Jab Rishta pyaar ban jaye in Hindi Love Stories by Priyam Gupta books and stories PDF | जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 17

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जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 17

  Episode 17 – जहाँ “हम” कहा गया 




कुछ रिश्तों में
सब तय हो जाने के बाद भी
एक बात बाकी रह जाती है—
उसे ज़ोर से कहना।
और शायद
उसे सुनने की
हिम्मत भी।
Episode 16 के बाद
घर में सब कुछ
बिल्कुल सामान्य लग रहा था।
वही दिनचर्या,
वही आवाज़ें,
वही कमरे।
लेकिन Priyam के भीतर
कुछ चुपचाप
अपनी जगह बदल रहा था।
अब सवाल
“क्या यह रिश्ता सही है?”
का नहीं था।
अब सवाल था—
“क्या मैं तैयार हूँ
इसे अपना कहने के लिए?”
यह सवाल
उसे डराता नहीं था,
बस उसे
ईमानदार बना रहा था।
सुबह Priyam
देर से उठी।
नींद पूरी थी,
लेकिन मन
हल्का नहीं था।
वह खिड़की के पास
बैठ गई।
चाय का कप
दोनों हाथों में थामे हुए।
नीचे गली में
बच्चे स्कूल जा रहे थे,
दुकानदार
शटर खोल रहे थे।
ज़िंदगी
बिना रुके
आगे बढ़ रही थी।
Priyam ने सोचा—
“सब कुछ
अपनी जगह चल रहा है…
और मैं भी
अब उसी बहाव में हूँ।”
पहली बार
उसे यह एहसास
डरावना नहीं लगा।
माँ कमरे में आईं।
उन्होंने Priyam को
चुपचाप बैठे देखा।
“आज तुम
कुछ ज़्यादा ही
खामोश हो,”
उन्होंने कहा।
Priyam हल्की-सी मुस्कुराई।
“खामोश नहीं हूँ…
बस अपने आप से
थोड़ी बातें कर रही हूँ।”
माँ समझ गईं।
वे पास आकर
बैठ गईं।
“जब ज़िंदगी
नया मोड़ लेती है,”
माँ ने कहा,
“तो थोड़ी चुप्पी
ज़रूरी हो जाती है।”
Priyam ने
उनकी तरफ़ देखा।
“और अगर
गलत मोड़ हो जाए?”
माँ ने
उसका हाथ दबाया।
“तो भी
तुम अकेली नहीं होगी।”
दोपहर के बाद
Yaman का कॉल आया।
फोन की स्क्रीन पर
उसका नाम देखकर
Priyam ने
अनजाने में
गहरी साँस ली।
“आप फ्री हैं?”
Yaman ने पूछा।
उसकी आवाज़
हमेशा की तरह
शांत थी।
“हाँ,”
Priyam ने कहा।
“आज मन भी
थोड़ा हल्का है।”
“तो…
क्या हम
मिल सकते हैं?”
उसने यह सवाल
ऐसे पूछा
जैसे जवाब
जो भी हो,
वह उसे स्वीकार करेगा।
Priyam ने
एक पल सोचा।
इस बार
उसे कोई बहाना
नहीं ढूँढना पड़ा।
“हाँ,”
उसने कहा।
“मिलते हैं।”
शाम को
दोनों उसी जगह मिले
जहाँ पहले भी
कई बातें
बिना कहे
कही जा चुकी थीं।
वही बेंच,
वही पेड़,
वही हल्की हवा।
लेकिन आज
हवा में
कुछ अलग था।
आज
शब्दों का
वज़न था।
Yaman बैठते ही
बोला—
“मैं आज
किसी जवाब
या फैसले के लिए
नहीं आया हूँ।”
Priyam ने
उसकी तरफ़ देखा।
“तो?”
“बस
एक बात
दिल में थी।”
Priyam चुप रही।
आज
उसे बोलने से ज़्यादा
सुनना था।
“मुझे नहीं पता
आगे सब कुछ
कैसा होगा,”
Yaman ने कहा।
“लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ
कि मैं इस रिश्ते में
आधा-अधूरा नहीं हूँ।”
उसने एक पल रुककर
आगे कहा—
“मैं चाहता हूँ
कि जब हम आगे बढ़ें,
तो हम
दो लोग नहीं,
एक टीम हों।”
Priyam की आँखें
नमी से भर आईं।
ये शब्द
भारी नहीं थे,
पर सच्चे थे।
Priyam ने
धीरे से कहा—
“मैंने हमेशा
अपने फैसले खुद लिए हैं।”
उसकी आवाज़
थोड़ी काँपी।
“और शायद
इसी वजह से
मुझे डर लगता है
किसी और को
उस फैसले में
शामिल करने में।”
उसने गहरी साँस ली।
“लेकिन पहली बार
मुझे लग रहा है
कि इस फैसले में
मैं खुद को
खो नहीं रही।”
Yaman ने
बीच में कुछ नहीं कहा।
उसने बस
पूरा सुना।
“मैं डरती हूँ,”
Priyam ने सच कहा।
“लेकिन अब
पीछे हटने से नहीं…
बल्कि उस दिन से
जब मैं डर के कारण
आगे न बढ़ पाऊँ।”
Yaman ने
शांत स्वर में कहा—
“और मैं
आपको उस डर में
अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
कुछ देर
दोनों चुप रहे।
यह चुप्पी
असहज नहीं थी।
यह वो चुप्पी थी
जिसमें
फैसले
धीरे-धीरे
अपनी शक्ल लेते हैं।
फिर Priyam ने
खुद पहल की।
“Yaman…”
“हाँ?”
उसने सामने देखा,
फिर उसकी तरफ़।
“अब हम
इस रिश्ते को
क्या कहें?”
Yaman के चेहरे पर
हल्की-सी मुस्कान आई।
“अगर आप
तैयार हों,”
उसने कहा,
“तो मैं इसे
‘हम’ कहना चाहूँगा।”
Priyam की आँखों से
एक आँसू
चुपचाप
गिर गया।
उसने सिर हिलाया।
“मैं भी।”
वापसी का रास्ता
बहुत शांत था।
कोई जल्दी नहीं,
कोई सवाल नहीं।
बस एक समझ—
अब चीज़ें
नामहीन नहीं थीं।
रात को
Priyam ने
अपनी डायरी खोली।
उसके हाथ
थोड़े काँप रहे थे।
उसने लिखा—
आज किसी ने
मुझसे वादा नहीं किया।
आज किसी ने
मुझे आज़ादी के साथ
अपना कहा।
और शायद
यही सबसे सुरक्षित
शुरुआत होती है।
उसी समय
Yaman ने
अपने फोन में
एक छोटा-सा नोट लिखा—
आज से
मैं अकेले फैसले नहीं लूँगा।
आज से
मैं “मैं” नहीं,
“हम” हूँ।
उसने फोन साइड में रखा
और लाइट बंद कर दी।
उसके चेहरे पर
संतोष था।



( थैंक्यू आप सबको कि आप हमारी स्टोरी को पसंद कर रहे हैं आप सभी ऐसे ही अपना प्यार बनाए रखें और हम मिलते हैं जल्दी ही अगले एपिसोड में)