रात गहरा चुकी थी। पार्टी धीरे-धीरे खत्म होने वाली थी, लेकिन विराट का मन कहीं और था। वह एक कोने में बैठा था, हाथ में ग्लास लिए, आँखों में संपूर्णा की यादें तैर रही थीं। उसका चेहरा उदास और थका हुआ लग रहा था। उसके दोस्त, राहुल, उसके पास आए। राहुल ने विराट के कंधे पर हाथ रखा।
राहुल बोला -
भाई, क्यों इतना परेशान होता है? आज का दिन है, मस्ती कर। ये ले, ये पी और जाकर सो जा। तू तो ऑफिस का ओनर है, तेरा तो यहाँ पर्सनल रूम भी है। आराम से सो लेगा।
विराट ने ग्लास की तरफ देखा, फिर राहुल की तरफ। उसकी आवाज़ भारी थी।
विराट बोला -
अकेले मेरा नहीं है... CEO का भी है वो रूम...
राहुल हँसा, हालाँकि उसकी हँसी में एक छिपी हुई चाल थी।
राहुल बोला -
बनवाया तो तूने था भाभी जी के लिए। अब जब वो नहीं हैं, तो उस कमरे का क्या करना? चल, पी ले। नींद आएगी, सब भूल जाएगा।
विराट ने गहरी साँस ली। संपूर्णा की याद उसे अंदर से खाए जा रही थी। उसने सोचा कि शायद नशे में डूबकर वह कुछ घंटों के लिए इस दर्द से दूर हो पाएगा।
विराट बोला -
संपूर्णा ही जिंदा नहीं है। मैं अकेला रह गया हूँ...
इतना कहकर उसने वह ग्लास एक ही साँस में पी लिया।
राहुल मुस्कुराया और पीछे हट गया। उसे नहीं पता था कि उस दोस्तों के ग्रुप ने विराट की व्हिस्की में जानबूझकर एक स्ट्रॉंग नशे वाली गोलियां मिलाया था। उनका मकसद बस इतना था कि विराट जल्दी सो जाए ताकि वे लोग बिना किसी रुकावट के पार्टी का आखिरी हिस्सा अपने ढंग से मना सकें। लेकिन गड़बड़ हो गई। डोज़ अनुमान से ज्यादा हो गया था। 'ओवरडोज'। विराट को तुरंत चक्कर आने लगा। उसका सिर घूमने लगा। उसने राहुल को कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन उसके होंठ सुन्न पड़ रहे थे।
विराट (धुंधली आवाज़ में) -
मुझे... अजीब लग रहा है..."
राहुल ने घबराकर इधर-उधर देखा।
राहुल बोला -
अरे भाई, शायद थकान है। चल, तुझे रूम तक छोड़ देते हैं।
विराट लड़खड़ाता हुआ खड़ा हुआ। उसकी नजरें धुंधली हो रही थीं। वह सीधा नहीं चल पा रहा था। राहुल और एक अन्य दोस्त ने उसे सहारा दिया और धीरे-धीरे ऑफिस के उस प्राइवेट रूम की तरफ ले चले, जिसे विराट ने कभी संपूर्णा के लिए बनवाया था। कमरे का दरवाजा खुला था। अंदर अंधेरा था, सिर्फ बाहर से आती स्ट्रीट लाइट्स की हल्की रोशनी फर्श पर पड़ रही थी।
दोस्तों ने विराट को बिस्तर पर लिटा दिया। राहुल ने राहत की साँस ली।
राहुल बोला -
चलो, यह सो गया। अब हम वापस चलें। इसे यहीं छोड़ देते हैं, सुबह तक सोता रहेगा।
वे दोनों कमरे से बाहर निकल गए और दरवाजा बाहर से बंद करने की बजाय, बस धक्का देकर अधखुला छोड़ दिया, यह सोचकर कि विराट गहरी नींद में होगा और कोई अंदर नहीं आएगा। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि संयोगिता अभी भी ऑफिस में थी। विवान के जाने के बाद, संयोगिता कुछ जरूरी फाइल्स चेक कर रही थी। जैसे ही उसने देखा कि पार्टी खत्म हो चुकी है और विराट कहीं दिखाई नहीं दे रहा, तो उसे चिंता हुई। उसे याद आया कि विराट आज बहुत उदास था।
वह कॉरिडोर से गुजर रही थी तभी उसकी नजर उस प्राइवेट रूम के दरवाजे पर पड़ी, जो हल्का सा खुला था। संयोगिता ने धीरे से दरवाजा खोला। अंदर अंधेरा था।
संयोगिता (मन में) -
क्या विराट यहाँ हैं?
