Dhruv ki Tara - 1 in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | ध्रुव की तारा - भाग 1

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ध्रुव की तारा - भाग 1

ध्रुव की तारा
भाग - १
​लेखिका "अनामिका" 
सूरज की गुनगुनी धूप में सामान से भरी पिकअप वैन नई सोसाइटी के गेट पर आकर रुकी। आज से सात साल की तारा की दुनिया बदलने वाली थी।
​"अरे विजय! वक्त पर पहुँच गया यार," तारा के पापा, आनंद जी ने मुस्कुराते हुए सामने वाले मकान से बाहर आते अपने पुराने कॉलेज फ्रेंड को गले से लगा लिया।
​बचपन की दोस्ती फिर से ताज़ा हो रही थी। एक तरफ बड़े सामान की शिफ्टिंग चल रही थी, तो दूसरी तरफ छोटी सी तारा भी पीछे नहीं रहना चाहती थी। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी किताबों और खिलौनों से भरा एक भारी कार्टन उठा लिया।
​जैसे ही उसने घर की दहलीज़ पर पहला कदम रखा, भारी बक्से के बोझ से उसके नन्हे पैर लड़खड़ा गए। तारा ने डर के मारे आँखें बंद कर लीं और गिरने ही वाली थी कि तभी दो मजबूत हाथों ने उसे और उस बक्से को एक साथ थाम लिया।
​"आराम से चश्मिश! इतनी जल्दी में कहाँ जा रही हो?"
​तारा ने सहमी हुई आँखें खोलीं। सामने बिखरे बालों और चंचल आँखों वाला एक लड़का खड़ा मुस्कुरा रहा था—ध्रुव। नौ साल का ध्रुव, जो किसी सुपरहीरो की तरह ठीक उसी पल वहाँ मौजूद था।
​"अरे-अरे तारा! गिर जाती अभी तो!" दोनों की माताओं और पिताओं का ध्यान अचानक गेट की तरफ गया।
​"अरे वाह ध्रुव, तूने तो सही वक्त पर संभाल लिया," विजय जी ने ध्रुव की पीठ थपथपाई।
​आनंद जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "तारा बेटा, यह ध्रुव है, विजय अंकल का बेटा। अब से तुम्हारा नया दोस्त।" तारा ने झेंपते हुए ध्रुव को देखा, जो उसे चिढ़ाने वाले अंदाज़ में देखकर मुस्कुरा रहा था।
​दोपहर तक सामान अनबॉक्स करने का काम ज़ोरों पर था। विजय जी का पूरा परिवार आनंद जी की मदद में जुटा हुआ था। थकावट इतनी थी कि खाना बनाने का समय ही नहीं मिला, इसलिए बाहर से गरमा-गरम खाना ऑर्डर किया गया।
​ड्राइंग रूम में ज़मीन पर ही चटाई बिछाकर सब लंच के लिए बैठ गए। पुराने दिनों के किस्से छिड़ चुके थे।
​"याद है आनंद, कॉलेज में जब तू हॉस्टल के कमरे में पहली बार आया था, तो बिल्कुल इस तारा की तरह ही सहमा हुआ था," विजय जी ने ठहाका लगाया।
​"और तुम जैसे दादा बने घूमते थे, वह भी याद है मुझे!" आनंद जी ने हंसते हुए जवाब दिया। दोनों परिवारों के बीच हंसी-मजाक और मीठी नोक-झोंक का माहौल जम चुका था।
​उसी बीच ध्रुव ने चुपके से प्लेट में से पनीर का बड़ा टुकड़ा उठाकर अपनी तरफ कर लिया। तारा ने उसे देख लिया और धीरे से मुंह बनाया, तो ध्रुव ने उसे चिढ़ाते हुए जीभ दिखा दी। तारा की आँखों में एक हलकी सी मुस्कान तैर गई। बचपन की एक मासूम दोस्ती का आगाज़ हो चुका था।
​दो दिन बाद, आनंद जी तारा का एडमिशन पास के ही स्कूल में करवाने ले गए। प्रोसेस पूरी होने के बाद जब वे कॉरिडोर से गुजर रहे थे, तभी स्पोर्ट्स पीरियड की घंटी बजी और बच्चे ग्राउंड की तरफ भागे।
​उसी भीड़ में आनंद जी को ध्रुव दिखा।
​"अरे ध्रुव! तुम भी इसी स्कूल में हो?" आनंद जी ने मुस्कुराते हुए पूछा।
​ध्रुव दौड़ते-दौड़ते रुका, "हां अंकल, मैं फोर्थ क्लास में हूं।"
​"फिर तो बहुत बढ़िया! तारा का एडमिशन भी यहीं हो गया है। अगले हफ्ते से तुम दोनों साथ ही स्कूल आया-जाया करना।"
​ध्रुव ने तारा को देखकर एक शैतानी मुस्कान दी, "ठीक है अंकल, अब तो रोज इसे झेलना पड़ेगा!"
