अधूरी किताब
एपिसोड 71— आर्या की वापसी
“तीसरा पात्र जाग चुका है।”
किताब के पन्ने पर लिखे इन शब्दों के नीचे एक ही नाम चमक रहा था—
आर्या।
अनन्या की नजर उस नाम पर टिक गई।
उसका चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
“नहीं...”
उसके होंठों से बस इतना ही निकला।
नैना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“दीदी?”
अनन्या ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
“आर्या... मैं हूँ।”
कबीर ने तुरंत कहा—
“नहीं।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“क्या मतलब?”
कबीर आगे बढ़ा।
“तुम आर्या नहीं हो।”
“लेकिन यह नाम मेरा था।”
“था।”
कबीर की आवाज़ में एक अजीब-सी गंभीरता थी।
“लेकिन अब नहीं है।”
अर्णव ने पूछा—
“तो आर्या कौन है?”
कबीर ने जवाब देने के बजाय उस बच्चे की तरफ देखा जो छत के ऊपर खड़ा था।
वही बच्चा।
वही रहस्यमयी मुस्कान।
और वही आँखें जिनमें जैसे हजारों अधूरी कहानियाँ बंद थीं।
बच्चे ने धीरे से कहा—
“मैंने कहा था ना...”
“मैं अपनी कहानी वापस लेने आया हूँ।”
अनन्या ने उसे घूरकर देखा।
“तुम कौन हो?”
बच्चा मुस्कुराया।
“तुम मुझे जानती हो।”
“नहीं।”
“जानती हो।”
“मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा।”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“देखा है।”
“बहुत बार।”
“बस हर बार तुमने मुझे भूल जाना चुना।”
अनन्या का सिर दर्द से फटने लगा।
अचानक उसके सामने कई तस्वीरें चमकने लगीं।
वह छोटी थी।
माँ उसे कहानी सुनाती थीं।
उसके पास एक और बच्चा बैठा था।
वह बच्चा हँसते हुए कह रहा था—
“जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो तुम्हारी कहानी बदल दूँगा।”
अनन्या ने आँखें खोल दीं।
“ये...”
कबीर ने कहा—
“याद आ गया?”
अनन्या ने सिर पकड़ लिया।
“मैं उसे जानती हूँ।”
बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—
“हाँ।”
“लेकिन तुम कौन हो?”
बच्चे ने अपनी उँगली से हवा में एक शब्द लिखा—
“आर्या।”
अनन्या पीछे हट गई।
“नहीं...”
बच्चे ने कहा—
“तुमने मेरा नाम ले लिया था।”
“और फिर कहानी ने तुम्हारा नाम अपने पास रख लिया।”
नैना ने बीच में पूछा—
“अगर आर्या तुम हो... तो अनन्या कौन है?”
बच्चे ने नैना की तरफ देखा।
“वह?”
उसकी मुस्कान गहरी हो गई।
“वह मेरी जगह लिखी गई थी।”
नैना की आँखें फैल गईं।
अर्णव ने तुरंत कहा—
“झूठ!”
बच्चे ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें भी तो पता है।”
“तुम कौन हो?”
“तुम्हारा अंत।”
अर्णव के चेहरे पर तनाव आ गया।
बच्चे ने आगे कहा—
“तुम्हें उस दिन मिटा दिया गया था।”
“क्योंकि कहानीकार को डर था कि अगर तुम्हें सब याद रहा... तो तुम कहानी खत्म कर दोगे।”
अर्णव ने कहा—
“मैंने कभी किसी कहानी को खत्म नहीं किया।”
बच्चा हँसा।
“क्योंकि तुम्हें मौका ही नहीं दिया गया।”
अचानक पूरा कमरा बदलने लगा।
दीवारें टूटकर हवा में उड़ गईं।
उनकी जगह एक बहुत पुराना घर दिखाई दिया।
अनन्या ने उस घर को देखते ही पहचान लिया।
“ये हमारा पुराना घर है।”
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
“हाँ।”
घर के अंदर तीन छोटी बच्चियाँ थीं।
एक अनन्या जैसी।
एक नैना जैसी।
और तीसरी...
वह बच्ची आर्या जैसी थी।
लेकिन तीनों एक-दूसरे की तरफ देख रही थीं।
माँ उनके सामने बैठी थीं।
“तुम तीनों को एक साथ नहीं रहना चाहिए।”
छोटी अनन्या ने पूछा—
“क्यों?”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
छोटी नैना रोते हुए बोली—
“क्या हम बुरी हैं?”
