Reasons in Hindi Short Stories by Virendra Dewangan books and stories PDF | वजहें

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वजहें

किसी जमाने में गांवों में समाचार या गाना सुनने का एकमेव माध्यम रेडियो या ट्रांजिस्टर हुआ करता था। जो लोग संपन्न व शौकीन थे, वे अपनें मनोरंजन, समययापन और शान के लिए इसे रखा करते थे।

प्रचार-प्रसार का यह साधन तब वनीय गांवों में स्टेटस सिंम्बल भी था। लोग रेडियो के बनिस्बत ट्राजिस्टर रखना ज्यादा पसंद करते थे। कारण कि ट्रांजिस्टर कहीं लाने-ले जाने में आसान हुआ करता था, जो बैटरी से चलता था।

एक शाम मोहला का सरपंच श्यामसुंदर फिलिप्स ट्रांजिस्टर से समाचार सुन रहा था। समाचार में बताया जा रहा था, ‘सरकार के द्वारा न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 100 रुपये से 110 रुपया कर दिया गया है। वहीं, सूअरों से दूर रहने की सलाह सरकार के अमले के द्वारा दी जा रही है; क्योंकि इलाके में स्वाइन फ्लू तेजी से फैल रहा है।’

समाचार सुनकर वह मन-ही-मन बड़बड़ाया, ‘न्यूनतम मजदूरी का बढ़ना, मतलब सारे कार्यों की मजदूरी का बढ़ना हुआ, जिसको कोई माई का लाल बढ़ने से रोक नहीं सकता।’

समाचार सुनकर उसे वह पुरानी घटना याद आ गई, जिसकी बदौलत बैलों के दाम एकदम उछल गए थे। 1982-83 में आईआरडीपी योजना लागू होने से यही धमाल हुआ था।

जो औसत बैलजोड़ी 500-500 रुपए में आसानी से मिल जाया करते थे, वह सरकारी खरीद के चलते 2000 रुपए में मिलने लगे थे। अब तो इसकी कीमत दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ चुकी है और सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही चली जा रही है। न जाने कहां जाकर थमेगी?

तब, बेचारे सीमांत और छोटे किसानों का मरण हो गया था। उन्हें बैल खरीदने में पसीने छूट रहे थे।

इससे दलालों की चांदी हो गई थी। उनके दोनों हाथों में लड्डु और सिर कढ़ाई में पहुंच गया था। वे अकूत दौलत कूट रहे थे।

इस पर श्यामसुंदर अचरज से स्वगत कथन किया, ‘‘ओह! मजदूरी बढ़ जाने से खेती करना अब महंगे-से-महंगा हो जाएगा।’’

तभी उसको आभास हुआ कि यह सरकार का आदेश है, जिसका पालन सबको करना जरूरी है। इसमें मीनमेख निकालना औचित्यहीन है।

जैसे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ जाने से अन्य वस्तुओं के दाम आटोमैटिक बढ़ने लगते हैं, उसी तरह मजदूरी बढ़ने से खेती-किसानी महंगा होने लगता ही है।

अतः, वो सरकार का आदेश ग्राम पंचायत तक पहुंचने के पूर्व अपनी खेती के लिए मजदूर ढूंढने के वास्ते श्रमिक बस्ती यानी वार्ड नंबर 10 पहुंचा, जहां से वह अक्सर मजदूर लाया करता था और घर की खेती का काम निपटाया करता था।

वहां मजदूर तो मिले नहीं; अलबत्ता उनके बच्चे धूल-मिट्टी से सने, गंदे, फटे व चीकट लगे कपड़े पहने हुए दिखे।

किसी-किसी झोपड़पट्टी से धुआं उठ रहा था, जिसका आशय था, झोपड़ी में आग जल रही है और महुआ की कच्ची शराब अपनी महक छोड़ रही है।

अंदर से खांसते-खंखारते और नाक सिनकते बड़े-बूढ़ों की आवाजें आ रही है।

सड़क किनारे तिगड्डे पर हैंडपंप लगा हुआ है, जिसके जगत के पास एक बड़ा-सा गड्ढा बना हुआ है, जिसमें छोटे-बड़े सुअर लोटपोट करते हुए चौकड़ी भर रहे हैं।

वातावरण बदबूदार और मच्छरों के परवरिश के लिए शानदार है।

ऐसे में, डेंगू, मलेरिया ही नहीं, हैजा, फ्लेग व स्वाइन फ्लू फैलने का भी अंदेशा है?

