अंधेरी रात, एक बंद कमरा और दरवाजे पर वह दस्तक... जो कोई आम मेहमान नहीं, बल्कि संजय के अतीत का भयानक सच लेकर आई थी! क्या होता है जब इंसान दौलत के लालच में अपने ही भाई जैसे दोस्त को मौत के मुंह में ढकेल देता है? क्या गुनाह का साया कभी पीछा छोड़ता है? जानिए इस रोंगटे खड़े कर देने वाली सस्पेंस-थ्रिलर कहानी में...
रात के दो बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश और बादल की गरज के बीच संजय अपने कमरे में बैठा लैपटॉप पर काम कर रहा था। घर में उसके अलावा कोई नहीं था—पत्नी स्नेहा दो दिन पहले ही अपने मायके गई थी।
सब कुछ शांत था, तभी घर के मुख्य दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई।
थक... थक... थक...
संजय चौंक गया। इतनी रात को कौन हो सकता है? उसने लैपटॉप बंद किया और धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे के छोटे से पीपहोल (hole) से बाहर देखा, लेकिन बाहर घना अंधेरा था।
"कौन है?" संजय ने आवाज दी।
कोई जवाब नहीं आया। बस बारिश की सुनसान आवाज। संजय को लगा कि शायद उसका भ्रम होगा। वह पीछे मुड़ा ही था कि फिर से वही आवाज आई—इस बार थोड़ी तेज।
थक... थक... थक!
संजय का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने हिम्मत करके दरवाजा थोड़ा सा खोला। बाहर कोई नहीं था, लेकिन जमीन पर एक सफेद रंग का लिफाफा पड़ा था। संजय ने लिफाफा उठाया और जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया।
लिफाफे पर लाल स्याही से लिखा था: "आज रात तुम्हारी आखिरी रात है, संजय।"
संजय के हाथ से लिफाफा छूट गया। उसने तुरंत अपना फोन उठाया और स्नेहा को कॉल लगाने लगा, लेकिन नेटवर्क गायब था। तभी उसके फोन पर एक अज्ञात नंबर से मैसेज आया—अचरज की बात यह थी कि मैसेज बिना नेटवर्क के भी आ गया था।
मैसेज में लिखा था: "पीछे देखो।"
संजय का शरीर ठंडा पड़ गया। उसने धीरे से गर्दन घुमाई। हॉल के कोने में, अंधेरे में एक साया खड़ा था। उसके हाथ में एक चमकता हुआ चाकू था।
"कौन हो तुम? क्या चाहिए?" संजय गिड़गिड़ाया।
साया धीरे-धीरे रोशनी में आया। संजय के होश उड़ गए—वह कोई गैर नहीं, बल्कि उसका सबसे अच्छा दोस्त राहुल था, जिसे एक साल पहले एक एक्सीडेंट में मरा हुआ घोषित कर दिया गया था।
"राहुल? तुम... तुम तो..." संजय हकलाने लगा।
"हां संजय, मैं जिंदा हूं," राहुल ने एक ठंडी मुस्कान के साथ कहा। "जिस गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ था, उसके ब्रेक तुमने फेल किए थे न? ताकि मेरी कंपनी तुम्हारे नाम हो सके?"
संजय को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसकी चोरी पकड़ी गई थी।
"राहुल, मुझे माफ कर दो... मैं लालच में आ गया था!" संजय रो पड़ा।
राहुल ने चाकू नीचे किया और हंसने लगा। उसकी हंसी पूरे कमरे में गूंजने लगी। तभी हॉल की सारी लाइट्स एक साथ जल गईं।
पीछे से स्नेहा और दो पुलिस ऑफिसर बाहर निकले। संजय ने हांफते हुए स्नेहा को देखा।
स्नेहा की आंखों में आंसू थे। "मुझे तुम पर शक था संजय। राहुल मरा नहीं था, वह कोमा में था। हमने यह नाटक इसलिए किया ताकि तुम खुद अपना गुनाह कबूल करो।"
संजय के हाथ में हथकड़ी लग चुकी थी। वह जमीन पर बैठ गया। बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन संजय की जिंदगी में हमेशा के लिए अंधेरा हो चुका था।