Adhuri Kitaab - 2 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 65

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 65

अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 65 : असली लेखक
पूरा घर अचानक अंधेरे में डूब गया।
एक पल पहले तक दीवारों पर चमकती सुनहरी रोशनी थी, लेकिन अब चारों तरफ सिर्फ काला सन्नाटा था।
अनन्या ने तुरंत नैना का हाथ पकड़ लिया।
"नैना?"
"मैं यहीं हूँ, दीदी।"
आरव ने अंधेरे में आवाज लगाई—
"सब लोग साथ रहना!"
कबीर की आवाज आई—
"कोई अपनी जगह से मत हिलना।"
लेकिन अर्णव...
वह बिल्कुल शांत खड़ा था।
उसकी नजर उस सफेद पन्ने पर थी जो कुछ देर पहले आसमान से गिरा था।
उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"मैं लौट आई हूँ।"
अर्णव धीरे-धीरे उस पन्ने के पास गया।
उसने उसे उठाया।
जैसे ही उसकी उँगलियाँ पन्ने को छूती हैं...
उसका चेहरा बदल गया।
"नहीं..."
अनन्या ने पूछा—
"क्या हुआ?"
अर्णव ने पन्ना उसकी ओर बढ़ाया।
"इसे देखो।"
अनन्या ने पन्ना लिया।
उसकी आँखें तुरंत फैल गईं।
नीचे छोटे अक्षरों में एक और लाइन दिखाई दे रही थी—
"जिसे तुम अपनी माँ समझती थीं, वह सिर्फ मेरी कहानी की पहली लेखिका थी।"
अनन्या ने घबराकर पूछा—
"इसका मतलब क्या है?"
अर्णव ने कहा—
"हमारी माँ..."
"इस कहानी की शुरुआत करने वाली पहली इंसान थीं।"
"लेकिन उनसे पहले भी कोई था।"
कबीर ने धीरे से कहा—
"एक लेखक..."
अर्णव ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"लेकिन वह इंसान था या कुछ और..."
"यह कोई नहीं जानता।"
नैना ने पूछा—
"फिर वह अब क्यों वापस आया है?"
अचानक अंधेरे में एक आवाज गूँजी—
"क्योंकि मेरी किताब वापस आ गई है।"
चारों एक साथ पीछे मुड़े।
घर की दीवार पर धीरे-धीरे शब्द उभरने लगे।
"मेरी किताब..."
"मेरे पात्र..."
"मेरा अधूरा अंत..."
फिर दीवार पर एक चेहरा दिखाई दिया।
एक बूढ़ा आदमी।
लंबे सफेद बाल।
गहरी आँखें।
और हाथ में...
वही सुनहरी कलम।
अनन्या ने उसे देखते ही कहा—
"यह कौन है?"
अर्णव ने धीमे स्वर में जवाब दिया—
"लेखक।"
दीवार पर दिखाई दे रहा चेहरा मुस्कुराया।
"बहुत साल हो गए..."
"तुम सबको एक साथ देखे हुए।"
अनन्या ने गुस्से में कहा—
"तुमने हमें देखा है?"
वह आदमी हँसा।
"मैंने तुम्हें सिर्फ देखा नहीं।"
"मैंने तुम्हें बनाया है।"
आरव आगे बढ़ा।
"तुम्हें जो कहना है, साफ-साफ कहो।"
आदमी ने उसकी ओर देखा।
"तुम..."
"तुम्हारा पात्र होना अभी तक समझ नहीं पाए?"
आरव ठिठक गया।
"क्या?"
आदमी ने कहा—
"तुम्हारी पहली मुलाकात अनन्या से संयोग नहीं थी।"
अनन्या का दिल धड़क उठा।
"क्या कह रहे हो?"
"तुम दोनों का मिलना..."
"पहले से लिखा हुआ था।"
आरव ने अविश्वास से अनन्या की तरफ देखा।
"तो..."
"हमारी जिंदगी भी कहानी थी?"
आदमी ने कहा—
"तुम्हारी जिंदगी नहीं..."
"तुम्हारी कहानी।"
कबीर ने बीच में कहा—
"अगर सब कुछ लिखा हुआ था..."
"तो हमें यहाँ तक आने की आजादी कैसे मिली?"
वह आदमी कुछ पल चुप रहा।
फिर मुस्कुराया।
"यही तो सबसे दिलचस्प बात है।"
"मैंने तुम्हारे लिए रास्ते लिखे थे।"
"लेकिन तुमने पहली बार..."
