सोहन के हाथ आर्यमन के कंधे से ढीले पड़ गए। नीलम भाभी के चेहरे पर अब एक विजयी मुस्कान वापस आ गई थी, जैसे उन्हें वही मिल गया हो जो वो चाहती थीं।
आर्यमन एकदम पत्थर बन गया था। न उसने उसे पीछे धकेला, न ही गले लगाया। वह बस सुन्न खड़ा रहा।
तभी नीलम भाभी ने जलती पर तेल डालते हुए कहा, "देखा अवनि? देखा सोहन? मैंने कहा था न कि आर्यमन का अतीत और भविष्य दोनों एक ही है।
पहचान लो अवनि, ये और कोई नहीं... यही श्रद्धा है! हमारे आर्यमन की जान, उसका पहला और आखिरी प्यार।"
श्रद्धा ने आर्यमन के सीने पर सिर टिकाए हुए ही तिरछी नज़रों से अवनि की ओर देखा।
श्रद्धा ने अपनी रेशमी जुल्फें पीछे झटकीं और बड़ी-बड़ी आँखों से अवनि को ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे वह कोई मामूली सी चीज़ हो। फिर उसने आर्यमन के चेहरे को अपने हाथों में भरते हुए, बड़ी ही मासूमियत और हैरानी से पूछा:
"आर्यमन... ये सब क्या है? और यह लड़की कौन है?"
उसने अवनि की साधारण वेशभूषा और उसकी आँखों में ठहरे आँसुओं की ओर इशारा करते हुए आगे कहा:
"और ये सब लोग कौन हैं जान? तुम इस बीहड़ पहाड़ पर इन लोगों के साथ क्या कर रहे हो? तुम्हें पता है मैं तुम्हें ढूंढते-ढूंढते यहाँ तक आ गई, मेरी हालत क्या हो गई थी!"
श्रद्धा के शब्दों में अवनि के लिए एक अनकही हिकारत (नफरत) थी। अवनि को ऐसा महसूस हुआ जैसे वह अपनी ही कहानी में एक 'एक्स्ट्रा' पात्र बनकर रह गई है।
आर्यमन अभी अपनी सफाई देने के लिए मुँह खोल ही रहा था कि
तभी नीलम भाभी ने फिर से अपनी ज़हरीली ज़ुबान खोली,
नीलम भाभी: "अरे श्रद्धा बेटा, तुम परेशान क्यों हो रही हो? मैं बताती हूँ न। दरअसल, ये लोग आर्यमन के पापा के एक पुराने मामूली से बिजनेस फ्रेंड हैं।
हम लोग यहाँ बस एक डील के सिलसिले में आए थे। अब वो डील तो हो गई, तो बस... शिष्टाचार के नाते हम यहाँ रुके थे।"
नीलम ने अवनि की आँखों में सीधे झाँकते हुए एक ज़हरीली मुस्कान के साथ जोड़ा, "और ये लड़की अवनि... बस उन्हीं दोस्त की बेटी है।
बेचारी ने कल रात आर्यमन की थोड़ी मदद क्या कर दी, इसे लगा कि शायद इसने कोई बहुत बड़ा अहसान कर दिया है।"
अवनि का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। नीलम भाभी ने एक पल में उसके निस्वार्थ त्याग और जान पर खेलने वाली बात को 'मामूली मदद' और 'बिजनेस डील' का नाम दे दिया था।
श्रद्धा ने एक लंबी राहत की साँस ली और अपनी ऊँची हील्स पर खड़े होकर अवनि को बड़ी दया भरी नज़रों से देखा।
श्रद्धा: "ओह! तो ये बात है। थैंक यू अवनि... तुमने मेरे आर्यमन की मदद की। नीलम भाभी, आप भी न... मुझे बेकार में डरा दिया था। मुझे लगा पता नहीं क्या बात है।"
श्रद्धा ने फिर से आर्यमन का हाथ कस के पकड़ लिया, "आर्यमन, तुम चुप क्यों हो?
चलो न! बहुत हो गया ये पहाड़ और बिजनेस। अब मुझे इस जगह से घुटन हो रही है। तुम्हें पता है न, मुझे ऐसी जगहों से कितनी एलर्जी है?"
