unplanned travel in Hindi Travel stories by Vandna Sharma books and stories PDF | एक अनजाना सफर

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एक अनजाना सफर



रविवार का दिन था। बुआ जी भी अभी रुकी हुई थीं। हम सबने सोचा आज कहीं घूमने चलते हैं। श्रीश , बुआ जी, मम्मी और मैं हम चारों पैदल-पैदल स्टेशन की तरफ जा रहे थे। मम्मी अपने ममेरे भाई के घर ले जा रही थीं जो पास में ही स्टेशन पार करते ही मालती नगर में रहते हैं। फाटक बंद था। अचानक से मेरे विचार में वैदिक किसान फार्म देखने का चित्र उभरा। और मैंने बिना बताए मम्मी और बुआ जी को ई-रिक्शा कर लिया। रास्ता मुझे भी नहीं पता था, रिक्शे वाले को भी नहीं। वैदिक किसान की एक शाखा स्टेशन के पास ही थी। वहाँ रिक्शा रुकवाया। उनसे पूरा रास्ता समझा और चल दिए एक अनजान यात्रा पर।

मौसम सुहावना हो रहा था। आसमान में काले बादल छाए थे। शहर का रास्ता खत्म हो चुका था। अब दोनों ओर हरे-हरे खेत थे। कहीं ईख लहलहा रही। कहीं कमल के फूल धरा को सुशोभित कर रहे थे। रिक्शा अब बीच हाइवे पे दौड़ रहा था। सड़क पर एक-दो ही वाहन दिखाई दे रहे थे। बुआ का चेहरा डर से पीला पड़ गया। वो पहली बार ऐसे कहीं अनजान जगह जा रही थीं। उनके चेहरे पर डर और बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। बुआ की चिंता जायज थी। आजकल इतने क्राइम हो रहे हैं। आए दिन अखबार में ठगी और किडनेपिंग की खबरें आती रहती हैं। बुआ जी को पता ही नहीं था हम कहाँ जा रहे हैं।

मम्मी भी अब चिंतित होने लगी, पता नहीं रिक्शा वाला कहाँ लेकर जा रहा है। दो गाँव हम क्रॉस कर चुके थे। बुआ ने मुझसे पूछा - "कभी गई भी उस जगह, न रास्ता याद न पहले गई। बस ऐसे ही बीच में से हमको भी ले आई।"

बुआ जी और मम्मी की बेचैनी देख एक बार तो मैं भी डर गई। मुझे भी खौफनाक विचार आया कि घूमने के चक्कर में, इन लोगों को फंसा न दूँ। मैंने तुरंत मोबाइल निकाला, उस गन्तव्य की लोकेशन डाली, फोन को जीपीएस पर रखा, फोन में सही दिखा रहे थे गूगल बाबा। तब मैंने राहत की साँस ली। मैंने उन दोनों से कहा - डरो मत और मुझे भी मत डराओ। हम सही जगह जा रहे हैं। ये देखो फोन में हमारी लोकेशन ट्रेस हो रही है। लगभग चालीस मिनट बाद हम वैदिक किसान फार्म्स पहुँचे। बुआ जी गाँव से ही हैं और गाँव में ही रहती हैं अभी भी, तुरंत बोलीं - 'अरे लल्ली खेत ही देखने थे तो मेरे गाँव आ जाती। सारे खेत दिखा देती। बस खेत देखने के इतनी दूर आई है। पाँच सौ रुपए किराया देकर।" मम्मी ने भी हाँ में हाँ मिलाई - "ये बावली हो रही है खेत देखकर। दिल्ली में बंद इमारतों में रहते हैं न, ये हरियाली देखने को नहीं मिलती।"

सच में मुझे बहुत खुशी हो रही थी। वहाँ जाकर। चारों तरफ हरे-हरे खेत। बीच में बहुत बड़ा आंगन। जिसमें एक कोने पर देशी ढंग से दूध पकाया जा रहा बड़े-बड़े मिट्टी के बर्तनों में।

चार-पाँच छोटी-छोटी झोपड़ियाँ भी बनी थीं। पर्यटकों के लिए। एक झोपड़ी के आगे बरामदे में चार-पाँच बेंत की कुर्सी और मेज थे। अभी निर्माण कार्य भी हो रहा था। वहाँ बच्चों के लिए ट्रैक्टर और बैलगाड़ी की सवारी का भी आनंद लिया जा सकता है। फार्म की मालकिन लक्ष्मी राजपूत बहुत ही हँसमुख, मिलनसार और अपनत्व से भरी परिचारिका हैं। उन्होंने हमारा बड़े प्यार से स्वागत किया। हमें ताजा-ताजा मट्ठा पीने को दिया गुड़ के साथ। अपने खेत भी दिखाए। जहाँ गौशाला थी, बहुत सी प्यारी गायें मासूम सी आँखों से मुझे देख रही थीं। शायद सोच रही हो कि आज उनकी गौशाला में नया मेहमान कौन आया है। गाय के पानी पीने के लिए भी स्वीमिंग पूल जैसी व्यवस्था थी। मतलब वो जगह इतनी साफ थी हमें स्वीमिंग पूल जैसी लगी। उसे क्या कहते हैं मुझे जानकारी नहीं जहाँ गायें खाना खाती हैं और पानी पीती हैं। लेकिन साफ-सफाई की व्यवस्था बढ़िया थी। हमने ट्यूबवेल भी देखा। वहाँ मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू आ रही थी। हवा स्वच्छ, ठंडी थी। वैदिक किसान फार्म्स जाकर लगा नहीं कि हम अनजान जगह आए हैं। बहुत प्यार और अपनापन मिला। वहाँ शुद्ध देसी घी पारंपरिक तरीके से बनाया जाता है। हम ज्यादा समय वहाँ रुक नहीं पाए क्योंकि शाम को दिल्ली पहुँचना था।

पर यह छोटी सी ट्रिप रोमांचक और आनन्दमय रही। हम दिल्ली वालों के लिए तो ताजी हवा और खुला आसमान भी पिकनिक स्पॉट जैसा ही है। कुछ देर बाद वहाँ से हम पुनः उसी रिक्शा से बिजनौर अपने घर आ गए।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली