Mout ka Parmit - 1 in Hindi Horror Stories by Gujaratinu Gaurav books and stories PDF | मौत का परमिट - 1

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मौत का परमिट - 1

बारिश ने पहाड़ को निगल लिया था।

रात के दो बज रहे थे, और केदारनाथ की ओर जाने वाला संकरा पहाड़ी रास्ता अब किसी नदी जैसा लग रहा था। पानी की धार इतनी तेज थी कि पत्थर उखड़ रहे थे, मिट्टी बह रही थी, और जो लोग इस रास्ते पर थे, वे अब रुक भी नहीं सकते थे। आगे बढ़ना खतरनाक था, पीछे लौटना नामुमकिन।

विक्रम सिंह ने अपनी पीठ पर पड़े बैग को सीधा किया और सामने अंधेरे में झाँका। उम्र के पैंतालीसवें साल में वह खुद को अभी भी मजबूत मानता था, लेकिन इस रात ने उसकी ताकत को परखना शुरू कर दिया था। उसके चेहरे पर ठंडे पानी की बूँदें बार-बार गिर रही थीं, और उसने अपनी जैकेट का कॉलर और ऊपर उठाया, हालाँकि अब तक वह पूरी तरह भीग चुका था।

"विक्रम जी, आगे क्या होगा?" पीछे से आवाज आई।

विक्रम ने पलट कर देखा। अरुण था—लगभग तीस साल का एक नौजवान, जो अपनी पत्नी और दो साल की बेटी के साथ इस तीर्थ यात्रा पर निकला था। अरुण की आँखों में डर था, लेकिन उसने अपनी बेटी को गोद में उठा रखा था, और उसकी पत्नी ने उसकी बाजू पकड़ रखी थी।

"कुछ नहीं होगा," विक्रम ने कहा, हालाँकि उसे खुद यकीन नहीं था। "रास्ता टूट गया है, लेकिन हमें आगे बढ़ना होगा।"

पीछे की तरफ से चीख सुनाई दी। कोई गिरा था। विक्रम ने पलट कर देखा तो एक बुजुर्ग महिला जमीन पर बैठी थी, उसका एक पैर पानी में बहते पत्थरों के बीच फँस गया था। दो-तीन लोग उसे उठाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन पानी का बहाव इतना तेज था कि संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा था।

"रुको, मत हिलाओ उसे!" विक्रम ने चिल्लाकर कहा और पीछे की ओर लौटा। उसने अपने पैर पानी में जमाए और उस महिला की बाजू पकड़ी। पानी ठंडा था, इतना ठंडा कि उसकी उँगलियाँ सुन्न हो गई थीं। उसने जोर लगाया और महिला को उठाया। उसका पैर फँसा हुआ था, लेकिन पानी के तेज बहाव ने एक बड़ा पत्थर हटा दिया था और वह निकल आई।

"बहुत बड़ा काम किया भाई साहब," किसी ने कहा।

विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया। वह खड़ा हुआ और चारों ओर देखा। यहाँ हज़ारों लोग थे। कुछ परिवार थे, कुछ अकेले यात्री, कुछ साधु-संत, कुछ दुकानदार। कोई भी इस आपदा के लिए तैयार नहीं था। अचानक बादल फटने की आवाज आई थी, और पहाड़ के उस पार से ऐसा शोर उठा था मानो पूरा पहाड़ ढह रहा हो।

"सर, हम क्या करेंगे?" एक नौजवान लड़की आगे आई। उसकी उम्र बाईस-तेईस साल के आसपास थी, उसने अपना सिर ढक रखा था और पानी से भीगी हुई थी। उसके बगल में एक बुजुर्ग व्यक्ति था—शायद उसके दादा।

"तुम्हारा नाम?" विक्रम ने पूछा।

"मेघा। मेघा वर्मा। हम दोनों अकेले हैं।"

"किसी और के साथ हो तो पूछ लो," विक्रम ने कहा। "अभी हम सब एक साथ रहेंगे। यह रास्ता पूरा टूट चुका है, पीछे मत जाओ। आगे बढ़ना होगा।"

लेकिन आगे का रास्ता भी अब साफ नहीं था। रात के अंधेरे में बारिश की तेज आवाज में कुछ सुनाई नहीं देता था। लोग डर रहे थे। कोई बच्चा रो रहा था, कोई औरत भगवान का नाम ले रही थी, कोई फोन पर किसी को कॉल करने की कोशिश कर रहा था लेकिन नेटवर्क डेड था।

"भाई, यह तो बहुत बड़ी मुसीबत है," अरुण ने विक्रम के पास आकर कहा। "मेरी बेटी को बुखार आ गया है। कोई डॉक्टर है यहाँ?"

