भाग 2:
बिहार के बक्सर और भोजपुर की उस बंजर और तपती धूप वाली जमीन पर, जहाँ कभी ढोंगी बाबा सर्वानंद ने अपने पाखंड की पहली ईंट रखी थी, आज हवा का रुख पूरी तरह बदल चुका था। पंद्रह साल पहले जो अकबरपुर गांव एक साधारण और गरीब बस्ती हुआ करता था, आज वह किसी वीवीआईपी छावनी में तब्दील हो चुका था। सड़कों पर लाल-नीली बत्तियां चमचमा रही थीं, पुलिस के भारी वाहन हर नुक्कड़ पर तैनात थे और खाकी वर्दी में मुस्तैद सिपाही हर आने-जाने वाले पर अपनी पैनी निगाह रखे हुए थे।
लेकिन इस पूरी सुरक्षा व्यवस्था के बीच, एक ऐसी शख्सियत मौजूद थी जिसके इरादों की भनक न तो बाबा सर्वानंद को थी और न ही उनके तलवे चाटने वाले जिला प्रशासन को।
जिप्सी से उतरी मौत की परछाई
गांव के मुख्य चौराहे से थोड़ा हटकर, जहां धूल के गुबार के बीच एक पुराना बरगद का पेड़ खड़ा था, वहीं आकर एक नीले रंग की सरकारी जिप्सी रुकी। गाड़ी का इंजन शांत हुआ और एक भारी बूट ने जमीन को छुआ। इसके बाद जो शख्सियत बाहर निकली, उसने आसपास के माहौल का तापमान ही बदल दिया।
वह थीं—IPS ओजस्विनी ओझा।
तेज धूप में चमकती हुई खाकी वर्दी, कंधे पर सजे दो चमकते हुए सितारे और मोम की तरह शांत लेकिन पत्थर जैसी कठोर आंखें। उनके चेहरे पर किसी तरह की कोई हड़बड़ाहट या डर नहीं था, बल्कि एक ऐसा सन्नाटा था जो किसी बड़े तूफान के आने से ठीक पहले प्रकृति में छाया रहता है। ओजस्विनी ने अपनी कैप को थोड़ा और दुरुस्त किया, अपनी कमर पर टंगे सर्विस रिवॉल्वर के होल्स्टर को हल्के से छुआ और गहरी सांस ली।
उनकी नजरें सामने खड़े उस विशालकाय आश्रम पर टिकी थीं, जिसे पिछले डेढ़ दशकों में बाबा सर्वानंद ने अपनी हवस, पाखंड और खून-खराबे की नींव पर खड़ा किया था। इस आश्रम की हर ईंट पर उनकी मां निर्मला ओझा के बेबस आंसुओं और उनके पिता गोपाल ओझा की लाश की गंध आज भी महसूस हो रही थी।
अतीत के वे पन्ने जो दिल पर गोद दिए गए थे
ओजस्विनी ने मन ही मन खुद को उस भयानक रात में धकेल दिया। जब वह मात्र पांच साल की थी, तब उसकी दुनिया एक झटके में उजाड़ दी गई थी। उसे आज भी याद था कि कैसे उस ढोंगी बाबा के गुर्गे उनके घर में घुसे थे। उसके पिता गोपाल ओझा ने जब इस पाखंड के खिलाफ सीना तानकर खड़े होने की कोशिश की थी, तो उन दरिंदों ने उनकी एक न सुनी थी।
पिता की तड़पती हुई सांसें और निर्मला ओझा की वह चीख, जो उनके गले में ही घुट कर रह गई थी—सब कुछ ओजस्विनी के मस्तिष्क के पटल पर किसी अमिट स्याही की तरह छपा हुआ था। उस रात के बाद से ओजस्विनी का बचपन छीन लिया गया था। उनकी मां को बाबा के दरबार में एक दासी और विशेष सेविका बनकर रहने के लिए मजबूर किया गया था। हर रोज, हर पल उस बच्ची ने अपनी मां के शरीर और आत्मा को अंदर से टूटते हुए देखा था।
लेकिन ओजस्विनी टूटी नहीं। उसने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बना लिया। उसने खुद से वादा किया था कि वह रोएगी नहीं, बल्कि एक दिन इतनी ताकतवर बनेगी कि इस कानून और खाकी की आड़ में पल रहे इस राक्षस को उसकी ही बनाई दुनिया में नेस्तनाबूद कर देगी। उसने दिन-रात एक करके पढ़ाई की, आईपीएस की कठिन परीक्षा पास की और आज वह उसी जिले में बतौर तेजतर्रार पुलिस अधिकारी तैनात होकर वापस लौटी थी, जहां से उसकी बर्बादी की कहानी शुरू हुई थी।
आश्रम के भीतर का भव्य और डरावना संसार
ओजस्विनी ने अपने कदमों को आश्रम की मुख्य द्वार की तरफ बढ़ाया। आश्रम के बाहर भारी भीड़ लगी थी। हजारों की संख्या में अंधभक्त हाथ जोड़े कतारों में खड़े थे। कोई बाबा के दर्शन के लिए बेताब था, तो कोई अपनी किसी बीमारी या समस्या के समाधान के लिए अर्जी लेकर आया था।
आश्रम के मुख्य द्वार पर खड़े सुरक्षा गार्ड्स ने ओजस्विनी को रोकने की कोशिश की। उनमें से एक मोटे पेट वाला प्राइवेट गार्ड आगे बढ़ा और रौब दिखाते हुए बोला, मैडम, आगे रास्ता बंद है। आज बाबा सर्वानंद का दरबार सजा है और वीवीआईपी पास के बिना अंदर जाने की अनुमति किसी को नहीं है। गाड़ी साइड में लगाओ!
