village attachment in Hindi Short Stories by Deepak Kumar Tiwari books and stories PDF | गाँव का लगाव

Featured Books
Categories
Share

गाँव का लगाव

शहर की भागदौड़ से दूर, अमित पूरे पंद्रह साल बाद अपने पुश्तैनी गाँव लौटा था। गांव के पगडंडी पर चलते-चलते उसको बचपन की यादें आने लगी उसका बचपन इसी गांव में बीता था। 

उसके पिता जी के गुज़रने के बाद गाँव से उनका नाता लगभग टूट सा गया था। अमित शहर में एक अच्छी नौकरी कर रहा था, लेकिन गाँव में मौजूद उनका विशाल पुश्तैनी घर सालों से बंद पड़ा था। अब अमित उसी पुराने घर को बेचने के इरादे से गाँव आया था ताकि उस पैसे से शहर में एक नया फ्लैट खरीद सके।



जैसे ही अमित की गाड़ी गाँव की सीमा पर पहुँची, माहौल में एक अजीब सी खामोशी छा गई। रास्ते में मिलने वाले गाँव के पुराने लोग उसे देखकर आपस में फुसफुसाने लगे। अमित सीधा अपने घर के सामने पहुँचा। घर के बाहर लगा नीम का पेड़ अब बहुत बड़ा हो चुका था और उसकी घनी परछाईं पूरे घर को घेरे हुए थी। अमित ने जैसे ही जेब से चाबी निकाली और भारी लोहे का ताला खोला, वैसे ही पास के चौराहे से भागते हुए कुछ लोग उसके पास आ गए।



उन लोगों में सबसे आगे अमित के बचपन का पड़ोसी, राजू था। राजू के चेहरे पर गहरी चिंता के भाव थे। उसने आते ही अमित का हाथ पकड़ लिया और कहा, "अरे अमित भाई! यह तुम क्या कर रहे हो? इस घर का ताला मत खोलो और इसके अंदर तो बिल्कुल मत जाओ। जितना जल्दी हो सके, यहाँ से शहर वापस लौट जाओ।"


अमित ने हैरान होकर राजू और उसके पीछे खड़े ग्रामीणों को देखा। उसने पूछा, "क्यों राजू? क्या बात है? यह तो मेरा अपना घर है, मेरे दादा-परदादा की निशानी है। मैं यहाँ रहने नहीं, बस इसे बेचने के सिलसिले में दो दिन के लिए आया हूँ।"



तभी गाँव के एक बुज़ुर्ग ने आगे बढ़कर कहा, "बेटा अमित, राजू ठीक कह रहा है। तुम्हारे जाने के बाद इस घर में कुछ अजीब और डरावनी हरकतें होने लगी हैं। रात के सन्नाटे में इस घर से रोने की, पायल की और भारी कदमों की आवाज़ें आती हैं। कभी-कभी तो बंद कमरों की खिड़कियों से एक सफेद साया भी दिखाई देता है। पूरे गाँव को पता है कि इस घर में अब भूतों का बसेरा है। जो भी यहाँ रात को रुकने की हिम्मत करता है, वह मुसीबत में पड़ जाता है। अपनी जान खतरे में मत डालो।"



अमित शहर की पढ़ी-लिखी दुनिया से था। वह विज्ञान में विश्वास रखता था और भूत-प्रेत की बातों को महज़ अंधविश्वास मानता था। उसने मुस्कुराते हुए ग्रामीणों से कहा, "आप लोग मेरी इतनी चिंता कर रहे हैं, इसके लिए धन्यवाद। लेकिन मैं इन सब बातों पर यकीन नहीं करता। मैं आज रात यहीं रुकूँगा और देखूँगा कि यहाँ क्या रहस्य है।" गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया, लेकिन अमित अपने फैसले पर अड़ा रहा। हार मानकर सभी लोग अपने-अपने घर लौट गए, और राजू भी उदास चेहरा बनाकर वहाँ से चला गया।


अमित ने घर के अंदर कदम रखा। धूल की एक मोटी परत हर चीज़ पर जमी हुई थी। उसने एक कमरे को साफ किया, वहाँ अपनी खाट बिछाई और हाथ-मुँह धोकर आराम करने लगा। दिन तो शांति से गुज़र गया, लेकिन असली इम्तिहान रात को होना था।
रात के करीब बारह बजे, अचानक मौसम बदल गया। तेज़ हवाएं चलने लगीं और खिड़कियां आपस में टकराने लगीं। अमित की आँख खुली तो उसे बरामदे से भारी कदमों की आहट सुनाई दी—ठक... ठक... ठक। ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी जूतों के साथ आँगन में घूम रहा हो। अमित ने अपनी टॉर्च उठाई और दबे पाँव कमरे से बाहर निकला। जैसे ही उसने आँगन में टॉर्च की रोशनी डाली, आवाज़ बंद हो गई और वहाँ कोई नहीं था।