"मुझे नहीं पता," विक्रम ने कहा। "लेकिन हम कहीं रुकेंगे तो हालात और खराब होंगे। हमें आगे बढ़ना चाहिए।"

विक्रम अपने आप में एक साधारण आदमी था। दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था, पत्नी और दो बच्चे घर पर थे। इस यात्रा पर वह अकेला आया था—बस कुछ दिनों के लिए सब कुछ भूलकर शांति पाने के लिए। लेकिन अब उसे लग रहा था कि शांति की बजाय उसकी जिंदगी का सबसे कठिन अध्याय शुरू हो गया है।

उसने आगे बढ़ने का फैसला किया। "सुनो सब लोग, आगे का रास्ता टूट गया है, लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने पर एक पुराना ट्रैक है। उसे सालों पहले बंद कर दिया गया था, लेकिन अगर वहाँ पहुँच गए तो बच सकते हैं।"

"बंद ट्रैक?" एक आवाज आई। "वहाँ तो जाना मना है।"

"यहाँ रुकना ज्यादा मुश्किल है," विक्रम ने कहा। "जो लोग मेरे साथ आना चाहें, चलो। बाकी जो रुकना चाहते हैं, रुको।"


कुछ ही मिनटों में विक्रम के पीछे चालीस-पचास लोग इकट्ठा हो गए। उनमें से ज्यादातर ऐसे लोग थे जिन्होंने अपने परिवार खो दिए थे या जो अकेले थे। अरुण अपनी पत्नी और बच्ची के साथ था। मेघा अपने दादा के साथ। एक और आदमी—नाम था सुशील—एक किराने की दुकान का मालिक, जो पूरी यात्रा के दौरान अपनी बड़ी थैली में ज़रूरत से ज्यादा सामान लेकर चल रहा था, अब वह भी पीछे आ गया।

रास्ता बेहद खतरनाक था। बारिश थमती नहीं थी, बल्कि और तेज होती जा रही थी। पैरों के नीचे कीचड़, पत्थर और टूटी हुई रेलिंग के टुकड़े बिखरे हुए थे। अंधेरा इतना गहरा था कि मोबाइल की फ्लैशलाइट भी काम नहीं कर रही थी—कुछ की बैटरी खत्म हो चुकी थी, कुछ की।

"रुको," विक्रम ने कहा और अपनी जैकेट की जेब से एक छोटी टॉर्च निकाली। वह एक आदत थी—हमेशा एक टॉर्च रखता था। उसने उसे ऑन किया और आगे की तरफ रोशनी फेंकी।

सामने का नजारा देखकर वह ठिठक गया।

रास्ता पूरी तरह से टूट चुका था। सड़क का लगभग बीस फीट का हिस्सा पहाड़ से अलग होकर नीचे खाई में गिर चुका था। बचा हुआ रास्ता इतना संकरा था कि उस पर एक व्यक्ति भी मुश्किल से गुजर सकता था, और उसके नीचे सीधी खाई थी—शायद पाँच सौ फीट गहरी।

"यहाँ से तो नहीं जा सकते," अरुण ने कहा। "बच्ची को लेकर..."

"इधर देखो," मेघा ने बीच में बोला। उसने अपनी फोन की रोशनी बाईं ओर घुमाई। "वहाँ एक रास्ता है—पुराना जैसा लगता है। जंगल उग आया है, लेकिन पायदान हैं।"

सभी ने उधर देखा। सच में, मुख्य सड़क से थोड़ा नीचे एक पुराना ट्रैक दिख रहा था—संकरा, लंबी घास और झाड़ियों से ढका हुआ। लेकिन उस पर किसी ने हाल ही में चलने के निशान थे।

"पहले यहाँ से कोई गया है," विक्रम ने कहा। "तो रास्ता सही होगा।"

लेकिन जैसे ही वह नीचे उतरने को बढ़ा, उसकी नजर कुछ और पर पड़ी। ट्रैक के शुरुआती हिस्से में एक पुराना बोर्ड लगा था, जिस पर लिखा था:

