The Silent Tower Surat's Cursed Building in Hindi Horror Stories by mahendr Kachariya books and stories PDF | द साइलेंट टावर सूरत की शापित इमारत

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द साइलेंट टावर सूरत की शापित इमारत

सूरत की चमक-दमक और हीरा नगरी की रफ्तार के बीच एक ऐसा कोना भी है, जहां शाम ढलते ही सन्नाटा चीखने लगता है। शहर के एक पुराने और सुनसान इलाके में स्थित वह विशाल इमारत—जिसे स्थानीय लोग 'द साइलेंट टावर' के नाम से जानते हैं—बरसों से खौफ और अनसुलझे रहस्यों का गढ़ बनी हुई है। पांच मंजिला यह इमारत कभी शहर के सबसे आलीशान और आधुनिक आवासों में गिनी जाती थी, लेकिन आज यह एक खंडहर और अछूता अभिशाप बन चुकी है। इसके पास से गुजरने वाले लोग आज भी अपनी रफ्तार तेज कर लेते हैं, क्योंकि हर किसी की जुबान पर एक ही खौफनाक सवाल रहता है—आखिर इस इमारत में ऐसा क्या हुआ था कि हंसता-खेलता आशियाना एक पल में कब्रगाह बन गया?
इस वीरान इमारत की खौफनाक दास्तान शुरू होती है नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में। तब यह प्रोजेक्ट सूरत के एक प्रतिष्ठित और अमीर बिल्डर, श्रीकांत मेहता ने बनवाया था। श्रीकांत का सपना था कि वह इस बिल्डिंग को शहर का सबसे बेहतरीन और अत्याधुनिक रिहायशी परिसर बनाए। उन्होंने इसका नाम 'द साइलेंट टावर' रखा था, जो तब अंग्रेजी के एक फैंसी टाइटल के रूप में दिया गया था, मगर वक्त ने इस नाम को एक खौफनाक शाप में बदल दिया। निर्माण कार्य पूरे जोर-शोर से चल रहा था, लेकिन मजदूरों के बीच अक्सर अजीबोगरीब घटनाएं होने लगीं। कई बार रातों-रात दीवारें अपनी जगह से टूटी मिलतीं, तो कभी रात के वक्त सूने कमरों से किसी के रोने या आहें भरने की आवाजें आतीं। हालांकि, आधुनिकता के नशे में चूर श्रीकांत ने इन बातों को मजदूरों का वहम या शरारत कहकर खारिज कर दिया। उन्होंने निर्माण पूरा करवाया और कुछ संपन्न परिवारों को फ्लैट बेच दिए।
शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा। लोग अपनी गृहस्थी बसाने लगे, बच्चों की किलकारियों से बालकनी गूंजने लगीं। लेकिन यह सुख ज्यादा दिनों का नहीं था। सबसे पहली अजीब घटना चौथी मंजिल के फ्लैट नंबर 402 में हुई, जहां राहुल शर्मा अपनी पत्नी और सात साल की बेटी के साथ रहते थे। एक अमावस की रात, अचानक पूरे इलाके की बिजली कट गई। राहुल टॉर्च ढूंढने उठे, तो उन्होंने देखा कि उनकी बेटी अपने बिस्तर पर नहीं थी। नींद और अंधेरे में जब उन्होंने घर का कोना-कोना खंगाला, तो उनकी नजर खुली खिड़की पर पड़ी। बेटी खिड़की के बिल्कुल मुहाने पर खड़ी थी, नीचे गहरी खाई जैसी सड़क की ओर देख रही थी और खुद-ब-खुद बुदबुदा रही थी—"कोई मुझे बुला रहा है, मां मुझे ले जाने आई है।" इससे पहले कि राहुल उसे अपनी बाहों में खींच पाते, बच्ची हवा में एक रहस्यमयी झटके के साथ नीचे सड़क पर जा गिरी।