इसके बावजूद यहां हैंडपंप मैकेनिक, स्वास्थ्य वर्कर, आशा कार्यकर्ता नियमित आते थे और अपना काम कर चले जाते थे।

हालांकि पंचायत निधि से वार्ड नंबर 10 में सड़क बनाकर पंचायत दुर्गंधयुक्त गड्ढे को भरना चाहता था, लेकिन सुअर मालिकों के विरोध के चलते गड्ढा भरना मुमकिन न था।

सुअर मालिकों का कहना था, ‘‘गड्ढा भर जाने से उनके सुअरों को दिन गुजारना मुश्किल हो जाएगा, जिससे वे जंगल की ओर रुख करेंगे और बाघ के आसान शिकार बन जाएंगे। इससे नुकसान तो अपना होगा मुखियाजी, इसीलिए इस वार्ड में सड़क न ही बनाई जाए, तो अच्छा रहेगा।’’

ऐसा कहनेवालों में वार्ड पंच प्रमुख था; क्योंकि सुअरों के झुंड में उसी के सुअर ज्यादा दिख रहे थे और वही पंचायत का मुखर विरोधी पंच था।

इस मुहल्ले में पंद्रह-बीस घास-फूस की झोपड़ियां थी, जो मिट्टी की दीवारों से बनी हुई थी।

इलाका देखने से एकबारगी लगता था कि ऐसे ही स्थल महामारियों के लिए उर्वर भूमि हुुआ करते हैं, जहां गरीबी, भुखमरी, गंदगी, बीमारी और अभावग्रस्तता का साम्राज्य एक साथ छाया रहता है।

बहरहाल, श्यामसुंदर ने वहा पहुंचकर बच्चों से पूछा,‘‘तुम्हारे माता-पिता कहां हैं?’’

‘‘वे काम पर गए हैं। शाम तक लौटेंगे। क्या काम है?’’उनमें से एक लड़का तेजी से जवाब देते हुए प्रश्न किया।

बाकी बच्चे झुंड बनाकर उसके पीछे खड़े हो गए और श्यामसुंदर को पहचानने की कोशिशें करने लगे।

‘‘मुझे खेती के काम के लिए मजदूरों की जरूरत है।’’ श्यामसुंदर ने यहां आने का मकसद बताया।

‘‘रात को आना। यहां सबके सब मिलेंगे। तब बात कर लेना।’’ अबकी एक होशियार-सी लड़की सामने आई और बातें बनाते हुए जवाब दी।

‘‘नहीं, नहीं; रात को मत आना। सभी टुन्न रहते हैं। लड़ते-झगड़ते भी हैं। पीने के बाद सबका दिमाग फ्यूज रहता हैं। पियक्कड़ अपने मां-बाप तक को तुच्छ समझते हैं, तो आपको किस खेत की मूली समझेंगे।’’ पहला लड़का अबकी समझदारी से जवाब दिया।

बच्चों की हकीकत बयानी से श्यामसुंदर को यकीन ही नही, पुष्टि हो गया कि यही है पंचायत के वार्ड नंबर 10 की असलियत, जो वह पहले से सुन व गुन रखा था।

उसे लगा कि ये बच्चे गरीब जरूर हैं, किंतु इनमें कपटचारी नहीं के बराबर है।

वे चाहते, तो उसे रात को बुलाकर उसका मखौल उड़वा सकते थे। श्यामसुंदर सोचता रहा, ‘ऐसे में, मुहल्ले में स्वाइन फ्लू नहीं फैलेगा, तो और क्या फैलेगा; जहां का पंच ही अकड़बाजी में स्वाइनों को पालकर महामारी फैलाने में लगा हुआ है?’
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लघुकथा पढ़ने के लिए दिल से आभार। कृपया सब्सलेखकीय प्रयासों को प्रोत्साहित करें।