विहान कुछ देर तक फोन की स्क्रीन को देखता रहा।
स्क्रीन पर वही संदेश था—
“कुछ कहानियाँ शुरू होने से पहले ही एक-दूसरे से जुड़ चुकी होती हैं।”
वह कुर्सी पर पीछे टिक गया।
कमरे में हल्की-सी खामोशी थी। खिड़की के बाहर सड़क पर गाड़ियों की आवाज़ आ रही थी, लेकिन उसका ध्यान कहीं और था।
उसने संदेश को दोबारा पढ़ा।
फिर धीरे से फोन टेबल पर रख दिया।
“अजीब है…”
विहान ने खुद से कहा।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि किसी अनजान व्यक्ति को उसकी लिखी हुई बातों के बारे में कैसे पता हो सकता है।
तभी कमरे का दरवाज़ा खुला।
“भाई?”
कबीर अंदर आया और हाथ में चाय का कप रखते हुए बोला—
“इतनी सुबह-सुबह ऐसे फोन को क्यों घूर रहे हो? कोई बहुत जरूरी काम है या फोन में ही दुनिया बस गई है?”
विहान ने उसकी तरफ देखा।
“कुछ नहीं।”
कबीर ने उसकी शक्ल गौर से देखी।
“तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ वाला चेहरा देखकर तो लगता है कि बहुत कुछ है।”
विहान हल्का-सा मुस्कुराया।
“तुम्हें हर बात जाननी जरूरी है क्या?”
“बिल्कुल।”
कबीर ने बिना पूछे पास वाली कुर्सी खींच ली।
“दोस्ती इसी दिन के लिए होती है।”
विहान ने कुछ पल सोचा, फिर फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।
कबीर ने संदेश पढ़ा।
उसके चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
“ये किसने भेजा?”
“पता नहीं।”
“तुमने किसी को अपनी writing के बारे में बताया था?”
“नहीं।”
कबीर कुछ देर चुप रहा।
“Reply किया?”
“नहीं।”
“तो करो।”
विहान ने उसकी तरफ देखा।
“क्या लिखूँ?”
कबीर ने कंधे उचकाए।
“सच। पूछो कि तुम कौन हो।”
विहान ने फोन वापस हाथ में लिया।
कुछ सेकंड तक स्क्रीन पर उंगलियाँ रुकी रहीं।
फिर उसने लिखा—
“तुम कौन हो?”
Send.
संदेश चला गया।
लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं आया।
उधर कॉलेज की कैंटीन में आशी और मीरा एक कोने वाली मेज पर बैठी थीं।
मीरा के हाथ में चाय थी और आशी चुपचाप अपनी किताब के पन्ने पलट रही थी।
“तुम आज बहुत शांत हो।”
मीरा ने कहा।
आशी ने किताब से नजर हटाए बिना जवाब दिया—
“मैं रोज़ शांत रहती हूँ।”
“नहीं।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“आज वाली चुप्पी अलग है।”
आशी ने उसकी तरफ देखा।
“तुम हर चीज़ notice क्यों करती हो?”
“क्योंकि तुम मेरी दोस्त हो।”
मीरा मुस्कुराई।
फिर उसने धीरे से पूछा—
“कल रात वाले message का क्या हुआ?”
आशी की उंगलियाँ अचानक रुक गईं।
“कुछ नहीं।”
“मतलब?”
“बस message था।”
“और?”
“और कुछ नहीं।”
मीरा ने उसे कुछ पल देखा।
“तुमने reply किया?”
आशी ने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
“क्यों?”
आशी ने गहरी साँस ली।
“क्योंकि मुझे नहीं पता था कि सामने वाला कौन है।”
मीरा कुछ कहती, उससे पहले आशी का फोन vibrate हुआ।
दोनों की नजर फोन पर गई।
आशी ने धीरे से फोन उठाया।
स्क्रीन पर सिर्फ एक छोटा-सा notification था।
नया संदेश।
उसका दिल अचानक तेज़ धड़कने लगा।
उसने संदेश खोला।
कुछ सेकंड तक वह स्क्रीन देखती रही।
फिर उसकी आँखों में हैरानी उतर आई।
संदेश में लिखा था—
“शायद मुझे भी नहीं पता कि तुम्हें क्या जवाब देना चाहिए… लेकिन एक बात पूछ सकता हूँ?”
आशी ने स्क्रीन को घूरते हुए धीरे से कहा—
“ये…”
मीरा ने पूछा—
“क्या हुआ?”
आशी ने फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।
मीरा ने संदेश पढ़ा।
दोनों कुछ पल बिल्कुल चुप रहीं।
“Reply मत करना।”
मीरा ने धीरे से कहा।
आशी ने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि हमें नहीं पता वो कौन है।”
आशी ने फिर फोन की स्क्रीन देखी।
उसकी उंगलियाँ keyboard पर चली गईं।
कुछ लिखा।
फिर मिटा दिया।
दोबारा लिखा।
फिर रुक गई।
आखिर उसने सिर्फ इतना भेजा—
“पहले आप बताइए… आप कौन हैं?”
संदेश भेजते ही दोनों की नजर स्क्रीन पर टिक गई।
इस बार जवाब आने में ज्यादा देर नहीं लगी।
“जिसका नाम शायद तुम पहले ही सुन चुकी हो…”
आशी की भौंहें सिकुड़ गईं।
मीरा ने धीरे से पूछा—
“कौन?”
आशी ने कोई जवाब नहीं दिया।
क्योंकि उसी पल उसकी स्क्रीन पर एक और संदेश आया था—
“विहान।”
🌙 क्रमशः…