एपिसोड 47— मंदिर के पीछे छिपा सच
रात के करीब साढ़े दस बज चुके थे।
सिटी हॉस्पिटल से निकलते वक्त अर्जुन के कदम तेज़ थे, लेकिन उसके दिमाग में उससे भी तेज़ी से सवाल दौड़ रहे थे।
इमरान अचानक गायब हो चुका था।
उसने आयत के लॉकेट के बारे में ऐसी बात कही थी, जिसके बारे में खुद आयत को भी कोई जानकारी नहीं थी।
और सबसे बड़ी बात...
उसने उस रहस्य को अर्जुन के दादा से जोड़ दिया था।
अर्जुन कार चला रहा था और आयत उसके बगल वाली सीट पर चुपचाप बैठी थी।
पूरे रास्ते दोनों के बीच ज्यादा बात नहीं हुई।
आखिर आयत ने धीरे से पूछा,
"अर्जुन..."
"हम्म?"
"क्या आपको लगता है कि मेरे पापा और आपके परिवार के बीच सच में कोई रिश्ता था?"
अर्जुन ने कुछ पल सड़क की तरफ देखते हुए कहा,
"मुझे नहीं पता।"
"और अगर था?"
"तो सच सामने आएगा।"
आयत ने उसकी तरफ देखा।
"आपको अपने परिवार पर शक नहीं हो रहा?"
अर्जुन ने हल्की साँस छोड़ी।
"हो रहा है।"
आयत चौंक गई।
"आपने इतनी आसानी से मान लिया?"
"आयत, जिस बात को लेकर इतने लोग झूठ बोल रहे हों, वहाँ किसी एक इंसान पर आँख बंद करके भरोसा करना सही नहीं होता।"
आयत चुप हो गई।
कुछ सेकंड बाद अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"लेकिन एक बात पर मुझे पूरा भरोसा है।"
"क्या?"
"तुम्हारे साथ जो हुआ, उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।"
आयत की आँखें थोड़ी नम हो गईं।
"कभी-कभी लगता है कि मेरी वजह से सबकी जिंदगी मुश्किल हो रही है।"
अर्जुन ने तुरंत कहा,
"ऐसा दोबारा मत कहना।"
"लेकिन..."
"तुम किसी परेशानी की वजह नहीं हो। तुम खुद इस परेशानी में फँसी हुई हो। फर्क समझो।"
आयत ने कुछ नहीं कहा।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
वशिष्ठ हवेली
करीब आधे घंटे बाद कार वशिष्ठ हवेली के विशाल गेट के सामने रुकी।
रात की खामोशी में हवेली और भी रहस्यमयी लग रही थी।
अर्जुन और आयत अंदर पहुँचे।
घर के ज्यादातर लोग सो चुके थे।
अर्जुन सीधे हवेली के पीछे बने पुराने मंदिर की तरफ बढ़ने लगा।
आयत उसके साथ थी।
कुछ दूर चलने के बाद आयत ने पूछा,
"यह मंदिर इतना पुराना है?"
अर्जुन ने कहा,
"बहुत पुराना। मेरे दादा के जमाने से भी पहले का है।"
"और यहाँ कोई आता नहीं?"
"बहुत कम।"
दोनों मंदिर के सामने पहुँचे।
दरवाजा लकड़ी का था और उस पर पुराने समय की नक्काशी बनी हुई थी।
अर्जुन ने दरवाजा खोला।
अंदर घुप अंधेरा था।
उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।
मंदिर की दीवारों पर पुराने चित्र बने थे।
एक तरफ भगवान की मूर्ति थी और दूसरी तरफ पत्थर की दीवार पर कुछ पुराने श्लोक खुदे हुए थे।
आयत धीरे-धीरे अंदर आई।
तभी उसकी नजर दीवार पर बने एक निशान पर पड़ी।
वही निशान...
जो उसके लॉकेट पर बना था।
आयत का चेहरा बदल गया।
"अर्जुन..."
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"क्या हुआ?"
आयत ने दीवार की तरफ इशारा किया।
"ये निशान..."
अर्जुन उसके पास गया।
उसने निशान को गौर से देखा।
वह कुछ पल बिल्कुल शांत रहा।
"ये वही है।"
"आपने इसे पहले देखा है?"
"तुम्हारे लॉकेट पर।"
आयत ने अपना लॉकेट बाहर निकाला।
दोनों ने दोनों निशानों को पास लाकर देखा।
एकदम समान।
अर्जुन की आँखों में हैरानी थी।
"इसका मतलब..."
आयत ने धीमे से कहा,
"मेरे पापा यहाँ आए थे?"
अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह दीवार को ध्यान से देखने लगा।
अचानक उसकी नजर एक छोटे से पत्थर पर पड़ी।
उसने उसे दबाया।
टक!
दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे पीछे की तरफ खिसक गया।
आयत हैरान रह गई।
"ये क्या है?"
अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी अंदर की।
वहाँ एक छोटा-सा गुप्त कमरा था।
कमरे में सिर्फ एक लकड़ी की मेज और उसके ऊपर एक पुराना बॉक्स रखा था।
अर्जुन अंदर गया।
बॉक्स के ऊपर धूल जमी हुई थी।
उसने उसे साफ किया।
बॉक्स पर लिखा था—
"जिस दिन सच सामने आए, इसे अर्जुन को देना।"
अर्जुन का दिल एक पल के लिए रुक-सा गया।
"मेरे दादा..."
आयत ने पूछा,
"खोलिए।"
अर्जुन ने बॉक्स खोला।
अंदर एक पुरानी डायरी, एक तस्वीर और एक छोटी-सी चाबी थी।
अर्जुन ने सबसे पहले तस्वीर उठाई।
तस्वीर देखकर उसकी आँखें फैल गईं।
उसमें उसके दादा के साथ तीन लोग खड़े थे।
एक उसके पिता थे।
दूसरे...
आयत के पिता।
और तीसरे आदमी को देखकर अर्जुन की साँस अटक गई।
"ये..."
आयत ने पूछा,
"कौन हैं?"
अर्जुन ने धीरे से कहा,
"राघव मेहरा।"
आयत पीछे हट गई।
"रोहन के पापा?"
अर्जुन ने सिर हिलाया।
अब तस्वीर देखकर साफ था कि ये तीनों लोग एक-दूसरे को सिर्फ जानते ही नहीं थे...
बल्कि किसी बड़े काम में साथ थे।
दादा की डायरी
अर्जुन ने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर सिर्फ एक तारीख लिखी थी।
15 साल पहले।
उसके नीचे लिखा था—
"अगर यह डायरी अर्जुन के हाथ में पहुँची है, तो इसका मतलब है कि वह वक्त आ गया है जब पुराने राज़ को हमेशा के लिए छिपाया नहीं जा सकता।"
अर्जुन पढ़ता गया।
आयत उसके कंधे के पास खड़ी होकर सुनती रही।
डायरी में लिखा था कि पंद्रह साल पहले तीन परिवारों के बीच एक समझौता हुआ था।
वशिष्ठ परिवार।
खान परिवार।
और मेहरा परिवार।
मगर कुछ ही महीनों बाद उस समझौते में दरार आ गई।
आयत ने पूछा,
"किस बात का समझौता?"
अर्जुन अगले पन्ने पर गया।
लेकिन वहाँ से कई पन्ने फाड़े हुए थे।
सिर्फ एक लाइन बची थी—
"जिस चीज़ को बचाने की कोशिश की थी, वही अब सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है।"
आयत ने बेचैनी से पूछा,
"कौन-सी चीज़?"
अर्जुन ने डायरी बंद कर दी।
"पता नहीं।"
तभी मंदिर के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।
दोनों चुप हो गए।
ठक...
ठक...
ठक...
अर्जुन ने तुरंत आयत को अपने पीछे कर लिया।
आवाज धीरे-धीरे मंदिर के करीब आ रही थी।
अर्जुन ने फुसफुसाकर कहा,
"कोई है।"
दरवाजा थोड़ा खुला।
अर्जुन ने आगे बढ़कर उसे पकड़ा।
लेकिन बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ जमीन पर एक लिफाफा पड़ा था।
अर्जुन ने उसे उठाया।
उस पर लिखा था—
"आयत खान के लिए।"
आयत ने काँपते हाथों से लिफाफा लिया।
उसने खोला।
अंदर एक पुरानी चिट्ठी थी।
जैसे ही उसने पहली लाइन पढ़ी...
उसकी आँखों से आँसू निकल आए।
"मेरी बेटी आयत, अगर कभी तुम्हें यह चिट्ठी मिले तो समझना कि मैंने तुम्हें छोड़कर जाने का फैसला अपनी मर्जी से नहीं किया था।"
आयत का हाथ काँपने लगा।
"पापा..."
अर्जुन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
आयत आगे पढ़ने लगी।
"तुम्हें बचाने के लिए मुझे तुमसे दूर होना पड़ा। लेकिन जिस इंसान से मैं तुम्हें बचाना चाहता था, वह बहुत ताकतवर था।"
चिट्ठी यहीं खत्म हो गई।
नीचे सिर्फ एक नाम लिखा था—
रुद्र।
अर्जुन और आयत दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
उधर रेलवे यार्ड में...
