Money VS Me Part 20 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 20

Featured Books
  • सच्ची खुशी

     बाल कहानी - मोहमायामीना नाम की एक दस साल की प्यारी सी बच्ची...

  • अधूरापन - 19

    अध्याय-१९राजेश औपचारिकताएँ पूरी करने के बाद सीधा अमृता के पा...

  • Saarghaa - 1

    घमंड का नाम अभ्यंकर था।पुणे में उसका नाम सुनते ही लोग फोन का...

  • नामुमकिन इश्क - एपिसोड 31

    एपिसोड 30 – साज़िश का असली चेहरा   इंस्पेक्टर की...

  • गाँव का लगाव

    शहर की भागदौड़ से दूर, अमित पूरे पंद्रह साल बाद अपने पुश्तैन...

Categories
Share

Money Vs Me - Part 20

ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी और मेरा दिमाग भी उसी रफ्तार से अतीत की गलियों में भटक रहा था।

न जाने नानी कैसी होंगी?

क्या वो मुझे देखकर खुश होंगी?

और चाचा?

क्या चाचा और उनका परिवार मुझे देखकर अपनाएगा, जैसे कभी बचपन में अपनाया था?

उनके बच्चे भी तो अब बड़े हो गए होंगे।

वही बच्चे, जिनकी वजह से मैंने कभी ये घर छोड़ दिया था।

बचपन की कितनी सारी बातें एक-एक करके मेरी आँखों के सामने आने लगीं।

माँ की दूसरी शादी नानी ने ही करवाई थी। मुझे लगा था कि अब शायद मेरी जिंदगी पहले से बेहतर हो जाएगी। लेकिन माँ के दूसरे पति ने मुझे अपने साथ रखने से साफ मना कर दिया।

उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ था कि इस दुनिया में शायद मेरा अपना कोई नहीं है।

मैं धीरे-धीरे खुद को इस दुनिया में अकेला महसूस करने लगा था।

शायद यही वजह थी कि एक दिन मैं इस शहर से दूर चला गया।

मैंने खुद से एक वादा किया था—

एक दिन इतना पैसा कमाऊँगा कि यही लोग मेरे सामने सिर झुकाकर खड़े होंगे।

माँ ने मेरी पढ़ाई पर जितना भी खर्च किया था, मैं एक-एक पैसा उन्हें वापस लौटाऊँगा।

और चाचा के वो बच्चे…

जो बचपन में मुझे परेशान किया करते थे…

उन्हें भी एक दिन अपनी औकात का एहसास करवाऊँगा।

मैं अक्सर सोचता था—

“जब मेरी जेब में पैसा होगा, तब कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।”

अपने बचपन की उस सोच को याद करके मैं खुद ही हल्का-सा हँस दिया।

कितना अजीब था इंसान का दिमाग।

बचपन बीत जाता है, इंसान बड़ा हो जाता है, जिंदगी बदल जाती है…

लेकिन बचपन की कुछ बातें जाने क्यों दिल के किसी कोने में वैसी ही पड़ी रहती हैं।

मेरे बैंक अकाउंट में अब सचमुच काफी पैसे थे।

ठाकुर साहब मेरी तनख्वाह हमेशा समय पर देते थे।

बल्कि कई बार तनख्वाह से ज्यादा ही दे दिया करते थे।

मैंने कभी पैसों की कमी महसूस नहीं की थी।

उस वक्त मुझे लगता था कि आखिरकार मैं अपने उस पुराने सपने के करीब पहुँच गया हूँ।

मेरे पास पैसा था।

एक अच्छी जिंदगी थी।

ठाकुर साहब का भरोसा था।

और मुझे लगने लगा था कि अब मैं अपने अतीत के सामने सिर उठाकर खड़ा हो सकता हूँ।

लेकिन मुझे क्या पता था कि जिस पैसे को मैं अपनी ताकत समझ रहा था…

वही पैसा मुझे एक ऐसे आदमी के जाल में ले गया था, जिससे बचने के लिए आज मैं अपनी जान बचाकर भाग रहा था।

