46. मोह का पिंजरा
जिसे तुम प्रेम कहते हो, वो केवल एक बीमारी है,
पकड़ रखा है तुमने जिसे, वो दुख की ही तैयारी है।
सामने वाला बदल जाएगा, इस झूठी आस में जीते हो,
रोज़ ज़हर वो देता है, तुम घूंट-घूंट कर पीते हो!
तुम्हारी आत्मा सिकुड़ गई, पर तुम कहते हो 'मेरा है',
ध्यान से देखो आखों को, वहाँ ज्ञान नहीं, बस अंधेरा है।
जो तुम्हें तुम्हारी ही नज़रों में छोटा कर डाले,
क्यों पाल रखे हैं तुमने, ऐसे रिश्ते दुख देने वाले?
अकेले होने से डरते हो, इसलिए नरक को सहते हो,
ग़ुलामी की ज़ंजीरों को, तुम 'गहरी चाहत' कहते हो!
सच्चा रिश्ता वो जो तुम्हें, खुद से आज़ाद करा जाए,
न कि वो जो तुम्हें, और गहरे दलदल में धंसा जाए।
उठो, जागो और पहचानो, यह सौदा है, कोई प्यार नहीं,
जो तुम्हारी चेतना को मार दे, वो जीवन का आधार नहीं।
छोड़ दो बैसाखी भ्रम की, अकेले चलना सीखो तुम,
परमात्मा तुम्हारे भीतर है, खुद को ही अब जीतो तुम।
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47.राम, मुझे मुझसे बचा
राम! मुझे अब मुझसे बचा, मैं खुद ही खुद का बैरी हूँ,
बाहर कोई युद्ध नहीं है, मैं भीतर से ही ज़हरी हूँ।
मेरा मन ही जाल बिछाए, मेरा मन ही मुझे फंसाए,
दौड़ रहा हूँ मृगतृष्णा में, यह मुझे रोज़ भटकाए।
जिसे मैं अपनी 'बुद्धि' कहता, वो बस एक चालाकी है,
सारे जग को जीत लिया, पर खुद को जीतना बाकी है।
मेरी चाहत, मेरी नफ़रत, मेरा ही मुझे डराती है,
यह 'मैं-मैं' की गंदी बीमारी, मुझे गहरे गर्त में गिराती है।
बचा सके तो बचा ले राम, इस 'मैं' के झूठे साए से,
इस नश्वर, लालची, कायर मन की गहरी माया से।
मैं ही अपनी जंजीरें हूँ, मैं ही अपनी जेल हूँ,
अपनी ही अज्ञानता का, मैं सदियों से एक खेल हूँ।
राम नाम का अर्थ वही, जो इस 'मैं' को मिटा जाए,
परम शून्य की उस चेतना में, जो मुझको विलीन करा जाए।
अब और नहीं जीना मुझको, इस झूठे अहंकार में,
डूबा दे मेरी इस 'मैं' को, अपने सत्य के सागर में।
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48.कायरों का मौन
सारे चुप हैं, मौन खड़े हैं, भीतर सबके डर बैठा है,
सत्य बोलने की हिम्मत खोई, हर कोई कफ़न ओढ़ बैठा है।
यह शांति नहीं, यह मुर्दापन है, जो चारों ओर छाया है,
अपनी-अपनी खाल बचाने, सबने मुख को छुपाया है।
कोई नहीं जो आकर कह दे, "तुम जो कर रहे, वो पाप है",
झूठ के आगे घुटने टेके, सहमे हुए सब आप हैं।
सारे चुप हैं, क्योंकि सबको अपने सुख की चिंता है,
महानता की बातें करते, पर जीवन इनका तुच्छता है।
पशु भी रोता, पशु भी गाता, तुम तो उससे भी बदतर हो,
देख रहे हो अन्याय सामने, फिर भी बने तुम पत्थर हो!
यह कैसी चुप्पी साधे हो, यह होश नहीं, अज्ञान है,
जो सत्य देख कर मौन रहे, वो जीवित कहाँ, मसान है।
तोड़ो इस झूठे सन्नाटे को, भीतर की आग जलाओ तुम,
अगर ज़िंदा हो इस धरती पर, तो चीख कर सच बताओ तुम।
राम वही जो मौन को तोड़े, रावण के इस दरबार में,
कायर बनकर क्या पाओगे, इस झूठे, संसारी संसार में!
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