Dhundh ke Pichhe in Hindi Thriller by Shaziya Khan books and stories PDF | धुंध के पीछे - 3

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धुंध के पीछे - 3

भाग 3: बिछाया गया जाल


हवेली के बाहर शाम ढल रही थी और आसमान में काले बादल घिर आए थे। ड्राइंग रूम के अंदर का सन्नाटा बाहर के मौसम से भी ज़्यादा भारी था। मुस्कान के हाथ में इत्र की वो शीशी अभी भी थी, जिसकी महक अब पूरे कमरे में फैल चुकी थी। दानिश सोफे पर पैर फैलाए बैठा था, मानो उसे किसी बात की कोई फिक्र ही न हो। उसका यह सुकून मुस्कान को अंदर ही अंदर डरा रहा था।


तभी अचानक हवेली के अहाते में पुलिस की गाड़ियों के ब्रेक लगने की आवाज़ गूँजी। 'चररर...' और फिर कई कदमों की भारी आहट अंदर की तरफ बढ़ने लगी।
दरवाज़ा खटखटाए बिना ही खुल गया। इंस्पेक्टर आदिल हाथ में रिवॉल्वर लिए अंदर दाखिल हुआ, उसके पीछे चार सिपाही भी थे। आदिल की आँखें सीधे दानिश पर टिकी थीं।


"मिस्टर दानिश! अपनी जगह से हिलना मत,


आदिल ने कड़क आवाज़ में कहा।

"तुम्हारी पत्नी की शिकायत पर हम तुम्हें उस लड़की के मर्डर और सबूत मिटाने के शक में गिरफ्तार करने आए हैं। सिपाही, इसके हाथ में हथकड़ी लगाओ!


मुस्कान ने राहत की एक सांस ली और दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गई। उसने काँपती आवाज़ में कहा,

"आदिल साहब, इसके पास ही वो इत्र है। कल रात इसने बेसमेंट में किसी से सबूत छुपाने की बात भी की थी।


दानिश अपनी जगह से उठा। वह पुलिस को देखकर ज़रा भी नहीं घबराया। उसने अपने दोनों हाथ आगे कर दिए और सिपाहियों ने उसके हाथों में लोहे की ठंडी हथकड़ी पहना दी।


दानिश ने मुस्कुराकर आदिल की तरफ देखा और कहा


"इंस्पेक्टर आदिल... आप बहुत फुर्तीले निकले। लेकिन गुनाहगार को ले जाने से पहले, ज़रा हवेली की तलाशी तो ले लीजिए। क्या पता आपको वो 'सबूत' भी मिल जाए जिसकी बात मेरी पत्नी कर रही थी?


आदिल की आँखों में एक पल के लिए घबराहट की लकीर उभरी, पर उसने तुरंत खुद को संभाला। उसने सिपाहियों को हुक्म दिया,

"दो लोग बेसमेंट की तलाशी लो, और दो लोग इसके बेडरूम की!


कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया। मुस्कान सिर्फ सुन सकती थी—सिपाहियों के जूतों की आवाज़, चीज़ों के पलटने की आवाजें। लगभग पंद्रह मिनट बाद, बेसमेंट से एक सिपाही हाथ में एक खून से सना हुआ चाकू और कुछ गंदे कपड़े लेकर ऊपर आया।


"सर! यह बेसमेंट के कोने में एक बक्से से मिला है। चाकू पर खून के निशान साफ़ हैं,

सिपाही ने आदिल को दिखाते हुए कहा।


मुस्कान की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने रोते हुए कहा,

"दानिश... तुमने ऐसा क्यों किया? तुम इतने बेरहम कैसे हो सकते हो?


दानिश ने मुस्कान की तरफ देखा, उसकी आवाज़ में इस बार नफरत नहीं, बल्कि एक अजीब सा दर्द था। वह बोला,

"मुस्कान, सच तुम्हारी अंधी आँखों से भी ज़्यादा धुंधला है। मैंने कहा था ना... कि जब आदिल आएगा, तो खेल देखने लायक होगा।


आदिल ने दानिश को पीछे से धक्का देते हुए कहा,

"बकवास बंद करो! चलो जीप में बैठो।


सिपाही दानिश को बाहर ले जाने लगे। 'टुक... चप... टुक... चप...' दानिश के लंगड़ाते कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे हवेली से बाहर निकल गई और जीप का दरवाज़ा बंद हो गया। पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई वहाँ से रवाना हो गईं।


अब हवेली में सिर्फ मुस्कान और इंस्पेक्टर आदिल बचे थे। आदिल ने अपनी रिवॉल्वर वापस जेब में रखी और मुस्कान के करीब आया।


"अब आप महफूज़ हैं मुस्कान जी। कातिल सलाखों के पीछे जा चुका है,

आदिल ने बहुत ही नर्म और तसल्ली बख्श आवाज़ में कहा।


लेकिन जैसे ही आदिल मुस्कान के बिल्कुल करीब आकर रुका, मुस्कान का पूरा बदन एक बार फिर बर्फ की तरह जम गया।


हवेली की खिड़की से हवा का एक तेज़ झोंका अंदर आया। और उस झोंके के साथ, इंस्पेक्टर आदिल के बदन से एक खुशबू उड़कर मुस्कान के नथुनों से टकराई। वह कोई आम पुलिसिया परफ्यूम नहीं था... वह 'चंदन के इत्र' की वही बेहद तेज़ और नशीली महक थी, जो मुस्कान ने उस कत्ल वाली रात महसूस की थी!
मुस्कान के होश उड़ गए। उसने अपनी सांस को रोकने की कोशिश की। तभी आदिल ने चलने के लिए अपना कदम आगे बढ़ाया।


'टुक... चप...


आदिल का एक पैर फर्श पर भारी पड़ा और दूसरा हल्का। वह लंगड़ाकर चल रहा था! जबकि सुबह जब वह आया था, तो उसकी चाल बिल्कुल सामान्य थी।
आदिल ने धीरे से मुस्कान के कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ बहुत ठंडा था। वह मुस्कान के कान के पास झुककर बहुत ही धीमी और खौफनाक आवाज़ में बुदबुदाया,

"मुस्कान जी... दानिश तो चला गया। पर आपको क्या लगता है, क्या पुलिस वाकई सही कातिल को पकड़ कर ले गई है?


मुस्कान का दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि उसे लगा वह अभी बेहोश हो जाएगी। असली कातिल दानिश नहीं... बल्कि उसके सामने खड़ा इंस्पेक्टर आदिल था, जिसने दानिश को फंसाने के लिए यह पूरा जाल बुना था! लेकिन दानिश यह बात जानते हुए भी चुप क्यों रहा? (जारी है)