ट्रेन खिड़की के बाहर तेजी से भागती रही।

मैंने अपना सिर सीट से टिकाया और आँखें बंद कर लीं।

अतीत और वर्तमान के बीच झूलते हुए मेरे मन में बस एक सवाल था—

क्या मैं सच में अपने घर लौट रहा था… या सिर्फ अपने अतीत के उस हिस्से की तरफ जा रहा था, जिससे भागकर मैंने पूरी जिंदगी खुद को दूर रखा था?

अब कहानी को नानी के घर पहुँचने और परिवार से मुलाकात तक ले चलते हैं, लेकिन साथ ही ठाकुर साहब से जुड़ा रहस्य धीरे-धीरे वापस जोड़ेंगे।

ट्रेन की रफ्तार धीरे-धीरे कम होने लगी।

मैंने खिड़की से बाहर देखा। मेरा शहर आ चुका था।

दिल की धड़कन अचानक तेज़ हो गई।

सालों बाद मैं उस जगह वापस लौट रहा था, जहाँ से कभी मैंने खुद को हमेशा के लिए दूर कर लिया था।

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी।

मैंने अपना बैग उठाया और धीरे-धीरे नीचे उतर गया।

स्टेशन पहले से काफी बदल चुका था, लेकिन कुछ चीज़ें अब भी वैसी ही थीं। वही पुरानी चाय की दुकान, वही प्लेटफॉर्म की भीड़ और वही सुबह की भागदौड़।

मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

फिर एक ऑटो लिया और नानी के घर का पता बता दिया।

रास्ते में शहर की गलियों को देखकर मेरे अंदर दबे हुए बचपन के पन्ने खुलते चले गए।

यही वो रास्ता था, जहाँ कभी मैं चाचा के बच्चों के साथ स्कूल जाया करता था।

यहीं से मैं गुस्से में अकेला घर से निकला था।

और आज…

उसी रास्ते पर वापस लौट रहा था।

कुछ देर बाद ऑटो उस पुरानी गली में पहुँच गया।

मेरा दिल और तेज़ धड़कने लगा।

आखिरकार ऑटो नानी के घर के सामने रुक गया।

मैंने पैसे दिए और अपना बैग लेकर नीचे उतर गया।

घर को देखकर मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गया।

दीवारों पर पुराना रंग अब फीका पड़ चुका था।

लोहे का वही गेट था, जिस पर बचपन में मैं घंटों झूला करता था।

मैंने हाथ बढ़ाकर गेट खोला।

अंदर कदम रखते ही एक अजीब-सी गर्माहट महसूस हुई।

कितने साल बाद मैं इस आँगन में आया था।

मैंने दरवाज़े पर दस्तक दी।

कुछ पल बाद अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आई।

दरवाज़ा खुला।

सामने एक लड़की खड़ी थी।

करीब पच्चीस-छब्बीस साल की।

उसने मुझे कुछ पल गौर से देखा।

“जी?”

मैंने हिचकते हुए पूछा—

“नानी घर पर हैं?”

वो कुछ पल चुप रही।

फिर अचानक उसकी आँखें फैल गईं।

“शितिज भैया?”

मैं उसे पहचान नहीं पाया।

लेकिन उसने मुझे पहचान लिया था।

“आप… सच में शितिज भैया हैं?”

मैंने धीरे से सिर हिला दिया।

“हाँ।”

वो अचानक मुस्कुराई।

“मैं रिया हूँ… चाचा की बेटी।”

मैं कुछ बोल पाता, उससे पहले ही वो पीछे मुड़ी।

“मम्मी! दादी! देखो कौन आया है!”

घर के अंदर हलचल मच गई।

कुछ ही पलों में चाची सामने आ गईं।

उन्होंने मुझे देखा और कुछ सेकंड तक जैसे यकीन ही नहीं किया।

फिर बोलीं—

“अरे… शितिज!”

