Tumshe milkar Lga... - 1 in Hindi Love Stories by PRINCE books and stories PDF | तुमसे मिलकर लगा... - भाग 1

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तुमसे मिलकर लगा... - भाग 1

भाग 1 — पहली मुलाकात

शहर छोटा था, लेकिन वहाँ रहने वाले लोगों की कहानियाँ बहुत बड़ी थीं।

सुबह की हल्की धूप, सड़क किनारे लगी चाय की दुकानें और गलियों में घूमते लोग—सब कुछ रोज़ जैसा ही था।

लेकिन उस दिन आरव की ज़िंदगी में कुछ ऐसा होने वाला था, जिसका उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था।

आरव 21 साल का था। शांत स्वभाव का और अपने काम से काम रखने वाला लड़का। उसके कुछ बड़े सपने थे, लेकिन उन सपनों के बारे में वह किसी से ज्यादा बात नहीं करता था।

उस सुबह वह जल्दी में घर से निकला।

"आरव! नाश्ता तो करता जा!" माँ ने पीछे से आवाज़ लगाई।

"माँ, देर हो रही है। वापस आकर खा लूँगा!"

यह कहकर आरव अपनी बाइक लेकर निकल गया।

शहर की मुख्य सड़क पर आज काफी भीड़ थी। आरव ने बाइक थोड़ी धीमी की और तभी...

धड़ाम!

सामने से आती एक लड़की का हाथ आरव की बाइक के हैंडल से टकरा गया।

लड़की के हाथ में मौजूद किताबें सड़क पर गिर गईं।

आरव ने तुरंत बाइक रोकी।

"अरे! सॉरी... आपको लगी तो नहीं?"

लड़की ने बिना जवाब दिए पहले अपनी किताबें उठानी शुरू कर दीं।

आरव भी नीचे बैठ गया और किताबें उठाकर उसकी तरफ बढ़ाने लगा।

"ये लीजिए।"

लड़की ने किताब लेते हुए पहली बार उसकी तरफ देखा।

कुछ सेकंड के लिए दोनों की नज़रें मिलीं।

फिर लड़की ने नजरें हटा लीं।

"ध्यान से चलाया करो।"

उसकी आवाज़ में नाराज़गी कम और जल्दबाज़ी ज्यादा थी।

आरव हल्का-सा मुस्कुराया।

"गलती मेरी थी।"

लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया और वहाँ से चली गई।

आरव कुछ पल वहीं खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा।

फिर खुद से बोला—

"अजीब लड़की है..."

और बाइक लेकर आगे बढ़ गया।

उसे क्या पता था कि यह मुलाकात आखिरी नहीं, बल्कि शुरुआत थी।

---

अगले दिन आरव अपने दोस्त कबीर के साथ उसी सड़क पर चाय पी रहा था।

कबीर ने पूछा, "कल कहाँ गायब था?"

"कहीं नहीं।"

"झूठ मत बोल। तेरे चेहरे पर कुछ तो चल रहा है।"

आरव हँस पड़ा।

"कुछ नहीं हुआ।"

तभी उसकी नजर सड़क के दूसरी तरफ गई।

वही लड़की वहाँ खड़ी थी।

हाथ में वही किताबें थीं।

आरव अचानक चुप हो गया।

कबीर ने उसकी नजरों का पीछा किया।

"ओहो... अब समझ आया!"

आरव ने उसे घूरकर देखा।

"चुप कर।"

कबीर हँसते हुए बोला, "भाई, अभी तो कुछ हुआ भी नहीं और तू शर्माने लगा।"

आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

उधर लड़की सड़क पार करके एक छोटी-सी किताबों की दुकान में चली गई।

आरव की नजर अनजाने में उसी दुकान पर टिक गई।

कुछ देर बाद कबीर चला गया, लेकिन आरव वहीं बैठा रहा।

पता नहीं क्यों...

आज उसे उस अनजान लड़की का नाम जानने की इच्छा हो रही थी।

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शाम को आरव उसी किताबों की दुकान के सामने से गुजर रहा था।

तभी दुकान के बाहर एक किताब नीचे गिर गई।

आरव ने किताब उठाई।

उसी वक्त पीछे से आवाज़ आई—

"वो मेरी है।"

आरव पलटा।

वही लड़की सामने खड़ी थी।

इस बार उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

आरव ने किताब उसकी तरफ बढ़ाई।

"आपकी किताब।"

"थैंक यू।"

आरव कुछ कहने ही वाला था कि लड़की ने पूछा—

"आप कल भी यहीं थे ना?"

आरव थोड़ा हैरान हुआ।

"हाँ... शायद।"

लड़की मुस्कुराई।

"शायद?"

आरव भी मुस्कुरा दिया।

"हाँ, क्योंकि मुझे ठीक से याद नहीं था।"

लड़की ने भौंहें उठाईं।

"अच्छा?"

"हाँ।"

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर लड़की ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

"वैसे, मेरा नाम मीरा है।"

आरव ने पहली बार उसका नाम सुना।

मीरा।

उसे पता नहीं क्यों, लेकिन यह नाम उसे अच्छा लगा।

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

"आरव।"

मीरा ने मुस्कुराकर कहा-

"तो आरव जी... कल बाइक थोड़ा धीरे चलाइएगा।"

आरव हँस पड़ा।

"कोशिश करूँगा।"

मीरा वहाँ से चली गई।

आरव कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा।

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

उसे नहीं पता था कि एक छोटी-सी मुलाकात...

आने वाले दिनों में उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाली है।

जारी रहेगा...

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