water burial in Hindi Short Stories by Virendra Dewangan books and stories PDF | जल-समाधि

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जल-समाधि

‘‘ओय अम्मा...ओय काकी...ओय दीदी...ओय मामी...! जरा घूंघट तो उठाओ!! कैमरे में आपलोगों का चेहरा सही से नहीं आ रहा है। कैमरे में चेहरा नहीं आएगा, तो तुम्हें कौन पहचानेगा? तुम्हारा दर्द कोई कैसे समझेगा और फैसला लेगा?’’ जल-सत्याग्रह में नर्मदा मैया में गले तक डूब चुकी मजबूर महिलाओं का पोज लेते हुए टीवी पत्रकारों ने महिलाओं से कहा।

बेचारी महिलाएं पांच दिनों से जल में डूबी हुईं थीं। उनके हाथ-पैर गलने लगे थे। भूख से उनकी अंतड़ियां पिचक व चिपक गई थी। वे जल में रहकर भी पेयजल के लिए तरस रहे थे। कंठ उनके सूखे हुए थे।

वे हताश व निराश थे कि आज तक कोई उनकी सुध लेने क्यों नहीं आया? इसीलिए, टीवी पत्रकारों को देखकर उनके चेहरे पर थोड़ी देर के लिए चमक आ गई कि अब उनका भी समाचार टीवी पर दिखाया जाएगा।

अखबार में भी उनका दुःख-दर्द छपेगा, तो सरकार की चेतना जगेगी। वह सोते से उठकर उनकी खोज-खबर करेगी।

सरकार सुध लेगी, तो उनकी किस्मत चमकेगी। घर-द्वार व जमीन डूब से बच जाएगी, तो उनकी रोजी-रोटी चल पड़ेगी। बाल-बच्चों की पढ़ाई-लिखाई होगी। बच्चे कुछ-न-कुछ बन जाएंगे। लिहाजा, डूबते को तिनके का सहारा मिला और उन्होंने घूंघट सरका दिया।

घूंघट सरकाना था कि टीवी पत्रकारों में विभिन्न एंगल से पोज लेने की होड़ मच गई। वे इस सुअवसर का भरपूर लाभ उठा लेना चाहते थे। अब, वे अपने टीवी के लिए एक-से बढ़कर एक जीवंत कवरेज लेने लगे, ताकि टीआरपी बढ़ाया ही नहीं, दु्रतगति से दौड़ाया जा सके।

एक ने कहा, ‘‘वाह... क्या दुर्लभ सीन है? मजा आ गया! ऐसे सीन बार-बार कहां मिलते हैं?’’

‘‘क्या खाक सीन है? सबका चेहरा मुरझाया हुआ है। वे भूखे-प्यासे और परेशानजदा लग रहे हैं। एक तरफ नर्मदाजी में कलरव है, तो दूसरी तरफ इनका जीवन कलकल में पड़ा है। मुखड़े पे मुर्दनी छाई हुई है। इनकी मांगे नहीं मानी गई, तो कहीं इनकी जल समाधि न लग जाए।’’ दूसरे ने आशंका जताई।

‘‘...तो हम क्या करें? ये तो सरकार की जवाबदेही है। हमेें तो वास्तविकता दिखाना भर है? यदि यह भी न दिखाएं, तो हम भूखों मर जाएं। हमारी नौकरी चली जाए?’’ तीसरे पत्रकार ने मामला सरकार पर ढकेलते हुए पल्ला झाड़ा।

तभी सहसा नर्मदाजी में जलजला आ गया। जल की धारा एकाएक बढ़ गई। पत्रकार नर्मदा की जलधारा में बहने लगे। कोई इधर बहा, कोई उधर। उनका चश्मा, टोपी, जूता-चप्पल, पेन-कागज और कैमरा बहने लगा। जब जान पर बन आई, तब हाथ-पैर मारते-मारते उनकी जरूरी चीजें कहां छूट गईं, उन्हें पता ही न चला?

उन्होंने जोरों से चिल्लाया,‘‘बचाओ-बचाओ। हमारी जान बचाओ।’’

गनीमत ये हुआ कि वहां मौजूद सत्याग्रहियों के रिश्तेदारों ने जान पर खेला और उन्हें डूब मरने से बचा लिया। कइयों के पेट में पानी भरा, जिसे उल्टी करवाया और पानी निकाल लिया। कइयों को पेट के बल सुलाया और पेट को दबाया।

इस पर एक सीनियर पत्रकार ने ताना मारा, जो  दूर खड़ा यह तमाशा देख रहा था,‘‘जो होना था, ठीक ही हुआ। वरना, दूसरे दिन यही समाचार सुर्खियां बटोरता कि जल-सत्याग्रह में टीवी पत्रकारों की जल-समाधि हो गई।’’
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