Incompleteness - 21 in Hindi Motivational Stories by Falguni Dost books and stories PDF | अधूरापन - 21

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अधूरापन - 21

अध्याय-२१

अमृता के सकारात्मक रवैये, सभी की प्रार्थनाओं और उसके किए गए कर्मों के फलस्वरूप वह अपने घर वापस आ चुकी थी। घर में शोभाबहन समेत परिवार के सभी सदस्यों ने बहुत ही प्रेम से उसका स्वागत किया। भार्गवी को इस बात का रंज था कि, अब जब तक भाभी दोबारा पहले की तरह पूरी तरह सक्षम नहीं हो जातीं, तब तक बच्चे को गोद लेने की बात को तो टालना ही पड़ेगा। फिर भी अब घर का माहौल बहुत खुशनुमा रहता था, इसलिए वह भाभी के लिए बहुत खुश थी।

धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। गायत्री बहन थोड़े-थोड़े दिनों में अमृता भाभी के पास आतीं और इस बात का पूरा ध्यान रखतीं कि मातृत्व धारण न कर पाने का दुःख उनके मन पर हावी न हो। वह अक्सर वहाँ चक्कर मारने ज़रूर आ जातीं। घर उनकी मौजूदगी से भरा-भरा हो जाता और वह ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करतीं जिससे अमृता का ध्यान नयी यादों को समेटने में रहे, ताकि अमृता को किसी भी बात की कमी महसूस न हो।

अपूर्व भी अपने दोस्त विनय, उसकी पत्नी, उनके बच्चों और उसके छोटे भाई की इकलौती बेटी "हनी" को लेकर बार-बार किसी ना किसी बहाने पार्टी रखता था। हनी विनय के छोटे भाई की बेटी थी। विनय के छोटे भाई और भाभी दोनों की एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। इसलिए हनी की सब ज़िम्मेदारी विनय और नीला ने बहुत प्रेम से उठाई थी। विनय अपने छोटे भाई से बहुत प्यार करता था। लेकिन कुदरत को विनय के परिवार की यह खुशी मंज़ूर नहीं थी और अकाल ही दोनों की मृत्यु हो गई, जिससे नन्हीं हनी के सर से माता-पिता दोनों की छत्रछाया छिन गई।

विनय भी इस बात के लिए लगातार प्रयास करता रहता था कि अमृता भाभी घर के हँसी-खुशी के माहौल में पुरानी किसी भी बात को याद ही न करें। वैसे भी विनय के बच्चे तो बड़े थे, इसलिए हनी की भी भव्या के साथ ज़्यादा बनती थी। यह बात अपूर्व और भार्गवी ने नोट की थी कि थोड़े ही समय में भव्या और हनी बहुत अच्छी सहेलियाँ बन गई थीं।

राजेश तो मानो अमृता के नाम की ही माला जपता रहता था। सचमुच परिवार में इतना ज़्यादा प्रेम आ जाएगा, इसकी तो रमेशभाई या किसी भी और को कल्पना ही नहीं थी।

शोभाबहन अब कुछ बोलती तो नहीं थीं, लेकिन उनकी आँखों में बसा ज़हर बहुत कुछ कह जाता था। लेकिन अब पूरा परिवार मानो उनके इस व्यवहार को अनदेखा करना सीख गया था। इस वजह से घर में अब शांति बरकरार रहती थी।


**एक साल बाद—**


अमृता घर के मंदिर में आरती करके, सभी को आरती लेने और गरमागरम नाश्ता करने के लिए डाइनिंग टेबल पर आने की आवाज़ देती है। भार्गवी उसे देखकर मन ही मन सोचती है, "भाभी पहले सिर्फ़ अपना फ़र्ज़ निभा रही थीं, लेकिन अब तो वह उस फ़र्ज़ से मिलने वाले आनंद को भी जी रही हैं।" अपनी भाभी को नज़र न लगे, इसलिए भार्गवी अपनी आँख का काजल भाभी के कान के पीछे लगा देती है और भाभी से कहती है, "आई एम सो हैप्पी फॉर यू (मैं आपके लिए बहुत खुश हूँ)।" यह कहकर वह भाभी का हाथ पकड़कर उन्हें गोल-गोल घुमाती है।