"खतरनाक—प्रवेश वर्जित—सरकारी आदेश"

बोर्ड जंग खा चुका था, और उसकी तारें टूटी हुई थीं। लेकिन उसके नीचे किसी ने सफेद पेंट से ताजा कुछ लिखा था:

"यह रास्ता बंद नहीं किया गया था। छिपाया गया था।"

विक्रम ने उसे पढ़ा और कुछ देर रुका।

"क्या है?" मेघा ने पूछा।

"कुछ नहीं," विक्रम ने कहा और बोर्ड की तरफ ध्यान न देने की कोशिश की। "चलो, हमें नीचे उतरना होगा।"


पुराना ट्रैक सच में खतरनाक था। पत्थर ढीले थे, पैर रखने पर सरक जाते थे। हर कदम पर किसी न किसी को संभलना पड़ता था। बारिश की वजह से पानी पत्थरों पर बह रहा था, जिससे वे और भी फिसलन भरे हो गए थे।

"सावधान रहना," विक्रम ने पीछे वालों से कहा। "एक-एक करके चलो, भीड़ मत करो।"

पर उनकी तादाद पचास से ज्यादा थी, और सब एक ही समय उतरना चाहते थे। कोई धक्का दे रहा था, कोई पीछे से हड़बड़ा रहा था।

"रुको!" अरुण चिल्लाया। उसकी पत्नी ने अपना पैर रखा और फिसल गई। वह नीचे गिरी, लेकिन अरुण ने उसका हाथ पकड़ लिया। बच्ची जोर से रोने लगी।

"बस एक सेकंड," विक्रम पीछे लौटा। "अरुण, बच्ची मुझे दे दो। तुम अपनी पत्नी को संभालो।"

अरुण ने बच्ची विक्रम को थमाई और अपनी पत्नी को उठाया। बच्ची की आँखों में आँसू थे, लेकिन वह विक्रम को देखकर चुप हो गई—शायद डर से या फिर थकान से।

"नाम क्या है तुम्हारा?" विक्रम ने बच्ची से पूछा।

"आराध्या," अरुण की पत्नी ने उत्तर दिया, जो अब खड़ी हो चुकी थी। "उसे बुखार है, सर।"

"हम नीचे पहुँचेंगे तो कुछ इंतज़ाम करेंगे," विक्रम ने कहा।

ट्रैक पर चलते हुए विक्रम को कई चीजें अजीब लग रही थीं। यह रास्ता पूरी तरह बंद नहीं था—यहाँ-वहाँ ताजा पैरों के निशान थे, कुछ थैलियों के निशान थे, यहाँ तक कि एक जगह पानी की बोतल भी पड़ी थी जो हाल की लगती थी।

"यहाँ कोई आया-जाया करता है," सुशील ने कहा, जो अब तक विक्रम के पीछे-पीछे आ रहा था। "यह रास्ता बंद नहीं है, भाई। बस नाम का है।"

"तुम्हें कैसे पता?" विक्रम ने पूछा।

सुशील ने कुछ कहने से पहले झिझक की। "मैं यहाँ पहले भी आया हूँ। पाँच साल पहले। उस वक्त भी यह रास्ता बंद बताया गया था, लेकिन हम लोकल गाइड्स के साथ आए थे। गाइड ने बताया था कि यह रास्ता कभी-कभी खोल दिया जाता है जब मुख्य रास्ता बंद होता है।"

"किसके आदेश पर?"

"पता नहीं। लेकिन उस वक्त हम सब कहीं गए थे, और पता चला कि जिन लोगों को मुख्य रास्ते से लौटना पड़ा था, उनके नाम... उनके परमिट कैंसल हो गए थे।"

"परमिट?" विक्रम ने रुककर उसकी तरफ देखा। "तुम क्या कह रहे हो?"

सुशील ने अपना बैग आगे किया। "भाई, आपको पता है, इस यात्रा के लिए हर व्यक्ति को एक परमिट लेना पड़ता है। सरकार तय करती है कि एक दिन में कितने लोग जा सकते हैं। मगर इस बार..."

"इस बार क्या?"

