Excerpt from Ego and Junk Ltd. in Hindi Book Reviews by R Mendiratta books and stories PDF | इगो एंड कबाड़ लिमिटेड के अंश

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इगो एंड कबाड़ लिमिटेड के अंश

अध्याय 3
चंपक लाल 
चम्पक लाल के नए कारनामें और उनकी ज्योतिष विद्या के "कमाल"

'इगो एंड कबाड़ लिमिटेड' के प्रशासनिक भवन की पहली मंजिल पर स्थित सीनियर मैनेजर खूबचंद का केबिन हमेशा से कारखाने के भीतर एक अजीब सा टापू माना जाता था। जहाँ एक तरफ पूरी बिल्डिंग की हवा में अफसरों के अहंकार की गंध, बाबुओं की चापलूसी की सरसराहट और फाइलों को दबाकर रखने का पुराना कबाड़ कल्चर तैरता था, वहीं खूबचंद के इस केबिन के भीतर केवल और केवल तकनीकी नियमों की शुद्धता, मशीनों के लॉग-बुक की कड़क गंध और एक ईमानदार इंजीनियर का शांत स्वाभिमान बसता था। इस केबिन का वोल्टेज हमेशा इतना हाई रहता था कि दफ्तर के बड़े-से-बड़े जुगाड़ू बाबू भी भीतर कदम रखने से पहले अपने माथे का पसीना पोंछते थे। खूबचंद अपनी मेज पर रखी फाइलों के एक-एक पुर्जे को, एक-एक आंकड़े को अपनी पारखी नजरों से इस तरह जांचते थे जैसे कोई कुशल जौहरी असली और नकली रत्न की पहचान कर रहा हो। उनके सफारी सूट पर कभी कोई शिकन नहीं होती थी, और उनकी रीढ़ की हड्डी इतनी सीधी थी कि शर्मा जी के केबिन में होने वाले किसी भी प्रशासनिक दबाव का असर उन पर कभी नहीं पड़ता था।
लेकिन आज सुबह की हवा में कुछ अलग ही किस्म की चापलूसी की गंध घुली हुई थी। साढ़े आठ बजे का सायरन बजने के ठीक दस मिनट बाद, गलियारे में जूतों की एक अजीब, मखमली और घिसटती हुई आवाज सुनाई दी। यह आवाज किसी कड़क अफ़सर की नहीं थी, बल्कि यह उस इंसान के आने की आहट थी जिसने इस कारखाने के भीतर 'चमचागिरी के नए आयाम' स्थापित किए थे। यह थे चम्पक लाल, जो हाल ही में चीफ जनरल मैनेजर (सीजीएम) शर्मा साहब की विशेष अनुकंपा, उनके बंगले पर बनारसी जर्दा पान पहुँचाने की अटूट निष्ठा और लाला घासीराम के यहाँ से गुप्त लिफाफों का अरेंजमेंट करने की अपनी अद्भुत 'प्रशासनिक योग्यता' के बल पर नए-नए प्रमोट होने की फिराक में घूम रहे थे।
चम्पक लाल जब खूबचंद के केबिन के भीतर दाखिल हुए, तो नजारा देखने लायक था। उनकी दसों उंगलियों में आधी दर्जन से अधिक पुखराज, मूंगे, गोमेद और नीलम की चमकीली अंगूठियां सजी हुई थीं, जो सुबह की धूप में इस तरह चमक रही थीं मानो वे किसी कारखाने के मैनेजर की उंगलियां नहीं, बल्कि किसी तांत्रिक का चलता-फिरता कबाड़खाना हों। चम्पक लाल अपनी भारी तोंद को सिल्क की महंगी कमीज के भीतर छुपाने की असफल चेष्टा करते हुए, खूबचंद की मेज के पास पैंतालीस डिग्री के अपने पेटेंट चापलूसी वाले कोण पर झुक गए। उनके चेहरे पर एक ऐसी कृत्रिम, चाशनी में डूबी मुस्कान तैर रही थी जिसे देखकर कोई भी समझदार इंसान सतर्क हो जाए।
"नमस्कार खूबचंद साहब! साक्षात दंडवत प्रणाम सर!" चम्पक लाल ने अपनी उंगलियों की अंगूठियों को चमकाते हुए बेहद मखमली आवाज में कहा, "आज सुबह-सुबह ही जब मैं दफ्तर के लिए निकल रहा था, तो मैंने आपकी कुंडली के ग्रहों की चाल देखी थी सर। आपकी राशि तुला है और इस वक्त आपकी कुंडली के एकादश भाव में साक्षात शुक्र महाराज की महादशा चल रही है। आपका यह तकनीकी केबिन तो इस वक्त पूरे कारखाने के भीतर सबसे पवित्र और हाई वोल्टेज वाला स्थान है सर! आपकी इस कड़क निर्णय क्षमता के आगे तो नौ ग्रह भी