Paths - 25 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 25

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राहें - 25

बूढ़ी माँ

उमा अपनी माँ पुष्पा से मिलने मायके आयी थी। लम्बा सफर
तय करके उमा व उसका बेटा यहाँ आये थे। बार-बार वह छोटे भाई
किशोर व उसकी पत्नी शशि से माँ से मिलवाने के लिये कह चुकी
थी, परन्तु वे उसे माँ से मिलने नही दे रहे थे- जब जब उमा कहती--
"मॉ कहाँ है' तो शशि कह देती --"सो रही है'।
फिर उमा ने घर के उस भाग में जाकर देखा जहाँ मॉँ रहती थी,
तो देखा मॉ कमरे में बंद है, बाहर से ताला लगा है।
उमा शशि से बोली- "ताला खोलो।"
शशि बोली-- "ताला नही खुलेगा।"
उमा के बार बार कहने पर भी शशि ने ताला नहीं खोला तो उमा
पुलिस स्टेशन चल दी और उसने शिकायत की "मेरी भाभी मुझे माँ
से मिलने नही देती। मुझे माँ से मिलने दिया जाये।"
पुलिस के स्टाफ को साथ लेकर वह घर आई तो काफी हो
हल्ला के बाद ताला खोला गया और उमा अपनी माँ पुष्पा से मिल
पायी।
पिछले एक वर्ष से पुष्पा अपने छोटे बेटे के पास रह रही थी।
कुछ दिनो तक तो किशोर और शशि ने उसे ठीक रखा। धीरे धीरे
घर के पीछे गाय कोठा में बने एक कमरे में उसके रहने की व्यवस्था
कर दी।
गायों को चारा पानी देना व गोबर डालने का काम उसे दे
दिया था। वह वहीं रहती थी। खाने के लिये मोटा चॉवल व दाल मॉ
को दे दी जाती थी, वह वहीं खाना बनाती, खाती और पड़ी रहती,

उसे कहीं आने जाने व किसी से मिलने नही दिया जाता था।
मॉ की यह दशा देखकर उमा को भाईयों पर बहुत गुस्सा आया
दोनों भाई आर्थिक रूप से समृद्ध हैं । खाने पहनने व रहने के लिये
उनके पास सब साधन हैं। पहले पुष्पा बड़े बेटे उमेश के पास रहती
थी। जिन्दगी भर की कमाई उसने बड़े बेटे को दे दी थी। पुष्पा बहुत
ज्यादा पैसों वाली महिला नहीं थी, परन्तु एक समझदार महिला होने
के नाते उसने अपना घर ठीक से सम्हाला था।
पुष्पा स्वयं मजदूरी करती थी व खेतों में काम करती थी। पति
नगर के व्यवसायी के पास उनके कामों की देखभाल मैनेजर की तरह
करते थे। वैसे तो पति की कमाई से घर की रोजी- रोटी का खर्च
निकल जाता था, परन्तु बच्चों को पढ़ाना, लिखाना व अन्य खर्चो के
लिये देखना पड़ता था। पुष्पा खेतों में काम करके कुछ पैसे कमा लेती
थी, जिससे बच्चो को कोई कमी ना हो, वे पढ़ लिख सके। स्वयं पढ़ी
लिखी ना होने के कारण उसको बहुत दुख होता था, जब अपने अन्य
सम्बन्धियों को पढ़ा लिखा व ठाठ से रहते देखती तो उसे भी लगता
कि उसके बच्चे भी अच्छी तरह रहें और पढ़ लिख लें । इसलिये उसने
अपने तीनों बच्चों को पढ़ाया। दोनो बेटे पढ़ लिखकर अपना व्यवसाय
करने लगे। धीरे-धीरे तीनों बच्चों की शादी हो गई, बेटी ससुराल
चली गई और घर में दो बहुएं आ गई। दोनों बेटों ने अपने-अपने घर
बनवा लिये और पुराने घर जिसमें पहले पुष्पा रहती थी, उसी घर को
छोटे बेटे ने गाय का कोठा बना लिया और माँ को वहीं गायों की
देखभाल के लिये रख दिया।
पुष्पा शुरू से ही व्यवहार कुशल महिला थी। यदपि वह मेहनत
मजदूरी करती थी, परन्तु वह अन्य मजदूरों से अलग ही थी।
छोटे-मोटे काम तो वह अपने मन से कर देती थी, मालिक को उस
पर विश्वास रहता था। घर जाने की जल्दी में हाथ में लिया काम
कभी भी अधूरा नहीं छोड़ती थी। छोटी-छोटी बातों में झगड़ना या
चुगली करना उसे पसन्द नहीं था। हर काम वह समझदारी से करती