आर्यमन ने बेबसी से अवनि की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक सच दबा था, जो वह चिल्लाकर कहना चाहता था—कि अवनि कोई 'बिजनेस फ्रेंड' की बेटी नहीं, बल्कि उसकी रक्षक है।
लेकिन श्रद्धा की पकड़ और नीलम भाभी के बुने हुए झूठ के जाल ने उसे जैसे जकड़ लिया था।
श्रद्धा ने आर्यमन का हाथ इतनी मजबूती से पकड़ा कि उसके नाखून आर्यमन की कलाई में गध गए। उसने एक पल के लिए भी आर्यमन को अवनि की ओर देखने का मौका नहीं दिया।
श्रद्धा: "बस आर्यमन! बहुत हो गया यह ड्रामा। तुम यहाँ एक पल भी और नहीं रुकोगे। चलो मेरे साथ!"
वह आर्यमन को लगभग घसीटते हुए पहाड़ी के नीचे खड़ी अपनी शानदार गाड़ी की ओर ले जाने लगी।
आर्यमन ने एक बार पीछे मुड़कर अवनि को देखा—अवनि की आँखों में आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी खामोशी थी जो चीख-चीख कर कह रही थी कि आज उसने आर्यमन को हमेशा के लिए खो दिया है।
श्रद्धा, आर्यमन को ज़बरदस्ती अपनी गाड़ी में बिठाती है और तेज़ी से उस होटल की ओर निकल जाती है जहाँ वह रुकी हुई है।
जैसे ही श्रद्धा की गाड़ी धूल उड़ाती हुई पहाड़ी से नीचे उतरी, वहां एक भारी सन्नाटा छा गया।
नीलम भाभी अब भी अपनी जीत के नशे में चूर थीं और अवनि के परिवार को हिकारत से देख रही थीं। लेकिन तभी, एक ऐसी आवाज़ गूँजी जिसने पहाड़ों की शांति को चीर दिया।
"बहुत तमाशा कर लिया तुम लोगों ने!"
दादाजी की आवाज़ में वो गूँज थी कि पहाड़ों की चट्टानें भी थर्रा उठीं। आर्यमन के माता-पिता, जो अब तक खामोश और शर्मके मरे अपनी निगाहें नीचे कर कर खड़े थे,
उनके चेहरे का रंग उड़ गया। नीलम भाभी, जो बड़ी-बड़ी बातें कर रही थीं, उनकी आवाज़ गले में ही अटक गई।
दादाजी (श्याम सुंदर गोयनका) ने अपने हाथ में पकड़ी हुई लाठी को ज़मीन पर जोर से पटका और गरजकर बोले:
"भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि आज मेरी आँखें खुल गईं! मुझे पता चल गया कि जिस लड़के को मैं हीरा समझ रहा था, वह कितना घटिया और कायर निकला।
सगाई (मंगनी) होने से पहले ही मेरी पोती की ज़िंदगी बच गई, वरना तुम जैसे भेड़िये तो उसे ज़िंदा ही निगल जाते!"
आर्यमन की माँ ने कुछ कहना चाहा, "पर भाई साहब, आप सुनिए तो..."
"चुप रहो!" दादाजी ने अपना हाथ हवा में उठाया। "बड़ी-बड़ी बातें करते थे तुम लोग खानदान और शराफत की?
आज देख ली मैंने तुम्हारी शराफत! तुम लोग क्या रिश्ता तोड़ोगे?
मैं, सेठ श्याम सुंदर गोयनका, अभी इसी वक्त तुम जैसे लालची और झूठे लोगों से सारे रिश्ते तोड़ता हूँ! मेरा खून (अवनि) तुम्हारे जैसे कीचड़ में कभी नहीं जाएगा।"
दादाजी ने सोहन और नीलम की ओर अपनी कांपती लेकिन अधिकारपूर्ण उँगली से इशारा किया और बोले:
"दफा हो जाओ यहाँ से!
इससे पहले कि मैं अपना आपा खो दूँ और तुम्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा दूँ, निकल जाओ मेरी आँखों के सामने से!
अवनि की जान की कीमत तुम लोगों के पास कभी थी ही नहीं, तुम लोग सिर्फ पैसों के भूखे हो।"
नीलम भाभी की आँखों में अब डर साफ़ दिख रहा था। उन्हें समझ आ गया था कि उन्होंने एक मामूली पहाड़ी परिवार को छेड़ने की गलती नहीं की है, बल्कि एक सोए हुए शेर की पूँछ पर पैर रख दिया है।
अवनि खामोश खड़ी अपने दादाजी को देख रही थी।
जैसे ही अवनि ने कांपते स्वर में कहा, "दादाजी, शांत हो जाइए...", दादाजी ने अपना हाथ हवा में उठाकर उसे बीच में ही टोक दिया।