Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 63

Featured Books
Categories
Share

अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 63

अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 63 : वह बच्चा कौन था?
अंतिम पुस्तकालय में गूँजी वह आवाज़ अभी भी चारों तरफ घूम रही थी—
"दीदी..."
अनन्या का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।
उसने तुरंत नैना की तरफ देखा।
नैना उसके बिल्कुल पास खड़ी थी।
"मैंने नहीं बुलाया..."
नैना ने धीरे से कहा।
आरव ने चारों तरफ देखा।
"तो फिर आवाज़ किसकी थी?"
कबीर चुप था।
उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया था।
अनन्या ने पूछा—
"कबीर?"
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
"तुम कुछ जानते हो?"
कबीर ने धीमे स्वर में कहा—
"हाँ।"
"लेकिन जो मैं सोच रहा हूँ..."
"अगर वह सच हुआ, तो हमारी कहानी पहले से कहीं ज्यादा बड़ी है।"
अनन्या ने बेचैनी से पूछा—
"क्या?"
कबीर ने पुस्तकालय के अंधेरे को देखते हुए कहा—
"तुम्हारी माँ ने सिर्फ दो पात्र नहीं बनाए थे।"
"तीन बनाए थे।"
नैना की साँस अटक गई।
"तीन?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"तुम दोनों बहनें..."
"और वह तीसरा बच्चा।"
अनन्या ने काँपते हुए पूछा—
"कौन?"
कबीर ने जवाब देने से पहले सफेद किताब की तरफ देखा।
किताब के पन्ने अपने-आप पलटने लगे।
फिर एक पुरानी तस्वीर उभर आई।
एक कमरे में तीन बच्चे बैठे थे।
एक छोटी अनन्या।
एक छोटी नैना।
और उनके बीच...
एक छोटा लड़का।
उसकी उम्र शायद पाँच या छह साल थी।
अनन्या तस्वीर को घूरती रह गई।
"मैं..."
"इसे जानती हूँ।"
आरव ने पूछा—
"कौन है?"
अनन्या ने अपना सिर पकड़ लिया।
"मुझे याद नहीं..."
लेकिन उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था कि उसके अंदर कोई पुरानी याद जाग रही थी।
वह लड़का मुस्कुरा रहा था।
उसके हाथ में वही सुनहरी कलम थी।
छोटी नैना उससे कह रही थी—
"तुम फिर मेरी कहानी खराब कर रहे हो।"
लड़का हँसकर बोला—
"क्योंकि तुम्हारी कहानी boring है।"
छोटी अनन्या ने दोनों को डाँटते हुए कहा—
"चुप करो तुम दोनों!"
तीनों हँसने लगे।
फिर तस्वीर अचानक काली हो गई।
उसके नीचे एक नाम लिखा आया—
"अर्णव।"
अनन्या की आँखें फैल गईं।
"अर्णव..."
नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"दीदी..."
"तुम्हें याद है?"
अनन्या ने सिर हिलाया।
"हाँ..."
"थोड़ा-सा।"
"वह हमारे साथ रहता था।"
"लेकिन..."
"फिर एक दिन वह गायब हो गया।"
कबीर ने कहा—
"गायब नहीं हुआ था।"
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
"फिर?"
कबीर ने धीरे से कहा—
"उसे कहानी से निकाल दिया गया था।"
सफेद किताब में नया दृश्य उभर आया।
अनन्या की माँ उसी पुराने कमरे में बैठी थीं।
उनके सामने तीनों बच्चे थे।
अर्णव कुछ लिख रहा था।
नैना रंग भर रही थी।
अनन्या अपनी माँ से पूछ रही थी—
"माँ, अर्णव हमारे साथ क्यों रहता है?"
माँ ने मुस्कुराकर कहा—
"क्योंकि वह तुम दोनों का भाई है।"
अनन्या खुश हो गई।
"सच?"
माँ ने कहा—
"कहानी में..."
"हाँ।"
छोटी अनन्या ने तुरंत पूछा—
"और असली जिंदगी में?"
माँ कुछ पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा—
"कुछ रिश्ते खून से नहीं..."