रात के ग्यारह बज चुके थे।
रोहन पुराने रेलवे यार्ड में अकेला खड़ा था।
चारों तरफ अंधेरा था।
दूर एक टूटी हुई स्ट्रीट लाइट बार-बार जल-बुझ रही थी।
"कौन हो तुम?"
रोहन की आवाज गूँजी।
कुछ सेकंड बाद अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।
चेहरा आधा ढका हुआ था।
रोहन ने पूछा,
"तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया?"
आदमी ने कहा,
"क्योंकि तुम्हें सच चाहिए।"
"हाँ।"
"तो पहले ये देखो।"
उसने एक फोटो रोहन की तरफ बढ़ाई।
रोहन ने फोटो ली।
उसमें उसके पिता राघव मेहरा, आयत के पिता और अर्जुन के दादा एक साथ खड़े थे।
रोहन की आँखें फैल गईं।
"ये कब की है?"
"पंद्रह साल पुरानी।"
"और ये तीनों साथ क्या कर रहे थे?"
आदमी मुस्कुराया।
"यही जानने के लिए तो तुम्हें बुलाया है।"
रोहन ने गुस्से से कहा,
"सीधे बोलो।"
आदमी ने कहा,
"तुम्हारे पिता ने आयत के परिवार के साथ विश्वासघात किया था।"
रोहन स्तब्ध रह गया।
"क्यों?"
"क्योंकि उन्हें वो चीज़ चाहिए थी जो आयत के पास थी।"
रोहन ने तुरंत पूछा,
"लॉकेट?"
आदमी चुप हो गया।
रोहन समझ गया।
"तो ये बात सही है।"
आदमी ने कहा,
"लेकिन कहानी में सिर्फ तुम्हारे पिता खलनायक नहीं हैं।"
रोहन ने उसकी तरफ देखा।
"क्या मतलब?"
आदमी ने कहा,
"तुम्हारे अपने परिवार में भी कोई ऐसा है जो आज भी इस राज़ को छिपा रहा है।"
"कौन?"
आदमी ने जवाब नहीं दिया।
बस एक कागज उसके हाथ में थमा दिया।
"ये देखो।"
रोहन ने कागज खोला।
उस पर एक नाम लिखा था—
अर्जुन वशिष्ठ।
रोहन का चेहरा बदल गया।
"अर्जुन?"
"हाँ।"
"लेकिन अर्जुन को तो कुछ पता ही नहीं।"
आदमी मुस्कुराया।
"यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी गलतफहमी है।"
और वह अंधेरे में गायब हो गया।
रोहन अकेला खड़ा रह गया।
उसके हाथ में वह कागज काँप रहा था।
मंदिर में...
अर्जुन और आयत अभी भी उस चिट्ठी को देख रहे थे।
तभी अर्जुन की नजर बॉक्स में रखी छोटी चाबी पर गई।
उसने चाबी उठाई।
दीवार के एक हिस्से में छोटा-सा ताला था।
उसने चाबी लगाई।
क्लिक।
दीवार के अंदर एक और गुप्त दरवाजा खुल गया।
अंदर सिर्फ एक चीज़ रखी थी—
एक पुराना लाल रंग का फोल्डर।
अर्जुन ने उसे बाहर निकाला।
फोल्डर के ऊपर लिखा था—
"A-27 — Confidential."
आयत की साँस रुक गई।
अर्जुन ने फोल्डर खोला।
पहले पन्ने पर एक तस्वीर थी।
आयत की।
लेकिन वह तस्वीर आयत के बचपन की थी।
उसके नीचे लिखा था—
"Subject: Ayat Khan."
अर्जुन ने पन्ना पलटा।
अगली लाइन पढ़कर उसके चेहरे का रंग बदल गया।
"अगर आयत को यह फाइल कभी मिल गई, तो रुद्र की वापसी तय है।"
आयत ने काँपती आवाज में पूछा,
"अर्जुन... ये रुद्र कौन है?"
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
उसके पास अभी कोई जवाब नहीं था।
लेकिन तभी फोल्डर के आखिरी पन्ने से एक पुरानी फोटो नीचे गिर गई।
फोटो में एक बच्ची थी...
और उसके पीछे खड़ा था एक आदमी।
अर्जुन ने तस्वीर उठाई।
उस आदमी का चेहरा देखते ही उसकी आँखें फैल गईं।
क्योंकि वह आदमी...
आज भी जिंदा था।
और अर्जुन उसे अच्छी तरह जानता था।
वह था—
वशिष्ठ परिवार का सबसे भरोसेमंद आदमी।
क्रमशः...