अमित वापस अपने कमरे में आया ही था कि अचानक रसोई घर से बर्तन गिरने की ज़ोरदार आवाज़ आई। इसके तुरंत बाद एक महिला के रोने की आवाज़ गूँज उठी। अमित ने हिम्मत जुटाई और रसोई की तरफ बढ़ा। खिड़की के कांच पर उसे साफ तौर पर एक सफेद लंबा साया तेज़ी से गुज़रता हुआ दिखाई दिया। पल भर के लिए अमित का दिल भी ज़ोर से धड़कने लगा, लेकिन उसने अपने डर पर काबू पाया। उसने ध्यान दिया कि जहाँ से साया गुज़रा था, वहाँ की खिड़की बाहर से आसानी से खुल सकती थी।



अगली सुबह, अमित ने घर का बारीकी से निरीक्षण करने का फैसला किया। वह आँगन और रसोई के आस-पास की ज़मीन को देखने लगा। रात को थोड़ी बारिश हुई थी, जिससे मिट्टी गीली थी। अमित को वहाँ जूतों के गहरे निशान दिखाई दिए। उसने मन में सोचा कि अगर कोई भूत होता, तो उसके जूतों के निशान मिट्टी पर इस तरह नहीं बनते। यह निश्चित रूप से किसी इंसान का काम था जो उसे डराने की कोशिश कर रहा था। अमित ने तुरंत एक योजना बनाई।



दूसरी रात, अमित ने सोने का नाटक किया। उसने कमरे की बत्ती बुझा दी लेकिन खुद पूरी तरह सतर्क होकर कोने में छिप गया। रात के ठीक बारह बजे फिर वही डरावना सिलसिला शुरू हुआ। रसोई से रोने की आवाज़ें आने लगीं और बरामदे में कदमों की आहट हुई। अमित बिल्ली की तरह दबे पाँव रसोई की तरफ बढ़ा।



वहाँ अंधेरे में एक आकृति खड़ी थी जिसने सफेद कपड़ा ओढ़ा हुआ था। उसके एक हाथ में छोटा टेप रिकॉर्डर था जिससे रोने की आवाज़ें आ रही थीं और दूसरे हाथ से वह बर्तनों को हिला रहा था। अमित ने बिना कोई मौका गंवाए पीछे से उस आकृति पर हमला कर दिया और उसे मज़बूती से दबोच लिया। उस नकली भूत ने खुद को छुड़ाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अमित की पकड़ मज़बूत थी। अमित ने झटके से उसका सफेद कपड़ा खींच दिया और चेहरे पर टॉर्च की तेज़ रोशनी डाली।


सामने राजू खड़ा था। पकड़े जाने पर राजू का चेहरा पीला पड़ गया और वह डर से थर-थर कांपने लगा।
अमित ने गुस्से में कड़क आवाज़ में पूछा, "राजू! यह सब क्या नाटक है? तुम भूत बनकर मुझे और पूरे गाँव को क्यों डरा रहे हो?"



राजू ने हाथ जोड़ लिए और रोते हुए अपनी पूरी चालबाज़ी कुबूल कर ली। उसने बताया, "अमित भाई, मुझे माफ़ कर दो। तुम्हारी यह पुश्तैनी ज़मीन और यह बड़ा घर बहुत कीमती है। इसके पीछे से नया हाईवे निकलने वाला है, जिससे इस ज़मीन की कीमत करोड़ों में होने वाली है। मैं इस घर को ओने-पौने दाम में हड़पना चाहता था। मुझे पता था कि अगर मैं पूरे गाँव में भूत की अफवाह फैला दूँगा, तो कोई इस घर को नहीं खरीदेगा। फिर तुम डरकर इसे मुझे बहुत सस्ते में बेच दोगे। यह आवाज़ें और सफेद साया सब मेरी ही साज़िश थी।"


सुबह होते ही अमित ने राजू को रस्सी से बांधा और पूरे गाँव को उसके घर के सामने इकट्ठा कर लिया। अमित ने सभी ग्रामीणों के सामने राजू का टेप रिकॉर्डर, सफेद कपड़ा और उसकी पूरी सच्चाई रख दी। गाँव वाले राजू की इस नीच करतूत को सुनकर सन्न रह गए। जो लोग कल तक राजू को अपना हमदर्द समझ रहे थे, वे आज उस पर थू-थू कर रहे थे।


अमित ने बिना कोई ढील दिए तुरंत पुलिस को फोन कर दिया। कुछ ही देर में पुलिस गाँव पहुँची। अमित ने राजू के खिलाफ धोखाधड़ी, ज़मीन हड़पने की साज़िश रचने और गाँव में दहशत फैलाने की लिखित शिकायत दर्ज कराई। पुलिस राजू को हथकड़ी लगाकर जीप में बैठाकर ले गई।


इस घटना ने अमित की आँखें खोल दीं। उसे समझ आ गया कि जो घर उसके पूर्वजों का था, वह सिर्फ एक संपत्ति नहीं बल्कि उनकी प्रतिष्ठा और यादों का गवाह था। अमित ने घर बेचने का विचार हमेशा के लिए त्याग दिया। उसने शहर के डीलर को फोन करके कह दिया कि यह घर बिकाऊ नहीं है। अमित ने गाँव के कुछ मज़दूरों को काम पर लगाया और अपने पुश्तैनी घर की मरम्मत शुरू करवा दी। उसने फैसला किया कि वह अब हर साल त्योहारों और छुट्टियों में अपने परिवार के साथ यहाँ आएगा, ताकि इस घर की रौनक हमेशा बनी रहे।