समय के साथ...रितांश और सिद्धिदात्री का रिश्ता और भी गहरा होता जा रहा था। शुरुआत में जो सिर्फ दोस्ती थी...वह कब प्यार में बदल गई, शायद उन्हें खुद भी पता नहीं चला। अब रितांश ऑफिस से लौटते ही सबसे पहले सिद्धिदात्री को ढूँढता। और सिद्धिदात्री...
दिन में न जाने कितनी बार बिना किसी कारण के रितांश को फोन कर देती। रितांशी तो उन्हें देखकर अक्सर चिढ़ाती रहती थी।
वो बोली -
आप दोनों शादी ही कर लो अब!
यह सुनकर दोनों शर्म से लाल हो जाते।
🌙 एक रात कृष्णा और सिद्धिका अपने कमरे की बालकनी में बैठे थे। हल्की ठंडी हवा चल रही थी। नीचे गार्डन में रितांश और सिद्धिदात्री बैठे बातें कर रहे थे। दोनों की हँसी की आवाज़ ऊपर तक आ रही थी। सिद्धिका मुस्कुराई।
बोली -
देख रहे हैं?
कितना प्यार करते हैं दोनों एक-दूसरे से।
कृष्णा ने नीचे देखा। रितांश कुछ कह रहा था और सिद्धिदात्री हँस रही थी। कृष्णा के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई।
कृष्णा बोला -
हाँ। शायद अब समय आ गया है।
सिद्धिका ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
बोली -
किस बात का?
कृष्णा धीरे से बोले—
इन दोनों की शादी की बात करने का।
सिद्धिका की आँखें चमक उठीं।
बोली -
सच?
कृष्णा मुस्कुराए और बोले -
मैं चाहता हूँ कि सिद्धिदात्री हमेशा इसी घर में रहे।
बेटी बनकर नहीं...बल्कि हमारी बहू बनकर।
सिद्धिका की आँखें नम हो गईं।
वो बोली -
मुझे भी यही चाहिए।
उसी समय...नीचे गार्डन में बैठे रितांश ने अचानक ऊपर देखा। उसे ऐसा लगा जैसे कोई उन्हें देख रहा हो। उसने बालकनी में खड़े अपने माता-पिता को देखा।
और फिर मुस्कुराकर बोला—
मम्मी-पापा फिर से हमें देख रहे हैं।
सिद्धिदात्री ने ऊपर देखा। और हमेशा की तरह शर्म से उसका चेहरा लाल हो गया।
वो बोली -
आपके मम्मा-पापा को बस यही काम है क्या?
रितांश हँस पड़ा।।लेकिन...उन्हें क्या पता था कि उनकी खुशियों को किसी की नज़र लग चुकी थी। दूर अंधकार के महल में शैतानों का राजा क्रोध से भरा बैठा था।
वो बोला -
देवकन्या किसी और की नहीं हो सकती...
उसकी लाल आँखें जल उठीं।
वो बोला -
अगर उनकी शादी हुई...तो भविष्यवाणी सच हो जाएगी।
और उसी क्षण...एक नई साजिश जन्म ले चुकी थी। पूरा अग्निहोत्री हाउस रोशनी से जगमगा रहा था। आज वह दिन था...जिसका इंतज़ार पूरे परिवार को वर्षों से था। रितांश और सिद्धिदात्री का विवाह। मंडप फूलों से सजा हुआ था। चारों तरफ मंत्रों की गूंज थी। रिश्तेदार, मित्र और देवताओं के दूत तक इस दिव्य विवाह के साक्षी बनने आए थे।
मंडप में रितांश दूल्हे के रूप में बैठा था। सुनहरे रंग की शेरवानी में वह बिल्कुल किसी राजकुमार जैसा लग रहा था। उसके बगल में बैठी सिद्धिदात्री लाल जोड़े में अद्भुत लग रही थी। उसकी गर्दन पर बना ॐ का निशान हल्की सुनहरी आभा बिखेर रहा था।बसिद्धिका की आँखों में खुशी के आँसू थे।बवहीं कृष्णा मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने धीरे से कहा—
आख़िरकार...हमारे बच्चों की नई जिंदगी शुरू होने जा रही है।
🔥 फेरों का समय
पंडित जी बोले—
अब वर-वधू अग्नि के चारों ओर फेरे लेंगे।
रितांश और सिद्धिदात्री खड़े हुए। जैसे ही उन्होंने पहला फेरा शुरू किया अचानक...आसमान में काले बादल छा गए। गर्जन...