"इस बार जितने लोग हैं, उससे कहीं ज्यादा परमिट बेचे गए। मैंने खुद सुना—ट्रैवल एजेंट कह रहा था कि अगर पैसे दो तो परमिट मिल जाएगा, चाहे सीमा पूरी हो चुकी हो।"

विक्रम की रीढ़ में एक ठंडक दौड़ गई। उसने अब सोचा—जितने लोग यहाँ फँसे हैं, उनकी संख्या शायद तीन-चार हज़ार है। लेकिन असल परमिट सीमा थी केवल एक हज़ार। क्या यहाँ जानबूझकर ज्यादा लोगों को भेजा गया था?

"यह बहुत बड़ी बात है," विक्रम ने धीरे से कहा।

"और सुनो," सुशील ने और पास आकर कहा, "पिछली बार जब मैं आया था, तो कुछ लोगों ने बताया था कि इस रास्ते को बंद करने का असल कारण भूस्खलन नहीं था।"

"तो क्या था?"

"किसी ने कहा कि एक साल पहले यहाँ कुछ हुआ था। बहुत बड़ा... कुछ लोग मारे गए थे। और उसके बाद सरकार ने इस रास्ते को बंद कर दिया। लेकिन सच को दबा दिया गया।"

विक्रम ने आगे देखा। बारिश अब भी तेज थी। ट्रैक पर अंधेरा छाया हुआ था। उसने आराध्या को और मजबूती से पकड़ा, क्योंकि उसकी बाँहें थकने लगी थीं।


लगभग आधे घंटे बाद वे एक छोटे से मैदानी हिस्से में पहुँचे। यहाँ पुराना ट्रैक थोड़ा चौड़ा था, और कुछ बड़े पत्थर ऐसे थे जिन पर बैठा जा सकता था। कई लोग थक चुके थे, कुछ के पैरों में चोट थी, एक बुजुर्ग औरत को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी।

"रुको, थोड़ी देर रुको," विक्रम ने कहा और सबको रुकने का इशारा किया। "पाँच मिनट का ब्रेक।"

उसने आराध्या को नीचे बैठाया। बच्ची बुखार से तप रही थी। अरुण ने अपना पानी निकाला और उसे पिलाया।

"ठीक है बेटा?" अरुण ने पूछा।

बच्ची ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखें बंद हो रही थीं।

"हम कब तक चलेंगे?" मेघा ने विक्रम से पूछा। उसके दादा अब तक काफी थक चुके थे।

"जब तक हम किसी सुरक्षित जगह न पहुँच जाएँ," विक्रम ने कहा। "यहाँ रुकना ठीक नहीं। रात है, बारिश हो रही है, और पहाड़ और भी ढह सकता है।"

"पर हम नहीं जानते कि यह रास्ता कहाँ जाता है," सुशील ने कहा। "पुराने नक्शे में यह ट्रैक किसी गाँव तक जाता था, लेकिन वह गाँव बहुत साल पहले खाली कर दिया गया था।"

"तो भी वहाँ कुछ तो होगा—खंडहर, आश्रय, कुछ न कुछ।"

लेकिन तभी मेघा ने कुछ देखा। वह उठकर ट्रैक के किनारे गई, जहाँ झाड़ियों के बीच कुछ धातु का टुकड़ा दिख रहा था। उसने उसे खींचकर बाहर निकाला।

"यह देखो," उसने कहा।

सबने उधर देखा। वह एक पुराना साइनबोर्ड था, लगभग पूरी तरह जंग खा चुका था। लेकिन उस पर कुछ शब्द अब भी पढ़े जा सकते थे:

"गाँव सुरन — ३ किमी →"

नीचे लिखा था:

"यह गाँव सरकारी आदेशानुसार २०११ में खाली कराया गया। प्रवेश निषेध।"

लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात उसके पीछे लिखी थी—किसी ने पेन से लिखा था, शायद हाल ही में:

"गाँव खाली नहीं हुआ था। लोग वहाँ मारे गए थे।"

विक्रम ने उस पंक्ति को पढ़ा, और उसके दिमाग में सवालों का तूफान उठ खड़ा हुआ। परमिट की गड़बड़ी, बंद रास्ता, यह पुराना गाँव जो खाली नहीं बल्कि 'मारा' गया था, और सबसे ऊपर—किसने लिखा था यह?