हाथ बांधकर खड़े रहते हैं खूबचंद ने अपनी मेज पर खुली पड़ी प्लांट नंबर दो की मेंटेनेंस लॉग-बुक से अपनी कड़क, ठंडी और खोजी नजरें धीरे-धीरे उठाईं। उन्होंने चम्पक लाल को ऊपर से नीचे तक इस तरह देखा जैसे वे किसी मशीन के जंग लगे, बेकार पुर्जे का निरीक्षण कर रहे हों। खूबचंद के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। उन्होंने अपनी फाउंटेन पेन को मेज पर नीचे रखा और बेहद शांत, भारी आवाज में बोले, "मिस्टर चम्पक लाल, आप इस वक्त 'इगो एंड कबाड़ लिमिटेड' के एक बेहद जिम्मेदार एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक में खड़े हैं। मेरी मेज पर इस वक्त प्लांट नंबर दो की मुख्य खराद मशीन का वो मेंटेनेंस चार्ट खुला है, जो पिछले तीन हफ्तों से पेंडिंग पड़ा है क्योंकि आपके विभाग ने अभी तक नए गियर-बॉक्स का टेंडर क्लियर नहीं किया है। मुझे यहाँ आपकी इस ज्योतिष की कबाड़ थ्योरी की, राहु-केतु के पाखंड की और मेरी राशि की चिंताओं की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे सीधे काम की सूचना चाहिए। बताइए, उस टेंडर की फाइल का क्या हुआ?"
चम्पक लाल ने घबराहट में अपनी पुखराज वाली अंगूठी को अपने अंगूठे से तेजी से घुमाया। खूबचंद की इस कड़क और सीधी बात ने उनके भीतर के चापलूसी के वोल्टेज को एक ही पल में डाउन कर दिया था। लेकिन चम्पक लाल भी चमचागिरी की उस आधुनिक यूनिवर्सिटी के गोल्ड मेडलिस्ट थे जहाँ सच को झूठ और झूठ को सच का कबाड़ बनाना रोज का काम था। उन्होंने तुरंत अपनी आवाज को और भी धीमा, फुसफुसाहट भरा करते हुए मेज पर थोड़ा आगे की तरफ झुकाव लिया, इतने करीब कि उनके परफ्यूम की तेज गंध खूबचंद की फाइलों को छूने लगी।
"अरे खूबचंद साहब! आप तो बेकार में ही मुझ छोटे कर्मचारी पर इस तरह अपना कड़क गुस्सा जाहिर कर रहे हैं," चम्पक लाल ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, "सच पूछिए तो उस टेंडर की फाइल तो मैंने परसों शाम को ही पूरी तरह से वेल्डिंग करके, सारे क्लॉज को सेट करके सीजीएम शर्मा साहब के केबिन में टेबल पर रख दी थी। लेकिन... लेकिन क्या बताएं सर, शर्मा साहब का इगो तो आप जानते ही हैं। जब तक उनके बंगले पर लाला घासीराम का आदमी खुद जाकर विशेष खातिरदारी नहीं करता, तब तक साहब की कलम की स्याही आगे नहीं सरकती। शर्मा साहब ने साफ कह दिया है कि जब तक खूबचंद हमारे केबिन में आकर हाथ बांधकर इस प्रोजेक्ट की अनुमति नहीं मांगता, तब तक यह फाइल इसी तरह फाइलों के कबाड़खाने में दबी रहेगी। शर्मा साहब का इगो इस वक्त सातवें आसमान पर है सर, और उनकी कुंडली में सूर्य उच्च का होकर बैठा है।"खूब चंद अपनी भारी मखमली कुर्सी पर एकदम सीधे बैठ गए। उनकी रीढ़ की हड्डी में एक कड़क खिंचाव आया और उनकी आँखों में अंगारे दहक उठे। "चम्पक लाल जी, शर्मा साहब चीफ जनरल मैनेजर हो सकते हैं, इस कंपनी के बड़े आका हो सकते हैं, लेकिन वे इस कारखाने के नियमों से, इसकी साख से और इसके तकनीकी प्रोटोकॉल से बड़े नहीं हैं। प्लांट नंबर दो की वह खराद मशीन इस वक्त पूरे कारखाने की रीढ़ है। अगर उसका गियर-बॉक्स समय पर नहीं बदला गया, तो मुख्य बॉयलर का प्रेशर गेज लाल निशान को पार कर जाएगा और किसी भी रात एक ऐसा भयानक ब्लास्ट हो सकता है जिससे वहां काम करने वाले साढ़े चार सौ गरीब मजदूरों की जान खतरे में पड़ जाएगी। क्या शर्मा साहब का व्यक्तिगत इगो इन साढे चार सौ मजदूरों की जान से भी बड़ा है? क्या वे अपने अहंकार का प्रदर्शन इन मजदूरों की लाशों पर करना चाहते हैं? मैं किसी के बंगले पर हाजिरी लगाने या चापलूसी का जर्दा पान पहुँचाने नहीं आया हूँ। खूबचंद झुकना नहीं जानता। मैं इसी वक्त खुद शर्मा साहब के केबिन में जाऊंगा और इस फाइल पर उनकी लाल स्याही का हिसाब मांगूंगा।"