गड़ड़ड़ड़ड़...!!
तेज़ हवाएँ चलने लगीं। मंडप के चारों तरफ लगी सजावट हिलने लगी।सब घबरा गए।
रितांशी ने डरते हुए पूछा -
यह अचानक क्या हो गया?
सिद्धिदात्री का चेहरा गंभीर हो गया। उसे अपने भीतर की दिव्य शक्ति में हलचल महसूस हो रही थी। उधर...रितांश की आँखें धीरे-धीरे लाल होने लगीं। कृष्णा तुरंत खड़े हो गए। उनका चेहरा गंभीर था।
वो बोले -
वह आ गया है।
सिद्धिका ने चिंतित होकर पूछा—
शैतानों का राजा?
कृष्णा ने सिर हिलाया। अचानक आकाश में एक विशाल काला भंवर प्रकट हुआ।
उस भंवर से एक भयावह आवाज गूँजी—
यह विवाह नहीं हो सकता!
पूरे मंडप में सन्नाटा छा गया। अगले ही पल शैतानों का राजा स्वयं प्रकट हुआ। उसकी लाल आँखें क्रोध से जल रही थीं। उसकी नज़र सीधी सिद्धिदात्री पर थी।
बोला -
देवकन्या मेरी है!
रितांश तुरंत सिद्धिदात्री के सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी आँखें पूरी तरह लाल हो चुकी थीं। उसकी पीठ से विशाल काले पंख निकल आए।
बोला -
जब तक मैं जीवित हूँ...तुम उसे छू भी नहीं सकते।
हवा और तेज़ हो गई। अग्नि की लपटें ऊँची उठने लगीं। और उसी क्षण...विवाह का मंडप युद्धभूमि में बदल गया। युद्ध चला और राक्षस हार गए।
शैतानों का राजा, जिसका नाम 'महामाय' था, अपनी ही बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। रितांश की असुर शक्ति और सिद्धिदात्री की दिव्य ऊर्जा के मिलन से बनी वह जंजीरें इतनी मजबूत थीं कि महामाय हिल भी नहीं पा रहा था। उसने क्रोध से दांत पीसे। उसकी लाल आँखें फटी पड़ी थीं।
वो बोला -
तुम लोग जीत गए हो...
महामाय गुर्राया, लेकिन उसकी आवाज़ में अब डर नहीं, बल्कि एक ठंडी, घातक चालाकी थी।
वो बोला -
लेकिन याद रखो... विवाह तो हो गया, पर यह युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ।
इतना कहकर, उसने अपने शरीर से काले धुएं का एक विशाल बादल छोड़ा। उस धुएं ने सबकी आँखों को चौंधिया दिया। जब धुआं छंटा, तो महामाय वहां नहीं था। वह भाग चुका था। सभा में सन्नाटा था।बपंडित जी कांपते हाथों से फिर से खड़े हुए।
वो बोले -
चलो... देर न करें। अग्नि साक्षी है, हमें अनुष्ठान पूरा करना होगा।
रितांश के पंख वापस समा गए। उसकी आँखों का लाल रंग धीरे-धीरे सामान्य होने लगा, लेकिन चेहरे पर थकान स्पष्ट थी। सिद्धिदात्री ने उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया, मानो उसे टूटने से बचा रही हो। बाकी के फेरे तेजी से पूरे किए गए।बमंत्रों की आवाज़ अब भी गूंज रही थी, लेकिन वातावरण में वह उत्साह अब डर और चिंता में बदल चुका था।
अंत में—
"सप्तपदी पूर्ण हुई।"
रितांश और सिद्धिदात्री अब पति-पत्नी थे। सिद्धिका ने राहत की सांस ली और कृष्णा के कंधे पर सिर रख दिया।
कृष्णा बोले -
शुक्र है भगवान का... सब ठीक हो गया।
कृष्णा ने गहरी सांस ली, लेकिन उनकी आँखों में शांति नहीं थी। वे जानते थे कि महामाय इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा।
दूर, एक सुनसान और अंधेरी गुफा में... महामाय बैठा था। उसके शरीर पर लगी जंजीरों के निशान अभी भी जल रहे थे। वह दर्द से कराह रहा था, लेकिन उसका चेहरा क्रोध से विकृत था। उसने मुट्ठी भींचकर जमीन पर प्रहार किया।
वो बोला -
गद्दार देवता! नाचीज असुर!
