"अम्मी जान भाई जान को पता नहीं क्या हो गया है बहुत गुस्से में है, जल्दी आपको बुला रहे हैं।" माहम ने परेशान होकर अम्मीजान से कहा
"भाइयों के सामने बहनों की ऐसी हरकतें रहने लगेंगी तो भाई क्या करेंगे? गुस्सा तो उसे करना ही है ना।" अम्मी जान ने भी गुस्से में कहा और उठकर कमरे से जाते-जाते कहने लगी
"उस लड़की को एक पल का सुकून नहीं मिलता है, न हवेली में सुकून रहने दे सकती हैं, ये सुधर नहीं सकती है, क्या हो जाता अगर मान लेती वाजदान की बात। पहले हवेली की तरबियतें भूल गई, अब बड़े भाइयों के सामने किस तरह बात करनी है ये भी भूल गई है, क्या ज़रूरत थी आए मेहमानों के सामने इस क़दर हंगामा करने की और उसके बाद नवाब पर ही इल्ज़ामा रखने लग गई, वाक़िफ़ है वजदान के गुस्से से फिर भी करना वही है जो इस का मन होगा।" दरवाजे से बाहर जाते हुए अम्मीजान भी उसी बार पर गुस्सा जताने लगी जिसकी वजह से सुबह से हंगामा बरपा था। मैं
वजदान बेलोस हवेली के आब-ए-आईना में बैठा हुआ था, अम्मी जान और माहम भी वही पहुंच गए। आबे–आईना हवेली का वो हिस्सा है जहां हर तरह के महफ़िल ओ बैठक दरपेश आते है। इसका नाम अपने काम का अक्स बख़ूबी बताता है, आलीपुर में दरपेश आया हर मसला यहां आईने की तरह साफ कर दिया जाता है।
"अम्मी जान, आपने देखा उसकी हरकतें क्या रंग लाने लगी है, किस तरह नवाब और उसके खानदान के सामने पेश आई, वो भी हम सबके सामने और उसके बाद बजाय अपनी ग़लती मानने के मुझसे भी बदतमीज़ी पर आमादा हो गई है, क्या आपने उसे समझाया नहीं था कि अपनी ज़िद छोड़ दे।" वजदान ने अम्मी जान को देखते ही खड़े होते हुए लाल-लाल आंखें बड़ी करके गर्म माहौल को और गर्म कर दिया।
"इसकी शोख़ी और बदतमीज़ी का अब कोई इलाज बाक़ी नहीं रहा, अपने ग़ुरूर में, अपनी अना में हम लोगों की इज़्ज़त को पामाल करने के लिए जानबूझकर रचा है सब।"
ये सारी बातें सुनते ही अम्हेल जो मिबसाम के साथ अपने कमरे से आबे आईना की तरफ़ आ रही थी, वापस मुड़कर गुस्से में सब को घूरते हुए अपने कमरे की तरफ़ चली गई। मिबसाम वहीं ठहर गया, उसने पहले अम्हेल को मुड़कर देखा फिर आबे–आईना में बैठे सभी लोगों को देखा और उन लोगों को देखकर अपने चेहरे को ऐसा बनाया जैसे वो उन लोगों को पहचानता ही नहीं है। एक लंबी सांस खींचकर अबे आईना में दाखिल होते हुए अम्मी जान के पास बैठकर शांत मिज़ाज से कहने लगा
"अम्मी जान आप ये क्या कह रही हैं, ऐसा क्या कर दिया है अम्हेल ने की आपको लगने लगा वो अब इतनी बेज़र्फ हरकतें करने लगेगी।"
"यूं ही कुछ नहीं कह रही हूं मैं, जो देख रही हूं परख रही हूं वही कह रही हूं, तुम बताओ क्या नहीं देखा था बग़ीचे में वाजदान ने उसे नागवार अंदाज में माली से बातें करते हुए। उसके मिज़ाज में जितनी तब्दीलियां आ चुकी है उससे ये बिल्कुल साफ़ है कि उसके पांव किस तरफ़ पड़ रहे हैं।"
"तुम्हें उसका वकील बनने की जरूरत नहीं है, उसकी हरकतें देखो और फिर समझो हालात क्या है।" वजदान ने गुस्से में साम से कहा
"अम्मी जान दुनिया में सभी लड़कियां इनकार करती है नापसंद शख़्स के लिए कुछ नया तो नहीं किया उसने, और ये बात वो अलल ऐलान कह चुकी है कि बाग़ का क़िस्सा महज़ एक वहम है, भ्रम है।" मिबसाम ने पूरी समझदारी से अम्हेल का साथ दिया
"बेटा उसका नज़रिया छोड़कर हमारे नज़रिए की तरफ़ भी देखो, अगर बग़ीचे वाली बात महज़ एक ग़लतफहमी थी तो क्यों किया उसने शादी से इनकार, और दुनिया में सब लड़कियां इंकार करती है मगर इस तरह मां और भाइयों के सामने बेहयाई नहीं करती है। जो बतमीज़ी उसने किया है नवाब के साथ हम सबके सामने ऐसा कौन करता है तुम बताओ और उनके सामने क्या हवेली की तज़लील नही किया उसने?" अम्मी जान ने साम को समझाते हुए पूछा
"आप ही बताइए तो और वो क्या करेगी, उसकी बात तो यहां अनसुनी हो जा रही, उसने बताया मुझे की इनकार की वजह आपको बताया उसने, हज़ारो दफ़ा वो बग़ीचे की कहानी भी सुन चुकी है सफाईयां पेश करने के बावजूद। शायद इंतजार में ही बैठे थे कि कब मौक़ा मिले और कब उसके साथ ऐसा करें।" अम्हेल के ख़िलाफ़ हो रही बातें साम के मिज़ाज पर गिरा गुज़रने लग गई।
"ये किस तरह बात कर रहे हो तुम मुझसे?" उसका बदलता लहजा देखकर अम्मीजान ने कहा
"क्या ग़लत कहा मैंने, सही कहा है उसने आप लोगों ने उसे मजबूर किया है ऐसा होने पर। बाबाजान के जाते ही ना जाने क्या-क्या कहा, जो बेटी इतनी अच्छी हुआ करती थी, शेरनी हुआ करती थी आज वो बदकार और बेबाक कहलाने लगी.... क्यूं? क्योंकि उसमे सबसे ज़्यादा हिम्मत है ग़लत को ग़लत और सही को सही कहने की। जिस दिन से उसको आलीपुर से लोगों के ज़रिए उसे बाबाजान की कुर्सी मिली है, ओहदा मिला है उस दिन से ही ये सब शुरू हुआ हैं।"
"क्या कहना चाह रहे हो तुम?" अम्मी जान गुस्से में साम से पूछते हुए खड़ी हो गई और वजदान ऐसे चौक गया जैसे हजारों साल से 7 बक्सो की तह में छुपा उसका पुराना ख़ज़ाना किसी ने आज उसके सामने खोल के बिखेर दीया हो।
"बिल्कुल वही जो आपको समझ आया।" हल्की सी तंज़ भरी मुस्कान देते हुए साम ने आज वो सारी बातें हिम्मत करते हुए कह दिया जो पिछले कुछ महीनों से हवेली में चल रही थी, इसकी वजह से हवेली में आए दिन एक तूफान खड़ा रहता था, इसकी वजह से सब हवेली की हवा और भाईजान का रूप बदलता देख रहे थे।
"और इसी वाहिद वजह से आप लोग उसकी शादी कर उसे हमेशा के लिए हवेली से बेदखल कर देना चाहते हैं।" मिब्साम ने कहा और चला गया