​तारा ने मुंह फुला लिया और ध्रुव हंसते हुए ग्राउंड की तरफ भाग गया।
सोमवार की सुबह तारा के घर में काफी गहमागहमी थी।
​"तारा! जल्दी करो बेटा, पहला दिन है," मम्मी हड़बड़ी में उसका लंच बॉक्स बैग में ठूंसते हुए बोलीं।
​तारा बैग संभालती हुई बाहर निकली, जहाँ पापा पहले से ही ऑफिस के लिए तैयार खड़े थे। जैसे ही दोनों दहलीज़ पार करके बाहर आए, सामने ध्रुव अपना बैग टांगे खड़ा था।
​"अरे ध्रुव बेटा! बहुत बढ़िया, तुम यहीं हो," आनंद जी ने कहा। तभी सामने वाले घर से विजय जी भी ऑफिस के लिए बाहर निकले।
​"चलो भाई आनंद, साथ ही चलते हैं," विजय जी ने कहा। फिर ध्रुव की तरफ देखकर बोले, "तारा को संभालकर स्कूल ले जाना।"
​ध्रुव ने हंसकर सिर हिलाया और दोनों के पापा ऑफिस के लिए निकल गए। ध्रुव और तारा भी पैदल ही स्कूल की तरफ बढ़ चले।
​अभी वे थोड़े ही आगे पहुँचे थे कि ध्रुव के दो-तीन दोस्त भागते हुए आए—"अरे ध्रुव! रुक यार!"
​ध्रुव ने तारा की तरफ इशारा करते हुए कहा, "यह तारा है, हमारे सामने वाले घर में ही शिफ्ट हुई है।"
​फिर उसने एक छोटे लड़के और लड़की की तरफ इशारा किया, "तारा, यह रोहन और स्नेहा हैं। ये दोनों भी सेकंड क्लास में हैं, यानी तुम्हारी ही क्लास में।"
​ध्रुव ने रोहन के कंधे पर हाथ रखकर थोड़ा रौब से कहा, "क्लास में इसका ध्यान रखना, समझे? कोई परेशान करे तो मुझे बताना।"
​रोहन और स्नेहा ने मुस्कुराकर हां में सिर हिलाया। तारा के चेहरे पर अब डर की जगह एक हल्की सी तसल्ली थी। सब बातें करते-करते हंसते-खेलते स्कूल के गेट की तरफ बढ़ गए।
ऐसे ही साथ खेलते-कूदते दिन बीत रहे थे और बारिश का मौसम आ गया। एक दोपहर, दोनों छाता संभाले स्कूल से घर लौट रहे थे। तेज़ बारिश की वजह से रास्ता साफ दिखाई नहीं दे रहा था। तभी अचानक सामने से एक साइकिल तेज़ी से आई और तारा को हल्की सी टक्कर लग गई।
​तारा ज़मीन पर गिर पड़ी। घुटने में हल्की सी खरोंच आते ही वह डर के मारे फूट-फूटकर रोने लगी।
​ध्रुव पल भर के लिए घबराया, फिर तुरंत तारा के पास झुका। उसने तारा को संभाला, उसका बैग उठाया और अपना छाता उसके हाथ में थमाते हुए बोला, "अरे चश्मिश, कुछ नहीं हुआ! देखो, मैं हूँ न? रोते नहीं, अच्छे बच्चे बहादुर होते हैं।" वह उसे बहलाते-फुसलाते धीरे-धीरे घर तक ले आया।
​तारा की मम्मी जैसे ही दरवाज़े पर आईं, तारा रोती हुई उनसे लिपट गई।
​ध्रुव ने बहुत मासूमियत से अपनी छाती चौड़ी करके कहा, "आंटी, रास्ता दिख नहीं रहा था तो एक साइकिल से इसकी टक्कर हो गई। पर आप डरना मत, मैंने इसे बिल्कुल रोने नहीं दिया और संभालकर ले आया!"
​तारा की मम्मी का दिल ध्रुव की मासूमियत और समझदारी देखकर भर आया। तभी ध्रुव की मम्मी भी वहाँ पहुँच गईं। जब तारा की मम्मी ने उन्हें पूरी बात बताई, तो ध्रुव की मम्मी मुस्कुराकर बोलीं, "मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरा बेटा इतना बड़ा और समझदार हो गया है!"
​दोनों माताओं ने तारा को चुप कराया और ध्रुव को ढेर सारा प्यार और शाबाशी दी। ध्रुव गर्व से मुस्कुरा रहा था।
​उस दिन जब ध्रुव ने तारा का हाथ थामकर उसे चुप कराया, तो सात साल की तारा के छोटे से दिल में यह बात हमेशा के लिए छप गई कि जब भी वह मुसीबत में होगी, ध्रुव उसे बचा लेगा। वह जाने-अनजाने में हर बात के लिए उस पर निर्भर होने लगी थी। ध्रुव के लिए यह बस एक बचपन की दोस्ती और बड़प्पन था, लेकिन तारा के लिए वह उसका हीरो बन चुका था—एक ऐसी मासूम शुरुआत, जो आने वाले सालों में एक बेपनाह एकतरफा मोहब्बत का रूप लेने वाली थी।
पहला भाग समाप्त, कहानी जारी है....