उनकी आवाज़ में हैरानी भी थी और खुशी भी।

मैंने झुककर उनके पैर छुए।

“कैसी हैं चाची?”

उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा।

“तू कहाँ चला गया था रे? इतने सालों में एक बार भी याद नहीं आई?”

मैं मुस्कुरा दिया।

“याद तो बहुत आई थी…”

लेकिन उसके आगे कुछ नहीं कह सका।

तभी अंदर से नानी की आवाज़ आई—

“कौन आया है?”

मैंने आवाज़ सुनी तो मेरे कदम अपने आप अंदर की तरफ बढ़ गए।

नानी कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थीं।

उम्र ने उन्हें काफी कमजोर कर दिया था।

लेकिन मुझे देखते ही उनकी आँखों में जो चमक आई, उसे देखकर मेरा गला भर आया।

“शितिज…”

मैं उनके पास जाकर घुटनों के बल बैठ गया।

“नानी…”

उन्होंने मेरे चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

“तू आ गया बेटा…”

और फिर उन्होंने मुझे अपने सीने से लगा लिया।

उस एक पल में मुझे लगा जैसे पिछले कई सालों का सारा दर्द खत्म हो गया हो।

मैं भी बच्चों की तरह उनके सीने से लगकर रो पड़ा।

कुछ देर बाद नानी ने मेरा चेहरा देखा।

“बहुत बदल गया है तू।”

मैं हल्का-सा मुस्कुराया।

“समय ने बदल दिया नानी।”

उन्होंने मेरी आँखों में गौर से देखा।

“सिर्फ समय ने?”

मैं चुप हो गया।

शायद नानी ने मेरी आँखों में कुछ पढ़ लिया था।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से बोलीं—

“तू मुझे सब बताएगा।”

मैंने नजरें झुका लीं।

“हाँ नानी।”

“आज नहीं…”

उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा।

“पहले आराम कर। सफर से थक गया होगा।”

मैं अपना बैग लेकर कमरे की तरफ बढ़ गया।

लेकिन जैसे ही मैं अंदर जाने लगा, मेरी नजर दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी।

मैं अचानक रुक गया।

तस्वीर में नानी थीं।

मेरी माँ थी।

और उनके साथ एक आदमी खड़ा था।

मेरी नजर उस आदमी के चेहरे पर जाकर जम गई।

मैं उसे पहचानता था।

वही चेहरा…

वही आँखें…

मैंने तस्वीर में खड़े उस आदमी को पहचान लिया था।

ये वही था...

ठाकुर उदय प्रताप सिंह।

वही उदय प्रताप सिंह, जिससे बचकर मैं भाग आया था... और अब जाने-अनजाने फिर उसी जगह लौट आया था।

मेरी नजरें कुछ पल के लिए उस तस्वीर पर जम गईं।

तो क्या... उसका मेरे घर से कोई रिश्ता था?

मैंने काँपते हाथों से तस्वीर दीवार से उतारी और उसे अपने हाथों में थाम लिया। तस्वीर काफी पुरानी थी। उसमें माँ और वह आदमी... दोनों की उम्र ज्यादा नहीं लग रही थी।

मैं तस्वीर को गौर से देख ही रहा था कि अचानक मेरे दिमाग में एक ख्याल बिजली की तरह कौंधा।

तो क्या... मेरी माँ ने जिस आदमी से शादी की थी... वो ठाकुर उदय प्रताप सिंह ही था?

मेरे दिमाग में जैसे जोरदार धमाका हुआ।

अचानक बीते हुए सारे सवाल एक-दूसरे से जुड़ने लगे। दिल की धड़कन तेज हो गई और हाथों में पकड़ी तस्वीर काँपने लगी।

मैं अभी इस सच को समझने की कोशिश ही कर रहा था कि तभी मेरे पीछे से नानी की आवाज सुनाई दी—

“क्या हुआ, क्षितिज?”