उसने अंदर कदम बढ़ाया। उसकी आँखें अंधेरे में ढल रही थीं। तभी उसे बिस्तर पर एक आकृति दिखाई दी। वह पास गई।
कमरे में सन्नाटा था, बस विराट की भारी साँसों की आवाज़ गूंज रही थी। संयोगिता ने जैसे ही अंदर कदम रखा, उसकी नजर बिस्तर पर पड़ी। विराट खड़ा था, लेकिन उसके पैर कांप रहे थे। नशे और बेहोशी की उस अवस्था में उसे बहुत गर्मी लग रही थी। उसका पूरा शरीर पसीने से लथपथ था। उसने अपनी शर्ट के बटन खोल दिए थे और फिर धीरे-धीरे शर्ट को उतारकर एक तरफ फेंक दिया था। उसका चेहरा तप रहा था और आँखें लाल थीं। संयोगिता घबरा गई। उसे लगा कि शायद विराट बीमार है या किसी चोट का असर है।
संयोगिता (चिंतित स्वर में) -
मिस्टर विराट! आप ठीक तो हैं?
विराट ने आवाज़ सुनी। वह धीरे-धीरे मुड़ा। उसकी नजरें धुंधली थीं, फोकस नहीं कर पा रही थीं। लेकिन जैसे ही उसकी नजर संयोगिता पर पड़ी, समय थम गया। अंधेरे कमरे की हल्की रोशनी में, संयोगिता का चेहरा, उसके बाल, उसकी आँखें... सब कुछ संपूर्णा जैसा लग रहा था। नशे ने विराट के दिमाग को इतना धुंधला कर दिया था कि वह वास्तविकता और भ्रम के बीच का फर्क नहीं समझ पा रहा था। विराट की आँखों में अचानक एक चमक आ गई—दर्द और प्रेम की मिली-जुली चमक।
विराट (कांपती आवाज़ में) -
संपूर्णा...?
संयोगिता पीछे हटी।
संयोगिता बोली -
मिस्टर विराट, मैं संयोगिता हूँ। आप घर चलें, मैं आपको...
लेकिन विराट कुछ सुनने की हालत में ही नहीं था। उसके लिए सामने खड़ी महिला कोई और नहीं, बल्कि उसकी खोई हुई पत्नी थी। वह लड़खड़ाता हुआ संयोगिता की तरफ बढ़ा।
संयोगिता डर गई।
संयोगिता बोली -
मिस्टर विराट, पीछे हटिए! आपको नशा हो गया है।
लेकिन विराट ने झपट्टा मारा और संयोगिता को अपनी बांहों में जकड़ लिया। उसकी पकड़ मजबूत थी, हालांकि उसके हाथ कांप रहे थे।
विराट (रोते हुए स्वर में) -
संपूर्णा! कहाँ चली गई थीं तुम? पता है मैं तुम्हें कितना याद करता हूँ? हर रात... हर पल...
संयोगिता ने उसे धक्का देने की कोशिश की।
संयोगिता बोली -
छोड़िए मुझे! मैं संयोगिता हूँ, संपूर्णा नहीं!
लेकिन विराट के कानों तक यह बात नहीं पहुंची। नशे ने उसके तर्क को मार दिया था। उसने संयोगिता के चेहरे को अपने हाथों में लिया। उसकी उंगलियां संयोगिता के गालों को छू रही थीं, जैसे वह किसी पवित्र वस्तु को छू रहा हो।
विराट बोला -
तुम वापस आ गईं... मैं जानता था। तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकती।
इतना कहकर, विराट ने अपना सिर झुकाया और संयोगिता के माथे को चूम लिया। संयोगिता सन्न रह गई। उसके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। यह चुंबन प्रेम का नहीं, बल्कि एक टूटे हुए इंसान की desesperación का था।
विराट अब संयोगिता के होठों की तरफ बढ़ रहा था। संयोगिता का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसके मन में दो विचार टकरा रहे थे—एक तरफ उसकी 'साइको किलर' वाली पहचान जो कह रही थी कि 'भाग जाओ, यह खतरनाक है', और दूसरी तरफ वह इंसानियत जो देख रही थी कि विराट कितना टूटा हुआ है।
लेकिन इससे पहले कि विराट आगे बढ़ पाता, संयोगिता ने हिम्मत जुटाई और अपने दोनों हाथों से विराट के सीने पर जोर से धक्का दिया।
संयोगिता (सख्त आवाज़ में) -
विराट! होश में आइए!
धक्के की वजह से विराट लड़खड़ाया और वापस बिस्तर पर गिर पड़ा। वह वहीं लेट गया, भारी साँसें लेते हुए, लेकिन उसकी आँखें अभी भी संयोगिता पर ही टिकी थीं।
विराट (बड़बड़ाते हुए) -
मत जाओ... प्लीज... मत जाओ...
संयोगिता हांफ रही थी। उसका चेहरा लाल हो गया था। वह दरवाजे की तरफ भागना चाहती थी, लेकिन विराट की उस दर्दनाक पुकार ने उसके पैर जमा दिए।
उसने देखा कि विराट अब बेहोश होने वाला है। अगर वह उसे ऐसे छोड़कर चली गई, तो हो सकता है वह उल्टी खाकर दम घुटने से मर जाए, या फिर नशे की अधिकता से उसकी हालत बिगड़ जाए।
संयोगिता ने गहरी साँस ली। उसने खुद को समझाया—
यह विराट नहीं है... यह नशा है। और यह संयोगिता नहीं है... यह संपूर्णा का भ्रम है।