“चलो” !!!!
वह उसे साथ लिये डाइनिंग रूम में आ गई जहां अभी टेबल खाली थी।
“बैठो” उसे कह कर वह खुद भी साथ वाली चेयर पर बैठ गई।
“अस्सलामु अलेयकुम"
शहरयार ने वहां दाखिल होते हुए अपने खास अंदाज़ से सलाम किया था।
“वालेयकुम अस्सलाम”
दोनो ने एक साथ जवाब दिया तो शहरयार एक नयी लड़की को वहां देख कर थोड़ा कन्फ्यूज़ हो गया।
“यह मेरी फ्रैंड है नादिया , दादू को देखने के लिये हम लोग साथ ही जाएंगे “
उसकी नज़रों में सवाल देख कर शिफ़ा ने बिना कुछ पूछे ही उसे बताया था।
“ओके” !!!
वह मुस्कुरा कर उनकी तरफ देखे बग़ैर ही हां में सर हिलाता हुआ बैठ गया।
“यार अच्छी खासी किलर पर्सनालिटी तो है , तुम ख्वामख्वाह ही चि़ढ़ी रहती थी बेचारे से” !!!
नादिया ने उसके कान में घुस कर कहा तो जवाबन शिफ़ा ने उसे घूरा था जिस पर वह सीधी हो कर बैठ गई।
शहरयार ने एक नज़र उस दुशमने जां को देखा।
रात को जागने की वजह से सुर्ख होती आँखें उसके माहताब (चाँद से) चेहरे पर बहुत भली लग रही थीं। रैड और व्हाईट कलर के प्रिंटेड सूट के साथ सर पर दोपट्टा लिये वह उसे अपने दिल के और ज़्यादा क़रीब महसूस हुई थी उसने फौरन नज़रें हटा लीं।
“ आप लोग रेडी हो जाएं , मैं बाहर वेट कर रहा हूं” !!!
नाशता करने के बाद वह खड़े होते हुए बोला।
“ रेडी ही हैं , बस मैं सूप ले लेती हूं वह दादू के लिये बनवाया है मैंने”
वह भी साथ साथ खड़ी हो गई तो शहरयार भी हां में सर हिलाकर बाहर निकल गया।
☆ ☆ ☆
“दादू की तबियत कैसी है अब”???
सर अशफ़ाक़ का पीरिएड लेने के बाद वह दोनों अब ग्राउंड में थीं जब नादिया ने पूछा।
“अलहमदोलिलाह पहले से बेहतर है डिस्चार्ज हो गईं हैं हॉस्पिटल से तो”
उस ने हाथ में पकड़ा बैग ग्राउंड पर रखा फिर खुद भी बैठ गई।
“हाँ अम्मी और माहिद भाई देखने आने के लिये बोल रहे थे उनको”
नादिया ने हाथ में पकड़ी बुक बैग मे रखते हुए बताया
“तुम भी आओगी साथ” ??
“हाँ देखती हूं आ जाउंगी”
“ अच्छा तो अगर तुम लोग आ ही रहे हो तो अब एक दो दिन में ही आ जाना”
उसने कहा तो नादिया ने सवालिया नज़रों से उसे देखा था।
“क्यों” ???
“बड़े पापा आ रहे हैं दादू को देखने एक दो दिन में तो सोच रही हूं उनके साथ चली जाउं” !!!
वह खोये खोये से अंदाज़ में बोली।
“हाँ यह ठीक है , चली जाओ तुम, क्योंकि मसले बात करने से ही सॉलव होते हैं। और वैसे भी टीचर्स तो सब एग्ज़ाम्ज़ की तैयारी में लगे हैं कोई इतना इम्पोर्टेड सलेबस तो हो नही रहा है, बाक़ी जो ज़रूरत पड़ेगी नोटस मुझ से ले लेना। और फिर भी अगर प्रॉबलम हुई तो शहरयार भाई हैं ना वह हैल्प कर देंगे। "
नादिया को भी उसका फैसला सही लगा था।
“बात करने के लिये भी वक़्त चाहिये होता है नादिया , अनस के पास तो वक़्त ही नही है”
वह उदासी से बोली।
“तुम घर जाओ और फेस टू फेस बात करो अनस भाई से , क्योंकि फोन पर पूरी बात होती नही है सही से और फिर सामने वह टाईम वाला एक्सक्यूज़ भी नही दे सकते।”
नादिया सही कह रही थी।
“ हाँ ठीक है ,अभी एक दो दिन तो बड़े पापा को आने में भी लगेंगे तब तक दादू की तबियत भी कुछ बेहतर हो जाएगी अच्छा एक बात बताओ”???
