या अपने ही घर में बचपन से यौवन की दहलीज में कदम रखना कसूर था मेरा ??
भूमि की आंखों में आंसुओं की धारा और जुबान से शब्दों की धारा बह निकली थी।
शायद बरसों का गुबार था जो आज फूट पड़ा था।
मैं तो नादां थी पापा पर आप तो बड़े थे?
मैं असहनीय पीड़ा को सहती रही और आप उस दुष्ट को सजा भी ना दे पाए क्यों??
इसलिए कि वो तुम्हारा भाई था .!!
पर मैं भी तो आपकी बेटी थी ना पापा ..!
छोटी-सी मासुम सी..
तुम उस दुराचारी को सजा भी नहीं दिला पाए क्यूंकि रिश्तो की बेड़ियों से तुम्हारे हाथ पैर बंध गए थे और माता-पिता ने वास्ता देकर तुम्हारी जुबान पर ताला लगा दिया था।
और फिर तुम्हारे चुप रहने की सजा भी मुझे ही मिली..
मेरी मासूमियत छीन गई..
खेलने कूदने की उम्र में मैं, सहमी सी रहने लगी।
हंसने, खिलखिलाने और शरारतें करने की जगह मेरा मन उदासी से भर गया था।
जबकि इसमें भी मेरा कोई कसुर नहीं था।
आपने ,अपने भाई होने का और बेटा होने का रिश्ता पक्का कर लिया था पर...
मेरा तो रिश्तो से विश्वास ही उठ गया था। तभी से रिश्तो के नाम पर डर भर गया है मेरे अंदर,,
हर रिश्ता मेरी नजरों में संदेह बनकर रह गया है !!
और इन सब में भी मेरा क्या कसूर था ??
बोलो ना पापा..
भूमि विलाप कर रही थी --आपको पता है पापा,आपके चुप रहने की कितनी बड़ी कीमत चुकाई है मैंने ,, तुम्हारे भाई ने मेरी आत्मा को जख्मी कर दिया था और तुम्हारी चुप्पी ने उसे मार दिया।
पापा काश!! उस दिन आपने आवाज उठाई होती तो --आज ये दिन मेरी जिंदगी में ना आता ।
आज मुझे दोबारा से उस कसूर की सजा सुनाई जा रही है जो मैंने किया ही नहीं .!!
बताओ ना मम्मी पापा अब कैसे दिलाओगे मुझे इंसाफ़??
कैसे मुक्त कराओगे मुझे उस सजा से जो मुझे बिना कसूर के मिली है?
या फिर तुम्हारा मौन एकबार फिर मुझे वहीं सजा देगा जो बरसों पहले मुझे बिना कसूर के मिली थी..!!
सब लोग चुपचाप खड़े भूमि की बात सुन रहे थे , किसी के चेहरे पर दया का भाव था तो किसी के चेहरे पर आश्चर्य का तो किसी के चेहरे पर इतनी बड़ी बात छुपाने का भाव झलक रहा था।
कमरे में सिर्फ भूमि की आवाज गूंज रही थी। और फिर..
रोते हुए भूमि अपने मम्मी पापा के चरणों में गिर जाती हैं अब उसकेेेेे शब्दों ने आंसुओं का रूप ले लिया था।
भूमि के पापा भूमि को उठाते हैं और कहते हैं --माफ कर दो भूमि बेटा !!
तभी सरला भी बोली --हां बेटा माफ कर दो हमें लेकिन आज हम चुप नहीं रहेंगे?
हां उस वक्त मैं भी तुम्हारे पापा के आगे बोल नहीं पाई थी पर, आज मैं भी चुप नहीं रहूंगी मैं तुम्हें इंसाफ दिलवाऊंगी।
भूमि बोली -कैसे दिलवाओगी मां !!
इतने लोगों के सामने जो मेरे आत्म सम्मान को चोट पहुंची है क्या वह मुझे फिर से मिल पाएगी??
देखो मां !!आप लोगों ने मुझे फिर कहां लाकर खड़ा कर दिया है।
सरला भूमि को गले लगाती है और कहती हैं --शांत हो जाओ भूमि ,,अब मुझे कहने दो और फिर..
सरला आकाश के मम्मी पापा की ओर बढ़ती है और उनसे हाथ जोड़कर विनती करती है और कहती हैं --बहन जी इसमें भूमि की कोई ग़लती नही है मैंने ही उसे सच छुपाने के लिए कहा था सारा कसूर मेरा था।
इसकी सजा आप मेरी बेटी को मत दिजीए !!
अरे उसकी तो उम्र भी नहीं थी ये सब सहने और समझने की
छोटी-सी उम्र से बड़ा दर्द सहन किया है मेरी बेटी ने और आज तक उसी डर के साए में जी रही है।
बहन जी मेरी बेटी का कोई कसूर नहीं है वह निष्कलंक, निष्पाप है।
जिंदगी ने उसके साथ पहले ही बहुत गलत किया है पर आप !! आप तो एक औरत हो , समझदार हो !
अगर आप एक औरत के दर्द को नहीं समझेगी तो फिर यह समाज कैसे समझेगा ??
आप समझाइए अपने बेटे को, अपने परिवार को और ..भूमि को स्वीकार कीजिए ..
सरला अपने दोनों हाथ जोड़कर आंखों में आशा की नमी और शब्दों में विनती लिए बोल रही थी।
तभी आकाश की मम्मी आगे बढ़ती है और कहती हैं...