"मेघा, यह बोर्ड बहुत पुराना है," विक्रम ने कहा। "लेकिन यह लेटेस्ट लिखावट किसी ने कुछ दिन या हफ्ते पहले लिखी होगी।"

"तो यहाँ कोई और भी है?" अरुण ने पूछा, उसकी आवाज में डर था।

"नहीं, कोई और नहीं," विक्रम ने कहा, हालाँकि उसे खुद यकीन नहीं था। "चलो, हमें यहाँ से निकलना है।"


वे फिर चलने लगे। बारिश कुछ कम हुई थी, लेकिन हवा तेज हो गई थी। ऊपर से पहाड़ पर पत्थरों के खिसकने की आवाजें आ रही थीं—लगातार, लंबी, डरावनी। हर बार कोई आवाज आती, तो सारे लोग रुक जाते और ऊपर देखते।

"भगवान, हमें बचा लो," कोई फुसफुसा रहा था।

विक्रम ने अपनी टॉर्च की रोशनी आगे फेंकी। ट्रैक अब नीचे उतर रहा था, और आगे कुछ बड़ी संरचना दिख रही थी—शायद कोई पुराना मंदिर या धर्मशाला।

"वहाँ चलो," उसने कहा।

जब वे पास पहुँचे तो पता चला—यह एक पुराना मंदिर था। छत टूटी हुई थी, दीवारें फटी हुई थीं, लेकिन अंदर का हिस्सा अभी भी खड़ा था। बारिश से बचने के लिए यह एक अच्छी जगह थी।

"अंदर चलो," विक्रम ने सबको इशारा किया। "यहाँ रात बिताएँगे, सुबह रोशनी में आगे बढ़ेंगे।"

सब लोग अंदर घुसने लगे। करीब तीस-चालीस लोग उस मंदिर में आ गए। कुछ ने जमीन पर बैठना शुरू कर दिया, कुछ ने अपनी थैलियाँ खोलीं, कोई बच्चे रो रहे थे, कोई औरत प्रार्थना कर रही थी।

विक्रम ने मंदिर के अंदर एक कोने में अपनी टॉर्च घुमाई। वहाँ एक पुराना लकड़ी का बक्सा पड़ा था, टूटा हुआ, खुला हुआ। उसके अंदर कुछ कागज थे—पुराने, पीले पड़ चुके।

उसने एक कागज उठाया। उस पर अंग्रेजी और हिंदी में कुछ टाइप किया हुआ था। बहुत मुश्किल से पढ़ा, क्योंकि स्याही फीकी पड़ चुकी थी और पानी लगने से कई जगह धुंधली हो गई थी:

"प्रशासनिक रिपोर्ट — त्रासदी २०११ — गाँव सुरन"

"...कुल ४७ यात्री... रास्ता बंद होने के बावजूद... पर्याप्त परमिट न होने के बावजूद... अधिकारियों ने..."

बाकी शब्द धुंधले थे। उसने कागज पलटा, लेकिन पीछे कुछ नहीं था।

"यह क्या है?" मेघा उसके पास आई।

"एक पुरानी रिपोर्ट," विक्रम ने कहा। "२०११ की। इसी गाँव की।"

मेघा ने कागज को ध्यान से देखा। "तो यह सच है? पहले भी कुछ हुआ था?"

विक्रम ने गहरी साँस ली। "हाँ। और यही रास्ता बंद किया गया था।"

सुशील, जो पास में खड़ा था, बोला, "मैंने तुम्हें बताया था। कुछ हुआ था। अब समझ आया क्यों इसे बंद किया गया। मगर सवाल यह है—अगर २०११ में हुआ था, तो फिर से क्यों? इस बार इतने सारे परमिट क्यों बेचे गए?"

विक्रम के मन में एक अजीब सी बात दौड़ी। उसने बक्से में और हाथ डाला—एक और कागज मिला। उस पर लिखा था:

"जाँच आदेश — २०११ की त्रासदी — सभी दस्तावेज़ नष्ट किए जाएं।"

और सबसे नीचे एक हस्ताक्षर थे—पढ़ने में नहीं आ रहे थे, मगर उनके नीचे तारीख थी:

"१५ सितंबर २०११"

विक्रम ने कागज पकड़ा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, हालाँकि उसे पता नहीं था कि ठंड से या डर से। इसका मतलब कि २०११ की त्रासदी को दबा दिया गया था। सभी दस्तावेज़ नष्ट कर दिए गए थे। लेकिन यह बक्सा—यह कैसे बच गया?