“हाँ पूछो” !!!
“ज़रनिश आपी बात करती हैं क्या रज़ा भाई से”???
“पता नही करते होंगे , वैसे भी ऐंगेजमेंट के बाद तो सब ही करते हैं लेकिन तुम क्यों पूछ रही हो”???
नादिया को अचानक उसके इस सवाल का मतलब समझ नही आया था।
“कुछ नही , बस ऐसे ही एक ख्याल आ गया था”
उसने नही में सर हिला कर जवाब दिया।
☆ ☆ ☆
“फुप्पो आप क्यों बैठी हैं यहां , बुआ कहां हैं”??
ईशा की नमाज़ से फारिग़ हो कर वह दादु को देखने के लिये उनके रूम में गयी तो वहां आमना बेगम उनके पास बैठी थीं नींद की वजह से उनकी अपनी आँखे भी बंद हो रही थीं।
“हां,क्या”???
वह उसकी आवाज़ पर एकदम नींद से चौंक कर सीधी हो बैठीं।
“आपको नींद आ रही है , आप अपने रूम में जा कर सो जाएं”
वह उनके पास ही बैठ गई।
“नही बेटे ,कैसे सो जाउं अम्मा अकेली रह जाएंगी ना फिर” !!!
“क्यों , बुआ कहां हैं”
“बुआ की तबियत खराब हो गई थी कल सारी रात जागने की वजह से। इसलिये मैंने ही कह दिया था उन्हें कि आज वह आराम करें”
“लेकिन फुप्पो ऐसे तो आपकी भी तबियत खराब हो जाएगी जागने से “ !!!
उस ने परेशानी से कहा तो फुप्पो बेसाख्ता अपनी प्यारी भतीजी की फिक्रमंदी पर मुस्कुरा दीं।
“मैं ठीक हूं तुम परेशान ना हो, जाओ रेस्ट करो तुम भी काफी देर हो गई है सुबह तुमहें यूनिवर्सिटी भी जाना है”
उन्होंने प्यार से उसका गाल थपथपाकर कहा।
“मैं सो जाती हूं दादू के पास , आप फिक्र ना करें उनकी। और यूनिवर्सिटी नही जाउंगी मैं कल, क्योंकि वैसे भी टीचर्स आने वाले सेमेस्टरस की तैयारी कर रहे हैं तो पढ़ाई इतनी कुछ खास हो नही रही है।”
उसने उन्हें तफसील बता कर उनकी परेशानी दूर की थी।
“ लेकिन बेटे सारी रात कैसे जागोगी तुम”??
वह परेशान थीं।
“ कोई मसला नही है फुप्पो, मुझे अभी नींद आ भी नही रही है। इसलिये मै हूं यहीं पर , आप सो जाएं और परेशान ना हों बिलकुल”
“आर यू श्योर”???
“ जी फुप्पो बिलकुल, जाएं आप”
“ अच्छा ठीक है रूक जाओ तुम, लेकिन कोई भी परेशानी हो तो मुझे कॉल कर देना फोन मेरे पास ही रखा होता है”!!!
वह जाते जाते भी उसे इंसट्रकशन देना नही भूली थीं।
“जी ठीक है” !!!
