pitr dosh in Hindi Short Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | पितृ दोष

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पितृ दोष



बाबू राम किसी गाँव में एक प्राइमरी स्कूल के अध्यापक थे। उनका एक बेटा था मोहन। मोहन अपनी बीवी के साथ शहर में किराए पर रहता था। बाबूराम का गाँव में बड़ा सा घर था। उसने अपने बेटे-बहू के लिए दो मंजिल और बनवा दी।

लेकिन मोहन की बीवी शालू बहुत चालाक थी। वह अनपढ़ थी, कभी स्कूल नहीं गई लेकिन पैसों के मामले में बहुत हिसाबी थी। शालू मोहन के कान भरती रहती। "अजी हमारे दो बेटे हैं, जब शहर में पढ़ रहे हैं तो गांव में जाकर तो नहीं रहेंगे। तुम्हारे पिताजी इस साल रिटायर हो रहे हैं। गांव का घर बेचकर, यहीं शहर में बना लेते हैं।"

मोहन ने कहा - "विचार तो अच्छा है, लेकिन पिताजी कहाँ रहेंगे।"
"अरे यहीं रहेंगे हमारे पास और कहाँ जाएंगे" शालू ने कहा।

मोहन ने कल बात करेंगे का बहाना बनाया और घर से बाहर घूमने के लिए निकल गया।

अगले दिन मोहन गांव गया और शहर में घर बनाने का प्रस्ताव रखा। पहले तो बाबूराम नहीं माने लेकिन फिर अपनी पत्नी के कहने में आकर हां कर दी। यही सोचकर कि एक ही तो बेटा है। मरने के बाद भी तो उसी का है, उसका घर बन जाएगा तो उसे खुशी होगी।

मोहन अपने दोस्त के साथ मिलकर गांव वाले घर का सौदा कर देता है। और शहर में जमीन खरीदकर नए घर का निर्माण कार्य शुरू हो गया।

बाबूराम को अपना पैतृक घर छोड़ते हुए बहुत दुःख हो रहा था लेकिन बेटे की जिद के कारण ना नहीं कह सका।

एक साल बाद मोहन, बाबूराम जी के साथ नए घर में शिफ्ट हो गया। मोहन की बीवी शालू में अहंकार आ गया। ये घर तो उसके नाम है, वो है इस घर की मालकिन। शालू अब अपने सास-ससुर को तंग करने लगी। ससुर के घर में खाली बैठने पर ताना देने लगी। "घर में खाली बैठे रहते हो सब्जी ले आया करो। घर का राशन ही ले आया करो। क्या करोगे पेंशन का। या तो मुझे दे दिया करो सारे पैसे मैं खुद ले आऊंगी।"

शालू के ससुर स्वाभिमानी थे। आज तक उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया अपनी जरूरत के लिए। बाबूराम नहीं चाहते थे छोटी-छोटी जरूरतों के लिए बहू से पैसे मांगना। रिटायर ही तो हुए थे, खर्चे तो खत्म नहीं हुए। बीवी की दवाई का खर्च, कपड़ो का खर्च बहुत से खर्चे होते हैं। सारी पेंशन शालू को देकर उसके आगे हाथ फैलाना पड़ेगा रोज छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी। बहुत सोच-विचार कर बाबूराम ने पेंशन देने के लिए मना कर दी। शालू को यह पसंद नहीं आया।

शालू ने बाबूराम को धमकी दी - "या तो सारी पेंशन मुझे लाकर दो वरना मेरे घर से चले जाओ। ये मेरा घर है। इस घर में तो मैं तुम्हें मरने भी नहीं दूंगी।"

उस रात बेचारे बाबूराम सही से सो भी ना पाए। उनके पैसों से बना घर, और उन्हें ही बेघर किया जा रहा था।

अधिक सोचने और चिंता के कारण अगली सुबह ही उन्हें ब्रेन अटैक आ गया। उनका बायां शरीर जाम हो गया। बाबूराम कमरे में ऐसे ही पड़े रहे। किसी ने खबर नहीं ली। सुबह दस बजे शालू जब खाना देने गई तो उसके हाथ से थाली छूट गई। उसने तुरंत मोहन को आवाज लगाई। मोहन तुरंत बाबूराम को अस्पताल ले गया। बाबूराम को आईसीयू में भर्ती किया गया। जब शालू उनसे मिलने पहुंची तो उन्होंने बस इतना कहा - "ले बहू तेरा घर छोड़ दिया। मरूंगा भी यहीं।" इतना कहकर उनका बोलना भी बंद हो गया।

बाबूराम का विधि विधान से अंतिम संस्कार कर दिया गया। लेकिन बाबूराम की अंतिम बातें शालू को डराने लगी। उसे लगता, बाबूराम की आत्मा उससे बदला जरूर लेगी। शालू ने घर में पितृदोष खत्म करने के लिए हवन करवाया, गली के बाहर नल लगवाया और चांदी की छोटी सी चारपाई भी दान कर दी। शालू को लगता यह सब कर वो पितृदोष से मुक्त हो जाएगी। लेकिन अपने बुजुर्गों का किया अपमान शालू को भुगतना पड़ा।

शालू के पति मोहन की एक बीमारी के चलते मृत्यु हो गई। उसके दोनों बेटों की शादी भी नहीं हो पा रही थी। हर बार-बार किसी न किसी कारण से टूट जाती। शालू भी अब बीमार रहने लगी। शालू को उसके किये कर्म रातभर न सोने देते।

शालू के दोनों बेटे उसे छोड़कर शहर चले गए नौकरी करने। अब शालू उस घर में अकेली रह गई। वो सारा दिन पश्चाताप में ही काटती। शालू के सामने अब उसके बेटों की कोई याद नहीं, शालू का किया कर्म ही उसे कुरेदता। उससे अपना जीवन नरक लगता। किस्मत के खेल से वो अपना सर्वस्व गवां बैठी थी। तो भी उसका कर्मफल खत्म न हुआ। शालू ने अपने कर्म का पश्चाताप करते हुए वो घर अपने बेटों के नाम कर दिया और अंतिम समय यापन करने के लिए काशी चली गई।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 
vandna.reporter@gmail.com