"कहानी से बनते हैं।"
छोटी नैना ने अर्णव का हाथ पकड़ लिया।
"तो यह हमेशा हमारा भाई रहेगा।"
अर्णव मुस्कुराया।
"हाँ।"
दृश्य अचानक बदल गया।
अब माँ बहुत परेशान थीं।
उनके सामने वही सफेद किताब खुली थी।
उसके पन्ने काले हो रहे थे।
माँ बार-बार कुछ मिटा रही थीं।
अनन्या दरवाज़े के पीछे खड़ी यह सब देख रही थी।
माँ ने किताब में लिखा—
"अर्णव को कहानी से बाहर करना होगा।"
अनन्या की आँखें फैल गईं।
"क्यों?"
दृश्य में माँ ने जैसे उसकी आवाज़ सुन ली।
उन्होंने पीछे मुड़कर देखा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
उन्होंने किताब बंद कर दी।
अगले ही पल...
अर्णव कमरे में आया।
"माँ?"
माँ ने उसे देखा।
उनकी आँखों में आँसू थे।
"अर्णव..."
"तुम्हें जाना होगा।"
अर्णव घबरा गया।
"कहाँ?"
"बहुत दूर।"
"क्यों?"
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"क्योंकि अगर तुम यहाँ रहे..."
"तो अनन्या और नैना सुरक्षित नहीं रहेंगी।"
अर्णव ने पूछा—
"लेकिन मैं तो उनका भाई हूँ।"
माँ ने आँसू छिपाते हुए कहा—
"इसीलिए।"
अर्णव रोने लगा।
"मैं उन्हें छोड़कर नहीं जाऊँगा।"
माँ ने उसे गले लगा लिया।
"एक दिन..."
"वे तुम्हें फिर याद करेंगी।"
"लेकिन तब तक..."
"तुम्हें अपनी कहानी खुद लिखनी होगी।"
अचानक सफेद रोशनी फैली।
अर्णव गायब हो गया।
और उसी पल...
छोटी अनन्या की यादों से उसका चेहरा मिट गया।
छोटी नैना भी उसे भूल गई।
वर्तमान में अनन्या जमीन पर बैठ गई।
"तो..."
"हमने उसे इसलिए भुलाया क्योंकि माँ ने उसकी यादें मिटा दी थीं?"
कबीर ने कहा—
"हाँ।"
नैना रोते हुए बोली—
"लेकिन वह अब कहाँ है?"
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी पुस्तकालय की सबसे ऊँची अलमारी से एक किताब नीचे गिरी।
धड़ाम!
आरव ने उसे उठाया।
कवर पर लिखा था—
"अर्णव – अधूरी कहानी"
अनन्या ने किताब अपने हाथ में ली।
कवर छूते ही...
उसके सामने अंधेरा छा गया।
उसे किसी की आवाज़ सुनाई दी—
"दीदी..."
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
"अर्णव?"
आवाज़ फिर आई—
"तुमने कहा था..."
"तुम मुझे कभी नहीं भूलोगी।"
अनन्या रो पड़ी।
"मुझे माफ कर दो।"
लेकिन आवाज़ इस बार बदल गई।
"तुम्हें माफ करने के लिए..."
"मुझे तुम्हें पहले ढूँढना होगा।"
अनन्या ने आँखें खोल दीं।
उसके सामने एक विशाल दरवाज़ा था।
दरवाज़े पर लिखा था—
"अर्णव की दुनिया"
आरव ने पूछा—
"क्या हमें इसके अंदर जाना होगा?"
कबीर ने कहा—
"हाँ।"
नैना ने कहा—
"लेकिन अगर अर्णव कहानी से बाहर कर दिया गया था..."
"तो उसकी दुनिया कहाँ से आई?"
कबीर ने गंभीर होकर कहा—
"यही सबसे बड़ा सवाल है।"
अनन्या ने दरवाज़े को देखा।
"मैं अंदर जाऊँगी।"
आरव ने तुरंत कहा—
"मैं भी।"
नैना बोली—
"मैं भी।"
कबीर ने उन्हें देखा।
"शायद वहाँ से कोई वापस न आए।"
अनन्या ने कहा—
"फिर भी जाना होगा।"
"क्योंकि इस बार..."