थी, इसलिये उसकी अलग ही पहचान थी। जिन खेतों में वह काम
करने जाती वे किसान व गृहस्वामिनी उससे अच्छा व्यवहार करते थे।
इसलिये उसके सम्बंध सबसे बन गये थें। उसे किसी काम में अड़चन
नहीं आती थी, पुष्पा के बच्चों को भी सभी सम्मान देते थे।
आयु अधिक होने व बच्चों के बड़े होने पर जब बच्चों का
व्यवसाय अच्छा चलने लगा तो उसने काम पर जाना बंद कर दिया
था। बड़े बेटे के पास रहते हुये वह घर का छोटा-मोटा काम करके
मंदिर में होने वाले सत्संग में जाने लग गई थी, और खुश रहती थी।
बड़ा बेटा उसको पैसा नहीं देता था, तो कभी-कभी पैसे से वह
लाचार हो जाती थी। बड़ी बहु कई बार ताना मारती रहती थी और
उमेश के काम पर चले जाने के बाद वह बातें भी बहुत सुनाती थी तथा
सास के प्रति पति के कान भी भरती थी। इसलिये कभी- कभी घर
में आपसी विवाद हो जाता था। दुनियॉदारी की अनुभवी पुष्पा घर की
बात किसी से नहीं कहती थी। सत्संग में जाने से उसका मन हल्का
हो जाता था , परन्तु किशोर से वह मन की बातें कह लेती थी।
किशोर की दुकान अच्छी चलती है, वह समय-समय पर पुष्पा को
कुछ पैसे दे देता था व मीठी-मीठी बातें करता था इसलिये पुष्पा
किशोर की मीठी- मीठी बातों से खुश रहती थी, खट्टे मीठे वातावरण
में पुष्पा का जीवन कट रहा था।
एक दिन घर में विवाद होने पर उमेश ने पुष्पा को कह दिया-
"मैने ही तुम्हारा ठेका नही लिया है। किशोर को भी कुछ करना
चाहिये, जाओ उसी के पास रहो। अपना सामान उठाओ और उसके
घर जाओ, वहीं रहो।"
किशोर जब माँ से मिलने आया तो पुष्पा ने सब बातें उसे बतायी
इस पर किशोर जोश-जोश में बोला- "चल मॉ उसी घर में रहेंगें ।"
घर के बटवारे के समय पुष्पा का पुराना घर और सामने की जगह
किशोर के हिस्से में आयी थी। किशोर ने सामने की जगह पर अपने
परिवार के लिये अच्छा सा घर बना लिया और पुराने घर को गाय


का कोठा बना लिया था। उसकी पत्नी शशि सरकारी स्कूल में टीचर थी बहुत मजे में उनका जीवन चल रहा था, 
बड़े भाई को नीचा दिखाने के लिये पत्नी शशि से बिना पूछे वह
माँ को घर में ले तो आया, परन्तु घर में तो पत्नी का राज्य रहता है,
यह बात वह भूल गया। पत्नी को आजादी से अकेले रहने की आदत
थी। उसकी ऑखों में सास खटकने लगी। कुछ दिन वो सास को
ठीक से रखी। पन्द्रह दिन के बाद ही सासु् को मोटा चॉवल बनाकर
देने लगी। पुष्पा को सूखा दाल चावल मिलता था जबकि घर में तरह-तरह के खाने पीने के समान आते पर उसे कभी भी कोई कुछ नहीं देते थे. एक 

