सौम्या अपने मायके आई हुई थी। बहुत दिनों बाद आई थी, सो मन में एक अलग ही उमंग थी। शाम ढलने लगी तो उसने अपनी मम्मी से कहा, "मम्मी, चलो न शाम को घूमने चलते हैं। अपना वाला प्लॉट भी दिखाकर लाओ। पैदल ही चलते हैं, घूमना भी हो जाएगा।"
मम्मी कुछ देर चुप रहीं। उनकी आँखों में एक खालीपन था। बीमारी के कारण पिछले कुछ समय से उनकी स्मृति बहुत कमजोर हो गई थी। बातें भूल जाती थीं, रास्ते भूल जाती थीं। उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, मुझे रास्ता याद नहीं आ रहा। पास वाले पार्क में घुमा लाती हूँ। प्लॉट देखने अपने पापा के साथ चली जाना।"
बस इतनी सी बात पर सौम्या को लगा जैसे मम्मी उससे कुछ छुपा रही हैं, उसे प्लॉट दिखाना ही नहीं चाहतीं। बचपन का वह जिद्दी स्वभाव फिर जाग उठा। वह गुस्से में मम्मी से बोली, "तुम दिखाना ही नहीं चाहती। कोई मैं प्लॉट चोरी करके तो नहीं ले जाऊंगी। तुम भी मुझे अब पराया समझती हो। मैं अब कभी नहीं आऊंगी तुम्हारे घर।"
इतना कहकर वह फफक कर रोने लगी और अपने कमरे में चली गई। उसकी मम्मी वहीं खड़ी रह गईं। उनकी आँखों में आँसू आ गए। ज्यादा सोचने से उनकी तबीयत और बिगड़ने लगती थी, आज फिर वही हुआ। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप रसोई में चली गईं। सौम्या ने गुस्से में शाम का खाना भी नहीं खाया।
थोड़ी देर बाद जब गुस्सा थोड़ा ठंडा पड़ा तो सौम्या अपना मूड ठीक करने के लिए अकेले ही छत पर चली गई। यह उसका बचपन का तरीका था। जब भी उसे गुस्सा आता, वह छत पर अकेले बैठकर आसमान को निहारने लगती थी। खुली हवा में बैठने से कुछ देर बाद विचारों का प्रवाह शांत हो जाता है और गुस्सा भी धीरे-धीरे पिघलने लगता है। लेकिन विचार कहाँ शांत होते हैं, एक आता है, एक जाता है।
सौम्या ने अपने चारों तरफ नजर दौड़ाई। खुला आसमान, दूर तक फैला हुआ। शाम का सिंदूरी उजाला धीरे-धीरे गहरा हो रहा था। कहीं-कहीं सफेद बादल रूई की तरह छिटके हुए थे। उसकी नजर सामने पड़ोस वाले घर की छत पर पड़ी। उस छत पर बहुत घास उग आई थी, जंगली पौधे उग आए थे।
अब वहां कोई नहीं रहता था। वर्मा जी का घर था वो। सौम्या को याद आया, कितना सुंदर घर था वो घर। वर्मा जी ने कितने अरमानों से पाई-पाई जोड़कर वह घर बनाया था। बच्चों के लिए एक-एक ईंट में सपने टांके थे। आज उनके बच्चे बड़े होकर विदेश में बस गए हैं। अब वह घर खण्डहर पड़ा है। जगह-जगह घास और जंगली पौधे उग आए हैं।
सौम्या सोचने लगी, जिंदगी का कड़वा सच यही है। इंसान चले जाते हैं इस दुनिया से और घर खड़े रह जाते हैं वहीं के वहीं। बस देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। बड़े-बड़े सुंदर घर देखते ही देखते खण्डहर बन जाते हैं।
उसने देखा, पूरा मोहल्ला ही वीरान हो गया है। सबके बच्चे बड़े होकर बाहर जाकर बस गए और यहां उनके बूढ़े मां-बाप अकेले रह गए। शाम को किसी के दरवाजे पर कोई टूहे से भी दिखाई नहीं देता बात करने के लिए। मां-बाप अपने बच्चों के लिए सब कुछ करते हैं। अपने सारे शौक दफन कर बच्चों के शौक पूरे करते हैं। और वही बच्चे बड़े होकर अपने मां-बाप को बोझ समझने लगते हैं। यह सोचते ही सौम्या का मन भर आया। उसे अपनी गलत व्यवहार पर बहुत ग्लानि महसूस हुई।