"उन रास्तों को बदल दिया।"
अर्णव ने पूछा—
"क्यों?"
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि तुम पैदा हुए ही इसलिए थे..."
"ताकि कहानी अपनी सीमा तोड़ सके।"
अचानक घर की दीवारें गायब हो गईं।
चारों खुद को एक विशाल खाली कमरे में खड़ा पाते हैं।
न जमीन दिखाई दे रही थी, न छत।
चारों तरफ सिर्फ सफेद रोशनी थी।
और बीच में एक विशाल मेज।
मेज पर हजारों पन्ने पड़े थे।
हर पन्ने पर किसी की जिंदगी लिखी थी।
अनन्या ने एक पन्ना उठाया।
उस पर लिखा था—
"अनन्या — पहला अध्याय।"
उसने दूसरा पन्ना उठाया।
"नैना — पहला अध्याय।"
फिर आरव का।
कबीर का।
अर्णव का।
लेकिन सबसे नीचे एक पन्ना अलग पड़ा था।
उस पर कुछ भी नहीं लिखा था।
सिर्फ खाली सफेद कागज़।
नैना ने पूछा—
"यह किसका है?"
दीवार पर मौजूद आदमी ने कहा—
"तुम्हारा।"
नैना चौंकी।
"मेरा?"
"हाँ।"
"तुम्हारी कहानी कभी लिखी ही नहीं गई।"
"तुम..."
"एक खाली पन्ने से पैदा हुई थीं।"
अनन्या ने तुरंत कहा—
"नहीं!"
"नैना मेरी बहन है।"
"वह कोई खाली पन्ना नहीं।"
आदमी ने कहा—
"यही वजह है कि तुम सबसे खतरनाक हो।"
नैना ने उसकी तरफ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि तुम्हारी कोई तय कहानी नहीं है।"
"तुम्हारे फैसले पहले से लिखे नहीं गए।"
"तुम सच में चुन सकती हो।"
"और जो व्यक्ति सच में चुन सकता है..."
"वह किसी भी कहानी को बदल सकता है।"
कबीर ने तुरंत समझ लिया।
"इसीलिए भक्षक नैना को चाहता था।"
आदमी ने कहा—
"भक्षक उसे नहीं चाहता था।"
"वह उसे इस्तेमाल करना चाहता था।"
"क्योंकि अगर नैना उसके साथ मिल जाती..."
"तो वह अपनी कहानी खुद लिख सकता था।"
अर्णव ने कहा—
"लेकिन वह नहीं मानी।"
आदमी मुस्कुराया।
"इसलिए अब मैं खुद उसे लेने आया हूँ।"
अनन्या नैना के सामने खड़ी हो गई।
"पहले मुझे पार करना होगा।"
आदमी हँसा।
"तुम?"
"तुम तो अभी भी अपनी माँ के लिखे शब्दों से बाहर नहीं आई हो।"
अनन्या ने सुनहरी कलम उठा ली।
"अब मैं बाहर आ चुकी हूँ।"
उसने कलम हवा में घुमाई।
अचानक सफेद कमरे में एक दरवाज़ा बन गया।
उस दरवाज़े पर लिखा था—
"स्वतंत्र कहानी।"
आदमी का चेहरा पहली बार गंभीर हुआ।
"तुम यह नहीं कर सकती।"
अनन्या ने कहा—
"मैंने अभी किया।"
भक्षक अचानक कमरे में दिखाई दिया।
लेकिन इस बार वह पहले से कमजोर था।
उसका शरीर आधा धुआँ और आधा इंसानी रूप में था।
वह सीधे उस आदमी की ओर बढ़ा।
"तुम..."
"तुमने मुझे वर्षों तक अधूरा रखा।"
आदमी ने कहा—
"क्योंकि तुम अधूरे ही अच्छे थे।"
भक्षक की आँखों में आग जल उठी।
"तुमने मुझे डर बनाया।"
"तुमने मुझे अकेलापन दिया।"
"और अब..."
"तुम मुझे खत्म करना चाहते हो?"
आदमी ने कहा—
"नहीं।"
"मैं तुम्हें वापस अपनी किताब में बंद करना चाहता हूँ।"
भक्षक पीछे हट गया।
"नहीं!"
उसने चारों तरफ काली ऊर्जा फैला दी।
पूरा कमरा काँपने लगा।
अनन्या चिल्लाई—
"नैना!"