चम्पक लाल का दिल यह सुनते ही अंदर से कांप गया। वे अच्छी तरह जानते थे कि अगर खूबचंद इस कड़क तेवर के साथ शर्मा जी के केबिन में चले गए, तो वहां एक ऐसा प्रशासनिक धमाका होगा जिसकी आंच में सबसे पहले चम्पक लाल की अपनी नई-नवेली जुगाड़ू कुर्सी ही जलकर कबाड़ हो जाएगी। वे तुरंत खूबचंद की मेज के और करीब आए, अपने दोनों हाथ फैलाए और याचना करने वाले अंदाज में बोले, "नहीं... नहीं खूबचंद साहब! ऐसा अनर्थ मत कीजिएगा सर! शर्मा साहब इस वक्त बहुत ही क्रूर मिजाज में बैठे हैं। कॉर्पोरेट हेडक्वार्टर से बनवारी लाल जी का भी सुबह ही फोन आया था। वे दोनों मिलकर अंदर केबिन में आपके खिलाफ एक बहुत बड़ी साजिश का कबाड़ बुन रहे हैं। वे आपकी इस कड़क निर्णय क्षमता को 'तानाशाही' साबित करके आपको निलंबित यानी सस्पेंड करने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। म्हात्रे की यूनियन के कुछ चमचों को भी उन्होंने कल रात गेस्ट हाउस में बुलाकर भारी रकम के लिफाफे सौंपे हैं ताकि प्लांट फ्लोर पर हंगामा खड़ा किया जा सके। इस वक्त आपकी कुंडली का राहु सीधे आपकी छाती पर बैठा है सर, जरा शांत रहिए।"ख़ूब चंद उठे, उन्होंने अपना लेदर बैग उठाया, अपने सफारी सूट के बटन को सुधारा और चम्पक लाल की तरफ एक बेहद हिकारत भरी, कड़क नजर डाली। "मिस्टर चम्पक लाल, आपकी यह चमचागिरी के नए आयाम, यह बिकाऊ यूनियन की राजनीति और यह फेक ज्योतिष का बक्सा खूबचंद को डराने के काम नहीं आएगा। जब रीढ़ की हड्डी मजबूत हो और नीयत में सच्चाई  हो, तो बड़े-से-बड़े आकाओं के अहंकार के बुर्ज भी कोर्ट और कानून के सामने कबाड़ के भाव बिक जाते हैं। आप अपनी इन अंगूठियों को संभालिए और जाकर शर्मा साहब को बता दीजिए कि खूबचंद अपनी नौकरी दांव पर लगा सकता है, अपना स्वाभिमान नहीं। जंग अब शुरू हो चुकी है।"

चमचागिरी के नए आयाम और चम्पक लाल का भूतकाल

वर्तमान की उस खौलती हुई प्रशासनिक जंग, खूबचंद की कड़क रीढ़ की हड्डी के सीधे वोल्टेज और एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक के बंद वातानुकूलित कमरों के भीतर रची जा रही साजिशों से दूर, अगर हम 'इगो एंड कबाड़ लिमिटेड' के इतिहास के पन्नों को थोड़ा पीछे पलटें, तो चमचागिरी का एक ऐसा विशालकाय और घिनौना कबाड़खाना बाहर निकल कर आता है जिसे देखकर किसी भी स्वाभिमानी इंसान का सिर चकरा जाए। आज के नवनियुक्त डिप्टी जनरल मैनेजर  चम्पक लाल, जो अपनी दसों उंगलियों में आधी दर्जन से अधिक पुखराज और गोमेद की अंगूठियां चमकाते हुए खुद को प्रशासनिक व्यवस्था का नीति-निर्धारक समझते हैं, हमेशा से इतने रसूखदार नहीं थे। आइए, समय की सुइयों को पूरे आठ साल पीछे ले चलते हैं, जब इस कारखाने की चिमनियों का धुआं थोड़ा अलग था और चम्पक लाल ने इस कबाड़ साम्राज्य की चौखट पर पहली बार कदम रखा था।
