रात के बारह बज चुके थे, पर मयूर के कमरे की खिड़की से आती ठंडी हवा और मोबाइल स्क्रीन की नीली रोशनी अब भी जाग रही थी। मयूर मातृभारती ऐप पर नियमित रूप से लिखता था। वह रोज़मर्रा की भागदौड़ और दफ़्तरी काग़ज़ातों की सूखी दुनिया से थककर जब भी खाली होता, अपने जज़्बातों को कहानियों में ढाल देता। मातृभारती पर उसकी रचनाएँ पढ़ी तो जाती थीं, लेकिन वह किसी लाइक्स या तालियों का भूखा नहीं था। उसके लिए लिखना खुद से मिलने का एक ज़रिया था।
उसी ऐप पर लेखकों की लंबी सूची में एक प्रोफ़ाइल थी—अनामिका।
अनामिका की कलम में एक अजीब सा ठहराव, कशिश और गहरा एहसास था। उसकी कहानियों और ग़ज़लों के हर शब्द में एक अलग ही रवानगी थी जो सीधे रूह को छू जाती। मयूर अक्सर मातृभारती पर उसकी रचनाओं के कमेंट बॉक्स में सिर्फ़ तारीफ़ नहीं लिखता, बल्कि उस पंक्ति को रेखांकित करता जो सबसे गहरी और अनकही होती। अनामिका को भी मयूर की यह समझ बहुत पसंद आई। धीरे-धीरे ऐप के सार्वजनिक कमेंट्स का वह सिलसिला मातृभारती के इनबॉक्स मैसेज में बदल गया।
अनामिका खुले विचारों वाली, हँसमुख और बेबाक लड़की थी। वह मयूर को अपनी नई रचनाओं के शुरुआती मसौदे भेजती और पूछती, "मयूर, यहाँ कहानी का अंत कैसे करूँ?" मयूर घंटों सोचता और ऐसे अलफ़ाज़ चुनता जो अनामिका की अधूरी दास्तान को मुकम्मल कर दें। दोनों ने कभी एक-दूसरे की आवाज़ नहीं सुनी थी, न ही कोई तस्वीर साझा की थी। बस मातृभारती का वह डिजिटल पन्ना और शब्दों का यह अटूट पुल ही उनकी पहचान था।
मयूर को कब उससे एकतरफ़ा मोहब्बत हो गई, इसका अंदाज़ा उसे खुद नहीं रहा। जब भी अनामिका किसी दिन ऐप पर नई किस्त पब्लिश न करती या कोई संदेश न भेजती, मयूर की उँगलियाँ स्क्रीन पर बेचैन हो उठतीं। उसके ख्यालों में अनामिका की एक ख़ूबसूरत, शांत सी मूरत बन चुकी थी। मयूर के लिए अनामिका अब सिर्फ़ एक सह-लेखिका नहीं थी, बल्कि उसकी हर कविता की आत्मा बन चुकी थी। वह अच्छी तरह जानता था कि यह इंटरनेट की दुनिया है, जहाँ लोग एक पल में जुड़ते हैं और अगले ही पल ओझल हो जाते हैं, मगर उसका दिल इस सच्चाई को कुबूल करने से इंकार कर चुका था।
एक शाम मातृभारती ऐप का नोटिफिकेशन चमका। अनामिका का सीधा मैसेज था:
"मयूर, मैंने अपनी पहली पूरी ई-बुक मातृभारती पर पब्लिश कर दी है। और सुनो, मैंने अपनी ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा फ़ैसला भी ले लिया है।"
मयूर की धड़कनें एकाएक तेज़ हो गईं। उसने काँपते हाथों से टाइप किया, "क्या फ़ैसला, अनामिका?"
"मैं अगले महीने शादी के बंधन में बँधने जा रही हूँ। वह मेरे परिवार के पुराने दोस्त हैं, बहुत नेक इंसान हैं। बस अब लिखना शायद थोड़ा कम हो जाए, पर मुझे लगा कि यह बात सबसे पहले तुम्हें बताऊँ, क्योंकि मेरी इस किताब के पीछे तुम्हारी भी उतनी ही मेहनत है।"
स्क्रीन पर चमकते वे कुछ शब्द मयूर के सीने पर किसी वज्र की तरह आ गिरे। कमरे का सन्नाटा अचानक दमघोंटू लगने लगा। दिल में एक ऐसी खामोश चुभन उठी जिसे दुनिया की कोई भाषा बयाँ नहीं कर सकती थी। वह चाहता तो चिल्लाकर कह सकता था कि वह उससे बेइंतहा प्यार करता है, कि मातृभारती का यह ऐप उसके लिए सिर्फ़ एक मंच नहीं बल्कि अनामिका का दीदार करने की खिड़की था। मगर वह जानता था कि ऐसा करके वह उस रिश्ते के विश्वास और अनामिका की आने वाली खुशियों पर दाग लगा देगा।
मयूर ने गहरी साँस ली, अपनी भीगी आँखों को हथेलियों से पोंछा और कीपैड पर उँगलियाँ चला दीं:
"यह तो बेहद खूबसूरत खबर है, अनामिका। तुम्हारी नई किताब और ज़िंदगी के इस नए सफ़र के लिए मेरी दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद। दुआ है कि तुम्हारी दुनिया हमेशा खुशियों से भरी रहे।"
अनामिका ने तुरंत जवाब दिया, "थैंक यू सो मच मयूर! तुम सच में मेरे सबसे अज़ीज़ और सच्चे दोस्त हो।"
'दोस्त'—इस एक लफ़्ज़ ने मयूर के एकतरफ़ा इश्क़ के चारों तरफ़ मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींच दी।
उस दिन के बाद मातृभारती पर अनामिका की मौजूदगी धीरे-धीरे कम होती चली गई। नई किस्तों का इंतज़ार खत्म हो गया और कुछ हफ़्तों बाद उसका अकाउंट निष्क्रिय हो गया। लेकिन मयूर वहीं रहा। उसने लिखना नहीं छोड़ा। फ़र्क बस इतना था कि अब उसकी हर कहानी में दर्द असली था और हर पंक्ति में एक अधूरी आरज़ू छुपी थी।
मयूर ने उस मोहब्बत को कभी बोझ नहीं बनने दिया। उसने अपने एकतरफ़ा इश्क़ को शब्दों का अमर लिबास पहना दिया। मातृभारती के विशाल पन्नों पर मयूर की हर नई रचना आज भी अनामिका के नाम एक बिना पते का ख़त बनकर महकती है।