सड़क पर जाकर खत्म हो गए।
अर्जुन ने चारों तरफ देखा।
"बहुत देर हो गई।"
गौरव ने कहा,
"तूने पुलिस को बताया?"
"अभी नहीं।"
"क्यों?"
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि मुझे शक है कि ये काम किसी बाहर वाले का नहीं है।"
गौरव समझ गया।
"मतलब?"
अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा—
"कोई घर के अंदर का आदमी उसकी मदद कर रहा है।"
गौरव चौंक गया।
"तुझे ऐसा क्यों लग रहा है?"
"क्योंकि दादा की स्टडी तक वही पहुँच सकता है, जिसे पता हो कि दस्तावेज कहाँ रखा था।"
दोनों कुछ देर चुप रहे।
फिर अर्जुन ने कहा,
"और एक बात..."
"क्या?"
"जिसने फाइल ली है, उसे पहले से पता था कि हम वहाँ पहुँचने वाले हैं।"
गौरव की आँखें सिकुड़ गईं।
"तो फिर उसे हमारी हर हरकत की खबर मिल रही है।"
अर्जुन ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
आयत और नूरजहाँ
उधर कमरे में आयत अपनी माँ के पास बैठी थी।
आयत ने धीरे से पूछा,
"माँ... क्या आप मुझे कुछ बताना चाहती हैं?"
नूरजहाँ ने उसकी तरफ देखा।
"क्या?"
"मेरे पिता के बारे में।"
नूरजहाँ की आँखों में दर्द आ गया।
"तुम्हारे पिता बहुत अच्छे इंसान थे।"
"क्या वो अर्जुन के दादा को जानते थे?"
"हाँ।"
"और रुद्र को?"
नूरजहाँ ने धीरे से सिर हिलाया।
"हाँ।"
"तो फिर मेरे पिता और रुद्र के बीच क्या हुआ था?"
नूरजहाँ ने कुछ पल बाद कहा,
"तुम्हारे पिता ने रुद्र के खिलाफ सबूत इकट्ठा किए थे।"
"किस चीज़ के?"
"कंपनी में किए जा रहे गैरकानूनी कामों के।"
आयत की आँखों में आँसू आ गए।
"और उसी वजह से उन्हें मार दिया गया?"
"हाँ।"
"तो फिर मेरे पिता ने वो सबूत कहाँ रखे थे?"
नूरजहाँ अचानक चुप हो गईं।
आयत ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"माँ?"
नूरजहाँ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"तुम्हारे पिता ने वो सबूत एक ऐसी जगह छिपाए थे, जहाँ रुद्र कभी पहुँच नहीं सकता था।"
"कहाँ?"
नूरजहाँ ने धीरे से कहा—
"तुम्हारे पास।"
आयत का चेहरा सफेद पड़ गया।
"मेरे पास?"
"हाँ।"
"लेकिन मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।"
नूरजहाँ ने कहा,
"है।"
उन्होंने आयत के गले में पहना लॉकेट देखा।
"वही।"
आयत ने तुरंत लॉकेट पकड़ लिया।
"इसमें?"
नूरजहाँ ने सिर हिलाया।
"तुम्हारे पिता ने जो कुछ देखा था, उसका सुराग इसी में है।"
आयत ने लॉकेट को ध्यान से देखा।
उसी वक्त अर्जुन कमरे में आ गया।
"क्या हुआ?"
आयत ने उसकी तरफ देखा।
"अर्जुन... माँ कह रही हैं कि इस लॉकेट में मेरे पापा के सबूत का सुराग है।"
अर्जुन ने लॉकेट लिया।
उसने उसे ध्यान से देखा।
"इसे खोलना होगा।"
लॉकेट का रहस्य
अर्जुन ने लॉकेट को ध्यान से घुमाया।
पीछे एक बेहद छोटा-सा निशान बना था।
उसने अपनी जेब से वही आधे चाँद वाला लॉकेट निकाला, जो उसे पुराने हॉस्पिटल में मिला था।
दोनों लॉकेट पास लाते ही...
क्लिक!
आयत का लॉकेट अपने आप खुल गया।
अंदर एक बेहद छोटी कागज की पट्टी थी।
अर्जुन ने उसे बाहर निकाला।
उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—
"कमरा नंबर 27."
गौरव ने पूछा,
"कहाँ का कमरा?"
अर्जुन ने नूरजहाँ की तरफ देखा।
नूरजहाँ की आँखों में डर उतर आया।
"तुम्हारे दादा की पुरानी हवेली में एक कमरा नंबर 27 था।"
अर्जुन चौंका।
"लेकिन वो तो पंद्रह साल पहले बंद कर दिया गया था।"
नूरजहाँ ने कहा,
"वहीं तुम्हारे पिता ने सबूत छिपाए थे।"
अर्जुन ने तुरंत कहा,
"तो हमें वहाँ जाना होगा।"
आयत भी खड़ी हो गई।
"मैं भी चलूँगी।"
"नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर रुद्र को पता चला कि तुम वहाँ जा रही हो..."
आयत ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"अर्जुन, ये मेरे पिता से जुड़ा हुआ है। मैं पीछे नहीं हटूँगी।"
अर्जुन कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,
"ठीक है। लेकिन मेरे साथ रहना।"
आयत ने सिर हिला दिया।
दूसरी तरफ...
शहर के एक सुनसान इलाके में एक काली कार रुकी।
रोहन उसमें बैठा था।
उसके सामने वही आदमी बैठा था, जिसने कुछ देर पहले वशिष्ठ हवेली से फाइल चुराई थी।
रोहन ने पूछा,
"फाइल मिल गई?"
आदमी ने फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।
"हाँ।"
रोहन ने उसे खोलने की कोशिश की।
लेकिन तभी आदमी ने उसका हाथ रोक दिया।
"इसे अभी मत खोलो।"
रोहन ने भौंहें सिकोड़ लीं।
"क्यों?"
"क्योंकि इसमें सिर्फ आयत का सच नहीं है।"
"तो?"
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
"इसमें तुम्हारे पिता का नाम भी है।"
रोहन के चेहरे पर हैरानी छा गई।
"मेरे पापा?"
आदमी ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
रोहन ने फाइल को कसकर पकड़ लिया।
"इसका मतलब..."
आदमी ने धीमे से कहा—
"तुम्हारे पिता और रुद्र वशिष्ठ एक-दूसरे को पंद्रह साल से जानते हैं।"
रोहन की आँखों में अब गुस्सा नहीं...
बल्कि डर था।
"मेरे पापा ने मुझसे क्या छिपाया है?"
आदमी मुस्कुराया।
"ये पता लगाने के लिए तुम्हें अपने घर की तिजोरी खोलनी होगी।"
रोहन ने पूछा,
"और अगर मैंने खोल दी?"
आदमी ने कहा—
"तो तुम्हें पता चल जाएगा कि अर्जुन वशिष्ठ तुम्हारा दुश्मन है... या फिर तुम्हारे परिवार का सबसे बड़ा सच।"
रोहन चुप रह गया।
उधर अर्जुन, आयत और गौरव कमरे नंबर 27 की तलाश में निकल चुके थे।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि...
जिस कमरे में वे सच ढूँढने जा रहे थे, वहाँ पहले से कोई उनका इंतजार कर रहा था।
क्रमशः...