नैना ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसे अपनी बहन की आवाज सुनाई दी—
"तुम कहानी और असली दुनिया के बीच का दरवाज़ा हो।"
माँ की आवाज।
फिर अर्णव की—
"तुम्हारी कहानी किसी और के हाथ में नहीं होनी चाहिए।"
फिर आरव की आवाज—
"तुम अकेली नहीं हो।"
नैना ने आँखें खोल दीं।
उसकी आँखों में सुनहरी रोशनी फैल गई।
उसने दोनों हाथ आगे किए।
काली और सफेद रोशनी आपस में टकराईं।
धाआआम!
भक्षक पीछे जा गिरा।
लेकिन असली लेखक भी पीछे हट गया।
नैना ने पहली बार ऊँची आवाज में कहा—
"मेरी कहानी मैं खुद लिखूँगी!"
पूरा कमरा चमक उठा।
खाली पन्ने हवा में उड़ने लगे।
और उन पर एक-एक करके शब्द लिखने लगे।
नैना।
अनन्या।
अर्णव।
आरव।
कबीर।
फिर एक नया शब्द आया—
"स्वतंत्र।"
असली लेखक का चेहरा गुस्से से भर गया।
"तुम नहीं समझतीं!"
"अगर कहानी स्वतंत्र हो गई..."
"तो लेखक की जरूरत खत्म हो जाएगी!"
अनन्या ने कहा—
"शायद यही होना चाहिए।"
अचानक असली लेखक ने अपनी सुनहरी कलम हवा में उठाई।
"तो फिर..."
"मैं आखिरी शब्द लिखता हूँ।"
उसने हवा में लिखा—
"अंत।"
पूरा संसार काँप उठा।
एक-एक करके सभी पन्ने जलने लगे।
नैना चीख उठी—
"नहीं!"
अर्णव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"डरो मत।"
"वह सिर्फ तभी कहानी खत्म कर सकता है..."
"जब हम उसे खत्म होने दें।"
अनन्या ने पूछा—
"तो क्या करें?"
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
"एक नया पहला शब्द लिखो।"
"पहला शब्द?"
"हाँ।"
"क्योंकि हर अंत के बाद..."
"नई कहानी शुरू हो सकती है।"
अनन्या ने सुनहरी कलम उठाई।
उसने खाली पन्ने पर पहला अक्षर लिखने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही कलम कागज़ को छूती है...
असली लेखक चीख उठा—
"नहीं!"
उसकी आवाज़ पूरे संसार में गूँज गई।
अनन्या ने फिर भी लिखना जारी रखा।
पहला अक्षर लिखा गया—
"अ..."
फिर दूसरा—
"ध..."
फिर तीसरा—
"ू..."
नैना उसकी तरफ देखने लगी।
"दीदी..."
अनन्या ने आखिरी अक्षर लिखा।
"अधूरी।"
सारी रोशनी अचानक बुझ गई।
असली लेखक गायब हो गया।
भक्षक भी गायब हो गया।
और चारों के सामने सिर्फ एक किताब रह गई।
अधूरी किताब।
अनन्या ने उसे उठाया।
कवर पर अब कोई नाम नहीं था।
न लेखक का।
न पात्रों का।
सिर्फ एक खाली जगह थी।
नैना ने पूछा—
"अब?"
अनन्या ने किताब खोली।
पहला पन्ना बिल्कुल खाली था।
आरव ने कहा—
"अब हमारी कहानी कौन लिखेगा?"
अनन्या मुस्कुराई।
उसने सुनहरी कलम नैना को दे दी।
"इस बार..."
"हम सब लिखेंगे।"
नैना ने कलम पकड़ ली।
लेकिन तभी किताब के अंदर से एक बहुत धीमी आवाज़ आई—
"अभी कहानी खत्म नहीं हुई..."
चारों जम गए।
अनन्या ने पन्ना पलटा।
आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"जिसे तुमने लेखक समझा..."
"वह भी किसी और की कहानी का पात्र था।"
और उसके नीचे...
एक नया नाम धीरे-धीरे उभरने लगा—
"कहानीकार।"
अनन्या ने उस नाम को देखा।
उसकी आँखों में डर उतर आया।
क्योंकि अब उन्हें समझ आ चुका था—
जिसे वे अंतिम लेखक समझ रहे थे, उसके ऊपर भी कोई और था।
और वह...
शायद इस पूरी कहानी का असली मालिक था।
क्रमशः...