अपूर्व दूरी पर खड़ा दोनों देवरानी-जिठानी की यह मस्ती देख रहा था। अपूर्व ने मन ही मन बोला, 'अब वह समय आ गया है कि राजेशभाई और भाभी के लिए मैंने जो सोचा है, वह प्रस्ताव रखूँ।' अपने विचार को पेश करने के लिए वह तुरंत एक प्लान बना लेता है।

सब लोग नाश्ता करने आ गए थे। अपूर्व ने कहा, "आज विनय अपने परिवार के साथ शाम को खाने पर आएगा। भाभी, आज अपने हाथों से कुछ बहुत बढ़िया डिनर बनाना।"

अमृता यह सुनकर तुरंत बोली, "वाह! हनी भी आएगी!" भाभी के चेहरे पर अचानक खुशी छा गई और वह उत्साहित होकर बोल उठीं, "मैं भव्या और हनी के लिए उनकी पसंद का वेज मंचूरियन और ब्राउनी बनाऊँगी। और हम सबके लिए भार्गवी जो कहेगी वह बना दूँगी।" अपूर्व ने तुरंत ग़ौर किया कि भाभी हनी के नाम से कितनी खुश हो गईं। उसने आँखों के इशारे से भार्गवी को भी दिखाया कि भाभी कितनी खुश हुईं!

अमृता सारा डिनर बनाकर हनी के आने का इंतज़ार कर रही थी। जैसे ही विनयभाई आए, हनी तुरंत अमृता भाभी से लिपट गई। दोनों को इस तरह प्यार से मिलते देखकर राजेश भी बहुत खुश हो रहा था। सबके डिनर कर लेने के बाद अमृता भाभी, भव्या और हनी के साथ मस्ती कर रही थीं। शोभाबहन, नीला और भार्गवी किचन में सब साफ़-सफ़ाई और ठीक-ठाक कर रही थीं। विनय के दोनों बच्चे रमेशभाई के साथ लैपटॉप पर कुछ सर्च कर रहे थे। विनय, राजेश और अपूर्व तीनों अकेले बैठकर बातें कर रहे थे। अपूर्व को आज अपनी बात रखने का सही मौक़ा लगा और उसने अपनी बात सामने रखी। "भाई और विनय! मैं तुम दोनों से अपने मन की एक बात कहना चाहता हूँ, अगर तुम्हें सही लगे तो बताऊँ?"

हर किसी के जीवन में यहाँ एक अधूरापन है,
हर किसी के जीवन में किसी ना किसी की ज़रूरत है।'
एक "दोस्त" अब निभाएगा दोस्ती की रीत,
और पूरा होगा अब जीवन का यह अधूरापन!

विनय और राजेश तुरंत बोले, "बोल ना, क्यों गोल-गोल बातें घुमा रहा है?"

अपूर्व गंभीर और धीमे स्वर में बोला, "मैं ऐसा चाहता हूँ कि, भाई आप और भाभी इस हनी को गोद ले लो (दत्तक ले लो)! अगर विनय और नीला भाभी इस बात के लिए मंज़ूरी दें तो। एक माँ-बाप के बिना की बेटी को शायद आपके रूप में अपने माता-पिता और परिवार मिल जाएगा! और आपके जीवन का ख़ालीपन भी पूरा हो जाएगा!" हिम्मत करके इतना बोलकर अपूर्व रुक गया।

राजेशभाई अचानक मिले इस प्रस्ताव का क्या जवाब दें, इस बात से उलझन में पड़ गए। लेकिन अपूर्व को लगा कि विनय मन ही मन कुछ सोच रहा है, इसलिए अपूर्व ने पूछा, "क्या सोच रहे हो विनय?"