वह जोर से हंसा, लेकिन उस हंसी में कोई खुशी नहीं थी।
वो बोला -
तुमने सोचा कि विवाह करके तुमने मुझे हरा दिया? मूर्खो!
महामाय उठा और गुफा की दीवार पर टंगे एक प्राचीन ग्रंथ की ओर बढ़ा। उसने ग्रंथ के एक पन्ने को उलटा, जहां एक भविष्यवाणी लिखी थी। उसकी आँखें चमक उठीं।
वो बोला -
हाँ... यही कमजोरी है।
उसने धीरे से कहा, जैसे किसी से बात कर रहा हो।
वो बोला -
रितांश एक असुर है, जिसमें देवताओं का रक्त भी है। और सिद्धिदात्री स्वयं देवकन्या है।
बोला -
अगर इन दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने... अगर ये एक हो गए...
महामाय के होंठों पर एक कुटिल मुस्कान फैल गई।
बोला -
तो जो संतान पैदा होगी, वह न देव होगी, न असुर। वह 'परम शक्ति' होगी। ऐसा प्राणी जो मेरी सारी शक्तियों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकता है।
उसने ग्रंथ बंद कर दिया।
वो बोला -
मुझे उनकी गद्दी नहीं चाहिए... मुझे उनका अस्तित्व ही मिटाना है।
लेकिन सीधे हमला करने से काम नहीं चलेगा। रितांश अब जाग चुका है।
महामाय ने अपनी आँखें बंद कीं और एक गहरी सांस ली।
बोला -
मुझे ऐसे हालात बनाने होंगे कि ये दोनों एक-दूसरे के करीब आ ही न सकें। मैं उनके मन में शक, नफरत और दूरी का बीज बोऊंगा।
उनकी शादी तो हो गई है... लेकिन उनकी 'रात' कभी नहीं आएगी। और अगर जबरदस्ती कोई कोशिश की गई, तो मैं ऐसी बाधाएं खड़ी करूंगा कि उनकी मौत तय है।
गुफा में अंधेरा और गहरा हो गया।बमहामाय की योजना अब सिर्फ युद्ध की नहीं, बल्कि मानसिक युद्ध की थी। उधर, अग्निहोत्री हाउस में... रितांश और सिद्धिदात्री अपने कमरे में थे। बाहर बारिश हो रही थी, जैसे आसमान भी रो रहा हो। रितांश ने सिद्धिदात्री की ओर देखा। वह सुंदर लग रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर भी एक अजीब सी घबराहट थी। रितांश ने धीरे से उसका हाथ थामा।
वो बोला -
सिद्धि... क्या तुम ठीक हो?
सिद्धिदात्री ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी नजर दरवाजे की ओर थी, जहां हवाएं अजीब तरीके से सरसरा रही थीं। उसे नहीं पता था कि बाहर बैठे शैतानों के राजा ने उनकी सबसे पवित्र बंधन को तोड़ने की नहीं, बल्कि उसे **अपूर्ण** रखने की शपथ ले ली है।