तभी नीचे से पापा की आवाज आई। सौम्या की ट्रेन का समय हो गया था। उसे बहुत दुख हो रहा था, उसने सुबह से अपनी मम्मी से सही से बात नहीं की थी। वह दौड़कर नीचे आई। उसने अपनी मम्मी से लिपटकर क्षमा मांगी। मम्मी ने कुछ नहीं कहा, बस उसके सिर पर हाथ फेर दिया।
मायके से हर बार वापसी पर उसके आंसू छलक ही आते हैं। यह आंसू खुशी और बिछोह दोनों के होते हैं। मम्मी की खामोश आंखें दूर तक उसे जाते हुए देखती रहती हैं, जब तक वह आंखों से ओझल न हो जाए।
स्टेशन पर पहुँच कर सौम्या एक बेंच पर बैठ गई। ट्रेन आने में अभी पांच मिनट बाकी थे। वह चारों तरफ अवलोकन करने लगी। स्टेशन बहुत सुंदर बना हुआ था। साफ-सुथरा। एक पैसेंजर ट्रेन पहले से ही पटरी पर खड़ी थी।
उसने एक अजीब दृश्य देखा। यात्री जानते हैं कि पल भर में दूसरी ट्रेन आने वाली है, फिर भी वे पटरी पर ही उतरकर दूसरे प्लेटफार्म पर जा रहे हैं। सरकार ने इतना पैसा खर्च करके लोगों की सुविधा के लिए फुट ओवर ब्रिज बनवाया है, पर अधिकतर यात्री अपनी जान जोखिम में डालकर पटरी पर उतरकर दूसरे प्लेटफार्म पर जा रहे थे। कैसी लापरवाही है।
तभी उसकी नजर दूर एक लड़की पर पड़ी। एक 13-14 साल की लड़की, गन्दा सा लहंगा चुनरी पहने, कंधे उचकाकर, पैर घसीटकर चल रही थी। उसके घरवालों ने जल्दी ही उसकी शादी कर दी थी। साथ में उसका बच्चा भी था, यही दो-तीन साल का। इतनी कम उम्र में उसके कंधे पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी डाल दी गई थी।
तभी दो पतली-दुबली लड़कियां ट्रेन पकड़ने की जल्दी में किनारे पर जो लोहे की फेंसिंग लगी रहती है, उसी में से निकलकर चली गईं। उस फेंसिंग में बहुत कम जगह थी। सौम्या को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, ये लड़कियां इतने कम स्पेस में से कैसे निकली। शायद गरीबी और मजबूरी शरीर को इतना लचीला बना देती है।
तभी अनाउंसमेंट हुआ, सौम्या की ट्रेन आ चुकी थी। उसके पिताजी उसे बैठाने आए थे। पिताजी ने शीघ्रता से उसका सामान सीट तक पहुंचाया। उसे बहुत सारा आशीर्वाद दिया। ट्रेन के बाहर शीशे से हाथ हिलाकर विदा कर रहे थे। उनका भावुकता से भरा चेहरा देख सौम्या की आंखों से भी आंसू आ गए। पिता चाहे कितना भी कठोर दिखे, बेटी की विदाई पर वह सबसे ज्यादा टूट जाता है।
ट्रेन चल पड़ी। सौम्या सीट पर बैठी यही सोचती रही - "मेरे मम्मी-पापा मुझे कितना प्यार करते हैं। मैं उन्हें कितना गलत समझ रही थी। वे तो मेरे लिए ही सब कुछ कर रहे हैं।"
उसे एहसास हुआ, शादी के बाद लड़की दो नावों में एक साथ सवार हो जाती है। एक नाव मायका है, दूसरी ससुराल। संतुलन बनाए रखने के लिए वह कितना दर्द सहती है। जरा सी भी चूक से रिश्ते बिखर जाते हैं। अजीब ही इस जग के नियम हैं, जहाँ प्यार सबसे ज्यादा है, वहीं डर भी सबसे ज्यादा है कि कहीं वह प्यार छूट न जाए।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली
vandna.reporter@gmail.com