ओजस्विनी ने अपनी गाड़ी की चाबी उसी गार्ड की तरफ फेंकी, जिसे उसने अनायास ही लपक लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी कैप हटाई नहीं, बल्कि अपनी ठुड्डी थोड़ी ऊपर उठाई और अपनी ठंडी, पैनी नजरों से उस गार्ड की आंखों में झांका। उनकी उस एक नजर में ऐसा खौफ और अधिकार का भाव था कि वह गार्ड सहम गया।
ओजस्विनी ने बेहद शांत और भारी आवाज में कहा, रास्ता मेरे लिए बंद होता है, जो कानून से डरते हैं... और मैं खुद इस जिले का कानून हूँ। जाके अपने बाबा से कहो कि बक्सर की नई एसपी ओजस्विनी ओझा उनके दरबार में हाजिरी लगाने आई हैं।
गार्ड का चेहरा पीला पड़ गया। उसने तुरंत वायरलेस पर अपने आधिकारियों को सूचना दी। कुछ ही पलों में आश्रम के भीतर खलबली मच गई।
सर्वानंद के दरबार में पहली दस्तक
आश्रम के भीतर एक विशाल संगमरमर का हॉल बना हुआ था, जिसे किसी राजा के महल की तरह सजाया गया था। बीचों-बीच सोने के पानी से रंगे एक बड़े से सिंहासन पर बाबा सर्वानंद विराजमान थे। उनके आसपास राज्य के कई बड़े विधायक, पुलिस अधिकारी और चापलूस व्यापारी हाथ जोड़े खड़े थे।
तभी एक चीफ़ सिक्योरिटी ऑफिसर हांफते हुए अंदर आया और बाबा के कान में फुसफुसाया, बाबा... बाहर... बाहर एक महिला आईपीएस अधिकारी आई है। कहती है उसका नाम ओजस्विनी ओझा है और वह सीधे आपसे मिलने आई है
ओजस्विनी ओझा का नाम सुनते ही बाबा सर्वानंद के चेहरे पर फैली हुई मक्कार मुस्कान एक पल के लिए ठिठक गई। उसके माथे पर बल पड़ गए। हालांकि, उसने तुरंत खुद को संभाला और अपने चेहरे पर वह पुराना कृत्रिम आध्यात्मिक सुकून ले आया। उसने सोचा, ऐसी कितनी अधिकारी आए और उसके चरणों में झुककर चले गए। यह नई लड़की भी कुछ ही पलों में उसकी शक्ति के आगे नतमस्तक हो जाएगी।
लेकिन बाबा को यह बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि इस बार जो समंदर उनकी चौखट पर आया है, वह उनकी पूरी लंका को डुबोने के लिए काफी है।
ओजस्विनी ने अपने भारी बूटों की आवाज़ ‘धक्-धक्’ करते हुए उस संगमरमर के हॉल में प्रवेश किया। उनकी हर एक चाल में एक ऐसा आत्मविश्वास और प्रतिशोध की गंध थी, जिसने हॉल में बैठे बड़े-बड़े राजनेताओं की सांसें अटका दीं।
वह सीधे बाबा सर्वानंद के सिंहासन के ठीक सामने आकर रुक गईं। उन्होंने अपनी नजरें उठाईं और सीधे उस ढोंगी की आंखों में देखा। उन आंखों में कोई डर या श्रद्धा नहीं थी, बल्कि सिर्फ एक ही पैगाम था—तेरा अंत नजदीक है, सर्वानंद!
अगले भाग में क्या होगा?
क्या बाबा सर्वानंद ओजस्विनी की असली पहचान और उसके अतीत के राज को भांप पाएगा? या ओजस्विनी अपनी चाल से इस साम्राज्य के भीतर पहला बड़ा छेद करने में कामयाब होगी? जानिए भाग 3 में।