उन दिनों चम्पक लाल बिल्कुल नए-नए कॉलेज की चकाचौंध से बाहर निकले थे। चेहरे पर कोई तकनीकी तेज या इंजीनियरिंग की कड़क समझ तो नहीं थी, लेकिन आँखों में शॉर्टकट से सफलता की ऊंचाइयों को छूने का एक शातिर और असीमित लालच जरूर तैर रहा था। कॉलेज के दिनों में जहाँ लड़कों को किताबों और खराद मशीनों के तकनीकी गियर-बॉक्स की चिंता होती थी, चम्पक लाल को वहां सिर्फ एक ही लत लगी थी—महंगी और सस्ती शराब के नशे में डूबे रहने की। जब वे 'इगो एंड कबाड़ लिमिटेड' में असिस्टेंट मैनेजर के सबसे शुरुआती और अदने से पद पर भर्ती होकर आए, तो उनके सूटकेस में तकनीकी मैनुअल के बजाय चापलूसी के नए-नए फॉर्मूले भरे हुए थे। कारखाने के भीतर आते ही उन्होंने सबसे पहले अपना एक विशेष ग्रुप तैयार किया, जिसका एकमात्र काम रोज शाम को दफ्तर के बाद महंगी पार्टियां आयोजित करना, शराब के दौर चलाना और प्रशासनिक भवन के बड़े साहब लोगों की नजरों में आना था।
चम्पक लाल का एक ही मूल मंत्र था कि कारखाने के भीतर ईमानदारी से पसीना बहाना, मशीनों की वेल्डिंग सुधारना और उत्पादन का ग्राफ बढ़ाना तो सिर्फ मूर्खों और सीधे अफसरों का काम है; असली तरक्की तो बड़े साहब लोगों के घरों की चाकरी और उनके इगो को संतुष्ट करने से मिलती है। संयोग से चम्पक लाल के संपर्क कंपनी के कॉर्पोरेट हेडक्वार्टर के ऊंचे आकाओं से बहुत जल्दी और गहरे हो गए, जिसके कारण उनके भीतर एक अजीब सा, बदसूरत घमंड आ गया था। वे अपने बैच के सीधे और ईमानदार अफसरों को कबाड़ समझते थे। लेकिन ऊपर वाले बड़े साहब लोगों की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखने में चम्पक लाल का कोई सानी नहीं था। वे एक ऐसे 'ऑल-इन-वन' जुगाड़ू मैनेजर बन चुके थे जिसके पास बड़े साहबों की हर अनैतिक और असामान्य इच्छा की चाबी मौजूद थी।
दफ्तर की फाइलों के नीचे दबे किसी बड़े साहब को अगर रात की तन्हाई काटने के लिए किसी विशेष नीले रंग वाली फिल्म की रील चाहिए, तो चम्पक लाल हाजिर हैं; किसी बड़े डायरेक्टर को पेरिस की सबसे महंगी और दुर्लभ वाइन या परफ्यूम  चाहिए, तो चम्पक लाल हाजिर हैं; कॉर्पोरेट हेडक्वार्टर से आए किसी बड़े नीति-निर्धारक को रूस की खास क्नियाख् यानी अत्यंत नशीली ब्रांडी का शौक है, तो चम्पक लाल के केबिन से वह बोतल एक मिनट में हाजिर हो जाती थी। यहाँ तक कि फ्रांस से मंगाया जाने वाला वो विशेष किस्म का डब्बा बंद मीट, जो भारत के बाजारों में आसानी से नहीं मिलता था, चम्पक लाल उसे बड़े अफसरों के डाइनिंग टेबल तक पहुँचाने का हुनर बखूबी जानते थे।
लेकिन चम्पक लाल की असली प्रशासनिक काबलियत कुछ और ही थी। वे जानते थे कि बड़े साहब लोगों को काबू में करने का सबसे आसान और व्यावहारिक रास्ता उनके बंगलों से होकर गुजरता है। उन्होंने ऊपर वाले अफसरों की पत्नियों और उनके परिवारों का विशेष ख्याल रखना शुरू किया, जिसका उन्हें अपने पूरे करियर में भरपूर और एकतरफा फायदा भी मिला। आखिर घर के भीतर बड़े-से-बड़े खड़ूस साहब की मूंछ का इगो भी उनकी धर्मपत्नियों के सामने आकर पूरी तरह सरेंडर हो ही जाता है, और पत्नियों का कहना तो दुनिया का हर अफसर मानता ही है! चम्पक लाल बड़े साहबों के बच्चों को सुबह अपनी चमचमाती गाड़ी में स्कूल छोड़ना, मैडम साहब के कहे अनुसार घर के सोफों की मरम्मत करवाना, उनके पालतू कुत्तों को शाम को टहलाना और उनके घरों के राशन की कबाड़ फाइलिंग तक खुद संभालते थे। इस प्रकार, उन्होंने अपने वरिष्ठों के साथ एक ऐसा व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंध स्थापित कर लिया था, जिससे वे साहब लोग चाहकर भी चम्पक लाल को प्रमोशन की लिस्ट से बाहर रखने की हिम्मत नहीं कर पाते थे।