पुलिस ने इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना मानकर केस बंद कर दिया, लेकिन इस हादसे ने इमारत के बाकी बाशिंदों के दिलों में खौफ का बीज बो दिया। इसके ठीक एक महीने बाद, तीसरी मंजिल पर रहने वाले एक बुजुर्ग दंपती ने आत्महत्या कर ली। उनके सुसाइड नोट में जो लिखा था, उसने रोंगटे खड़े कर दिए। उन्होंने लिखा था—"हम मरना नहीं चाहते, लेकिन इस घर की दीवारों में कोई अदृश्य ताकत निवास करती है जो हमें सोने नहीं देती। वो ताकत कहती है कि यह जमीन हमारी है, और तुम यहां अतिक्रमण कर रहे हो। अब हम इस टॉर्चर को और सहन नहीं कर सकते।"
इन दो बड़ी घटनाओं के बाद इमारत के भीतर का माहौल पूरी तरह बदल गया। फ्लैटों में रहने वाले लोग एक-एक करके अपना सामान समेटने लगे। कोई भी रात गुजारने को तैयार नहीं था। अजीबोगरीब साया, दीवारों से रिसता हुआ लाल पानी, बंद कमरों में खुद-ब-खुद बजने वाले पियानो की धुनें और गलियारों में कदमों की आहटें आम हो गईं। एक स्थानीय तांत्रिक को जब इस जगह की पड़ताल के लिए बुलाया गया, तो उसने रात के बारह बजे मुख्य द्वार पर कदम रखते ही चीख कर कहा था कि यह जगह इंसानों के रहने लायक नहीं है। उसने दावा किया कि सदियों पहले इस भूखंड पर एक श्मशान हुआ करता था और कुछ तांत्रिक अनुष्ठान गलत तरीके से किए जाने के कारण यहां की ऊर्जाएं भटक गई हैं।
कुछ ही हफ्तों में 'द साइलेंट टावर' पूरी तरह खाली हो गई। जिन लोगों ने अपने जीवनभर की कमाई लगाकर यहां फ्लैट खरीदे थे, वे इन्हें कौड़ियों के भाव छोड़कर शहर के दूसरे हिस्सों में भाग गए। बिल्डर श्रीकांत मेहता इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए और एक दिन रहस्यमय परिस्थितियों में वे उसी इमारत की छत पर मृत पाए गए। उनके शरीर पर किसी भी तरह के चोट के निशान नहीं थे, लेकिन उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं और चेहरा खौफ से नीला पड़ चुका था—मानो उन्होंने अपनी मौत से ठीक पहले किसी ऐसी भयानक चीज को देख लिया हो जो इंसान की बर्दाश्त से बाहर थी।
वक्त गुजरता गया और सूरत शहर महानगर बनता गया। नई-नई ऊंची इमारतें खड़ी हो गईं, लेकिन 'द साइलेंट टावर' अपनी जगह जस की tस शापित खड़ी रही। नगर निगम ने इस इमारत को गिराने के कई नोटिस जारी किए, लेकिन जब भी कोई बुलडोजर या मजदूर इस पर हथौड़ा चलाने आगे बढ़ता, रहस्यमयी तरीके से मशीनें अचानक खराब हो जातीं या काम करने वाले गंभीर रूप से घायल हो जाते। इस डर के कारण प्रशासन ने भी इस पर बुलडोजर चलाना बंद कर दिया।
आज भी, जब सूरत में रात गहरी हो जाती है, तो इस खंडहर की तरफ कोई नहीं जाता। स्थानीय युवा कई बार हिम्मत करके इसके पास जाते हैं, और उनका दावा है कि उन्हें आज भी चौथी मंजिल की उस टूटी हुई खिड़की पर एक परछाई खड़ी दिखाई देती है जो खामोशी से नीचे आने जाने वालों को घूरती रहती है। हवा जब इस इमारत की खोखली खिड़कियों से गुजरती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई सिसक-सिसक कर अपने उजड़े आशियाने की दास्तान सुना रहा हो। यह कहानी सिर्फ एक इमारत के खंडहर होने की नहीं, बल्कि उस जिद की है जो इंसान ने प्रकृति और अदृश्य शक्तियों से टकराने की कोशिश में दिखाई थी, और आज भी सूरत की अंधेरी गलियों में 'द साइलेंट टावर' की खामोशी इस बात की गवाही दे रही है कि कुछ राज ऐसे होते हैं जिन्हें दफन ही रहने देना चाहिए।