दिन पुष्पा ने अपनी सहेली संध्या से कहा- 'उमेश
से ज्यादा तो मैं किशोर के घर में परेशान हूँ, शशि मुझे कहीं जाने
नहीं देती, सत्संग में जब जाती हूँ-तो शशि भुनभूनाती रहती है।
कहती है-"सौ सौ चूहा खाकर, बिल्ली हज को चली" कहती
है-सत्संगों में क्या होता है, मैं सब जानती हूँ,--- लगता है, मेरा
सत्संग जाना भी छुट जायेगा। घर में सब पतला चॉँवल खाते है,
शशि मुझे मोटा चॉवल बनाकर कुत्ते की तरह खाना देती है। "'अब
यह सब बात किसी से कह भी नही सकती, यदि किसी से कहुंगी
तो सब कहेंगें बुढ़िया ही ठीक नहीं होगी। पहले बड़े बेटे बहू से नही
बनी, अब छोटे बेटे- बहु से भी नही बन रही है।"
पुष्पा की सहेली संध्या ने उसे समझाया- "मोटा चॉवल खाने
को देती है, यह बात किशोर को भी मत बताना, तुम किशोर को
बोलोगी तो किशोर शशि को बोलेगा, उन दोनों में इस बात को लेकर
विवाद हुआ तो अकेले में शशि तुम्हें बहुत सुनायेगी कहेगी ,बुढ़िया झगड़ा
कराने आयी है। अब जो मिलता है, चुपचाप खाकर रहो और अपना
बुढ़ापा काटो।"
पुष्पा को जो खाने को मिलता उसे चुपचाप खाकर रहती। धीरे
से शशि ने उसका सत्संग में जाना भी बंद करवा दिया। कोई पुष्पा
से मिलने भी जाता तो शशि बाहर से स्वयं मिलकर उसको विदा कर
देती, पुष्पा से कोई मिल नही सकता था। अब पुष्पा को मोटा चॉवल
और दाल दे दी जाती कि वह बनाकर खाये और पड़ी रहे, किशोर
को भी शशि पुष्पा के विरूद्ध भड़काया करती थी किशोर भी पत्नी की


हॉ में हॉ मिलाता था।
उमा को किसी तरह यह समाचार मिला तो वह माँ से मिलने
आई परन्तु शशि उमा को माँ से मिलने नहीं दे रही थी। वृद्धावस्था
व्यक्ति की सारी योग्यताओं पर भारी पड़ जाती है, पुष्पा के साथ भी
यही हुआ। पुलिस की सहायता से उमा पुष्पा से मिली और बेहद
दुखी हुयी, माँ- बेटी मिलकर बहुत देर तक रोती रही, पुष्पा को बच्चों के पालन पोषण में आने वाली परेशानियां याद हो आयी कि कैसे मजदूरी करके उसने बच्चों को पाला था, आज बच्चों के पास सब कुछ है ,पर वो खुद कितनी दुखी हैं, उमा से भी माँ की दशा देखी नहीं जा रही थी. उससे रहा नहीं गया और वह मॉ को अपने साथ
ससुराल ले गई।
उमा अपने दायित्व का निर्वाह करते हुये मॉ को ठीक से रख
रही है, परन्तु पुष्पा का मन वहाँ नही लगता , बार-बार उसे अपना घर,
बस्ती व बच्चे याद आते हैं, वह वापस अपने घर आने के लिये
छटपटाती हैं। सत्संग की अपनी सखी संध्या से फोन पर बात करती
है या अन्य सखियों से कभी कभी बात होती तो उसका दर्द शब्दों में
छलक जाता है। सखियां जब उससे वापस आने को कहती है कि-
"वापस आ जाओ, तुम्हारे बिना सत्संग भी सूना लगता है।" अपने
अच्छे व्यवहार व सहयोगी भावना के कारण पुष्पा सभी की चहेती थी।
तब उदास मन से वह कहती है ---"मुझे भी अपना घर, सत्संग,
अपना नगर याद आते हैं, किन्तु मैं आकर रहूँगी कहाँ? दोनो बहुएं
मुझे रखने को तैयार नहीं हैं । जिस घर को बनाने में और बच्चों को
तैयार करने में मैने अपनी जिन्दगी लगा दी, अब उसी घर व परिवार
से मैं दूर हूँ।"उसके मन का विषाद और पीड़ा झलक जाते हैं. 

छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर 
दल्ली राजहरा
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