"यह हमें किसी ने जानबूझकर दिखाने के लिए छोड़ा है," मेघा ने कहा। "शायद वही जिसने बोर्ड पर भी लिखा था।"

"या फिर," सुशील ने आगे बढ़कर कहा, "यह उसी का है जिसने इस त्रासदी को अंजाम दिया था। और वह हमारे बीच है।"

मंदिर में सन्नाटा छा गया। बारिश की बूँदें अब भी टप-टप कर रही थीं, लेकिन अंदर कोई बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था।

विक्रम ने कागज़ को अपनी जेब में रखा और खड़ा हो गया। उसने सबकी तरफ देखा—हर चेहरा डरा हुआ था, थका हुआ था, और उम्मीद की एक पतली सी किरण उन सब पर तैर रही थी। वह जानता था कि अब वह सिर्फ एक मैनेजर नहीं था। अब उसे इन सबको जीवित रखना था, और सच को उजागर करना था—चाहे कुछ भी हो।

"सुनो सब," उसने कहा, उसकी आवाज मंदिर की दीवारों से टकरा रही थी। "आज रात हम यहाँ रुकेंगे। सुबह होते ही हम आगे बढ़ेंगे। और जो कुछ भी इस पहाड़ पर हुआ है—और जो कुछ भी अब हो रहा है—हम उसका सामना करेंगे। मैं वादा करता हूँ, हर एक व्यक्ति जो यहाँ है, वह सुरक्षित बाहर निकलेगा।"

किसी ने कुछ नहीं कहा। लेकिन विक्रम ने महसूस किया कि कुछ चेहरों पर थोड़ी राहत आई। कुछ ने सिर हिलाया।

फिर बाहर तेज धमाका हुआ। सब लोग चौंककर उछले। विक्रम दरवाजे की तरफ बढ़ा और बाहर झाँका—ऊपर पहाड़ से एक बड़ा चट्टान का टुकड़ा टूटकर नीचे गिरा था, सिर्फ सौ फीट दूर। धमाके की गूंज कई सेकंड तक सुनाई दी।

"चट्टान गिरी है," सुशील ने कहा, उसकी आवाज डर से काँप रही थी। "भाई, अगर वह हम पर गिरती..."

"पर नहीं गिरी," विक्रम ने कहा, लेकिन उसे खुद डर लग रहा था। "हम यहाँ सुरक्षित हैं।"

वह अंदर लौटा और मंदिर के कोने में बैठ गया। उसकी जेब में कागज था—२०११ की रिपोर्ट, नष्ट करने का आदेश, और अनजान हस्ताक्षर। उसने सोचा—कौन था वह व्यक्ति जिसने यह बक्सा यहाँ छोड़ा? क्या वह इस त्रासदी का हिस्सा था? या वह सच्चाई को बाहर लाना चाहता था?

लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो उसके मन में घूम रहा था, वह था—अगर २०११ की त्रासदी को दबा दिया गया, तो २०२४ में वही रास्ता फिर से क्यों खोला गया? और जिन्होंने अतिरिक्त परमिट बेचे, क्या उन्हें पता था कि यह त्रासदी होने वाली है?

बारिश तेज हो गई।

मंदिर के बाहर अंधेरा और गहरा हो गया।

और अंदर, एक छोटी बच्ची ने अपनी माँ से पूछा, "माँ, हम घर कब जाएँगे?"

"जल्दी, बेटा," माँ ने कहा। "बहुत जल्दी।"

लेकिन विक्रम जानता था—घर जाना अब उतना आसान नहीं था जितना वे सोच रहे थे। सच्चाई अभी शुरू हुई थी, और उसे लगा कि यह केवल पहाड़ नहीं है जिसे उन्हें पार करना है। यह लालच, भ्रष्टाचार, और एक पुरानी गुप्त त्रासदी का सामना करना था, जो अब इस पहाड़ पर दोबारा जीवित हो रही थी।

उसने अपनी जैकेट को और कसकर बाँधा और अँधेरे में झाँका।

और तभी उसकी नजर उस आदमी पर पड़ी, जो मंदिर के दूसरे कोने में बैठा था—वह व्यक्ति जो पूरी यात्रा में किसी से नहीं मिला था, जिसने किसी से कोई बात नहीं की थी, लेकिन जिसके हाथ में वही पुरानी फाइलें थीं जो विक्रम ने अभी पाई थीं—और उस आदमी की आँखें, अंधेरे में, सीधे विक्रम को देख रही थीं।