"हम अपने भाई को अकेला नहीं छोड़ेंगे।"
दरवाज़ा खुल गया।
अंदर घना जंगल था।
आसमान बिल्कुल लाल था।
पेड़ों की शाखाओं पर हजारों छोटे कागज़ लटक रहे थे।
हर कागज़ पर किसी की कहानी लिखी थी।
लेकिन बीच में एक रास्ता था।
उस रास्ते के आखिर में एक छोटा घर दिखाई दे रहा था।
घर के बाहर कोई बैठा था।
पीठ उनकी तरफ थी।
उसने सफेद शर्ट पहन रखी थी।
अनन्या ने धीरे से आवाज़ दी—
"अर्णव?"
वह व्यक्ति रुक गया।
कुछ पल तक बिल्कुल शांत रहा।
फिर धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।
अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले।
वह वही चेहरा था...
जो उसकी यादों में धुंधला था।
अर्णव।
लेकिन अब वह बच्चा नहीं था।
वह एक जवान लड़का बन चुका था।
उसकी आँखों में वही शरारत थी।
लेकिन चेहरे पर वर्षों का अकेलापन साफ दिखाई देता था।
अर्णव ने अनन्या को देखा।
फिर नैना को।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
"तो..."
"आखिरकार..."
"तुम दोनों को याद आ ही गया।"
नैना उसके पास दौड़ना चाहती थी।
लेकिन अर्णव ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
"रुको।"
नैना रुक गई।
"भैया..."
अर्णव की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन उसने उन्हें गिरने नहीं दिया।
"यह शब्द..."
"मैंने कितने सालों से नहीं सुना।"
अनन्या आगे बढ़ी।
"अर्णव..."
"मुझे माफ कर दो।"
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
"तुम्हारी गलती नहीं थी।"
"तुम्हें याद ही नहीं था।"
"लेकिन अब याद है।"
अनन्या ने कहा—
"हाँ।"
अर्णव मुस्कुराया।
"तो फिर एक सवाल का जवाब दो।"
अनन्या ने पूछा—
"क्या?"
अर्णव की मुस्कान गायब हो गई।
"तुम यहाँ मुझे वापस लेने आई हो..."
"या अपनी कहानी बचाने?"
अनन्या कुछ बोल नहीं पाई।
तभी पीछे से भक्षक की आवाज़ आई—
"यही सवाल मैं भी पूछना चाहता हूँ।"
अर्णव का चेहरा अचानक बदल गया।
उसने अनन्या की तरफ देखा।
"तुम्हें पता है..."
"तुम्हारी माँ ने मुझे कहानी से क्यों निकाला था?"
अनन्या ने सिर हिलाया।
अर्णव ने कहा—
"क्योंकि मैं भक्षक से पहले पैदा हुआ था।"
सब चौंक गए।
कबीर ने पूछा—
"क्या मतलब?"
अर्णव ने कहा—
"भक्षक डर से बना था।"
"लेकिन..."
"मैं इच्छा से बना था।"
"मैं वह पात्र था..."
"जिसे लेखक अपनी कहानी से बाहर जाकर भी जीने की शक्ति देना चाहता था।"
अनन्या ने फुसफुसाकर कहा—
"तो तुम..."
अर्णव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
"मैं कहानी का पहला ऐसा पात्र हूँ..."
"जिसने लेखक की कलम के बिना जीना सीख लिया।"
अचानक आसमान काला हो गया।
पेड़ों पर लटके सारे पन्ने जलने लगे।
भक्षक की आवाज़ गूँजी—
"और इसी वजह से..."
"मुझे उसे खत्म करना है।"
अर्णव ने आसमान की ओर देखा।
उसकी आँखों में पहली बार गुस्सा दिखाई दिया।
"तो आओ।"
"इस बार..."
"कहानी तुम्हारी नहीं होगी।"
अनन्या ने अपनी बहन और आरव का हाथ पकड़ लिया।
कबीर ने काली होती किताब को कसकर पकड़ लिया।
और अगले ही पल...
पूरा जंगल हजारों काली परछाइयों से भर गया।
अर्णव ने अनन्या की ओर देखा और कहा—
"दीदी..."
"अब मेरी कहानी का सबसे खतरनाक अध्याय शुरू होने वाला है।"
क्रमशः...