उसने मुस्कुरा कर कहा तो आमना बेगम की भी कुछ टेंशन कम हुई थी।
☆ ☆ ☆
फज्र की आज़ानों ने उसे सोचों के जहान से बाहर निकाला था। उसने चौंक कर वॉल क्लॉक में टाइम देखा पौने चार हो रहे थे यानी कि वह सारी रात बस उसी के बारे में सोचता रहा था।
कितने दिन हो गए थे उसने अल्लाह की बारगाह में सजदा नही किया था (नमाज़ नही पढ़ी थी) उसे खुद पर शर्मिंदगी महसूस हुई। अब खुद पर पड़ी है तो उसे याद आया सही कहते हैं कि जब कोई नज़र नही आता तब वह नज़र आता है।
शर्मिंदा हो कर सोचते हुए वह उठा था । नहाकर वुज़ू करने के बाद उसने मस्जिद का रूख किया और नमाज़ अदा करने के बाद जब दुआ के लिये हाथ उठाए तो बेइख्तियार दिल से आह निकली थी। कहते हैं कि दिल से निकली हुई आह सीधी आसमान पर पहुंचती है इसलिये उसने भी सच्चे दिल से दुआ की।
“वह किसी और की अमानत है मौला, फिर क्यों उसका ख्याल मेरे दिल से जा नही रहा है वह गिड़गिड़ा रहा था। क्यों उसकी मुहब्बत ज़्यादा से ज़्यादा होती जा रही है मेरे दिल में जब हमारा मिलना क़िसमत में नही है, तो मैं क्यों उसे भूल नही पा रहा हूं। मेरी राह आसान फरमा दे मालिक!! रहम कर दे मौला मुझ पर रहम कर”
बहुत देर तक दुआ मांगने के बाद जब दिल को कुछ सुकून हुआ तो वह दोनों हाथों पर दम करता चेहरे पर फेर कर उठ खड़ा हुआ था।
घर पहुंचने के बाद कमरे में जाने के बजाए वह दादु के कमरे में आ गया जहां दिल ए बेक़रार उसे देख कर एक बार फिर मचल उठा था।
दादू के बैड के पास रखे सोफे पर वह बैठी बैठी ही सो गई थी। सोते हुए वह बिलकुल एक मासूम बच्चे की तरह लग रही थी। गरदन सोफे की बैक पर एक साइड हो रही थी और फोल्ड किये बालों में से कुछ बाल निकल कर चेहरे पर फैले हुए थे।
उसने फौरन ही अपने दिल को डाँटकर नज़रों का रूख बदला था वरना नज़रें तो उस परी पैकर के चेहरे से हटना ही नहीं चाहती थीं।
“गरदन दुख जाएगी ऐसे तो , लेकिन उठाउं तो कैसे”???
उसने सोचा ही था कि ज़हन ने काम कर दिया था आइडिया थोड़ा पुराना था लेकिन इस वक़्त उसे यही सब से सही तरीक़ा लगा।
उसने मोबाइल में दो मिन्ट बाद का अलार्म लगा कर वह शिफ़ा के कान के पास कर दिया आवाज़ बस इतनी थी कि वह शिफ़ा को ही सुनाई दे सके क्योंकि हल्की सी भी तेज़ आवाज़ होती तो दादू उठ जातीं।
अलार्म की आवाज़ पर वह तक़रीबन हड़बड़ा कर उठी थी
“आप”??
शहरयार को इतना क़रीब खड़े देख कर वह कुछ नर्वस सी हो गई।
“जी!! आप अपने रूम में जा कर सो जाएं यहां मैं रूक जाता हूं दादू के पास” !!
उसने दिल पर पत्थर रख कर कहा वरना दिल तो चाह रहा था कि वह यूं ही उसके सामने बैठी रहे।
“ नहीं इट्स ओके!! मैं ठीक हूं”
वह दोनो हाथों से बाल ठीक करते हुए बोली
“जी दिख ही रहा है वो तो, खैर आप जाएं अपने रूम में मैं बैठा हूं यहां दादू के पास”
वह उसकी तरफ देखे बग़ैर ही दादु के सरहाने बैठ गया।
“ ओके ,थैंक्यू”!!!
वह उसका शुक्रिया अदा करती उठ कर बाहर निकल गई।
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