माँ ने उसे गले लगा लिया।
“नहीं।”
फिर तीसरी बच्ची आगे आई।
“तो हमें अलग क्यों करना है?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आँखों में डर था।
“क्योंकि तुम तीनों एक ही कहानी हो।”
दृश्य अचानक रुक गया।
अनन्या ने माँ की तरफ देखा।
“आपने हमें अलग किया?”
माँ ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं चाहती थी कि कम से कम एक तुममें से जिंदा रहे।”
अनन्या की आँखों में आँसू आ गए।
“तो बाकी दो?”
माँ चुप रहीं।
नैना ने धीरे से पूछा—
“हममें से कौन असली है?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“कोई नहीं।”
फिर अनन्या की तरफ।
“और कोई भी नकली नहीं।”
“तुम तीनों एक ही आत्मा के हिस्से हो।”
अर्णव ने पूछा—
“और आर्या?”
माँ ने कहा—
“आर्या उस आत्मा का वह हिस्सा थी जिसमें सारी यादें थीं।”
अनन्या चौंक गई।
“यादें?”
माँ ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“नैना को चुनाव दिया गया।”
“तुम्हें पहचान।”
“और आर्या को...”
वह रुक गईं।
कबीर ने पूरा किया—
“सारी पुरानी यादें।”
अनन्या ने बच्चे की तरफ देखा।
“तो वह वापस क्यों आया है?”
कबीर ने कहा—
“क्योंकि तुम्हारी यादें उसके बिना अधूरी हैं।”
बच्चा मुस्कुराया।
“और मेरी कहानी तुम्हारे बिना।”
अचानक बच्चा नीचे उतर आया।
वह अनन्या के सामने खड़ा था।
अब वह बच्चा नहीं लग रहा था।
उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।
उसकी उम्र बढ़ती गई।
दस साल...
बारह...
पंद्रह...
अठारह...
और आखिर में...
वह बिल्कुल अनन्या जैसा दिखाई देने लगा।
नैना के मुँह से चीख निकल गई।
“दो अनन्या!”
एक सामने थी।
एक उसके सामने।
दोनों एक जैसी।
लेकिन एक की आँखें सामान्य थीं।
दूसरी की आँखें सुनहरी थीं।
सुनहरी आँखों वाली लड़की ने कहा—
“अब बताओ...”
“असली कौन है?”
अनन्या कुछ बोल नहीं पाई।
दूसरी लड़की उसके पास आई।
“तुम्हें याद है बचपन में माँ तुम्हें क्या कहती थीं?”
अनन्या ने जवाब दिया—
“आर्या।”
लड़की मुस्कुराई।
“गलत।”
“वह मुझे अनन्या कहती थीं।”
“क्योंकि आर्या नाम मुझे दिया गया था।”
अनन्या का चेहरा बदल गया।
“तो... मेरा नाम?”
लड़की ने उसके कान के पास आकर फुसफुसाया—
“तुम्हारा कोई नाम था ही नहीं।”
अचानक अनन्या के पैरों के नीचे की जमीन गायब हो गई।
वह नीचे गिरने लगी।
नैना चिल्लाई—
“दीदी!”
अर्णव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
लेकिन अनन्या का शरीर जैसे किसी अदृश्य ताकत से नीचे खिंच रहा था।
कबीर तुरंत आगे बढ़ा।
“उसे मत छोड़ना!”
अर्णव ने पूरी ताकत लगा दी।
“मैं नहीं छोड़ूँगा!”
अनन्या नीचे खिंचती जा रही थी।
उसकी आँखों के सामने अतीत के दृश्य घूम रहे थे।
माँ।
पिता।
पुराना घर।
तीन बच्चियाँ।
आग।
एक अस्पताल।
फिर...
एक मेज।
उस पर एक किताब।
और किताब के सामने बैठा वही पहला कहानीकार।
उसने एक बच्ची को गोद में उठाया।
“तुम्हारा नाम आर्या होगा।”
दूसरी बच्ची की तरफ देखा।
“तुम नैना।”
फिर तीसरी की तरफ।
वह बच्ची रो रही थी।
उसने पूछा—
“और इसका?”
पहला कहानीकार बोला—
“इसका नाम नहीं होगा।”
माँ ने विरोध किया।
“क्यों?”
“क्योंकि नाम मिलते ही यह स्वतंत्र हो जाएगी।”
माँ डर गईं।
“तो क्या करें?”
कहानीकार ने कहा—
“इसे कहानी में रखो।”
“जब तक यह खुद अपना नाम नहीं चुनती।”
अनन्या की आँखें खुल गईं।
उसने ऊपर देखा।
“मेरा... नाम...”
अर्णव चिल्लाया—
“अनन्या!”
अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
और पूरी ताकत से ऊपर खिंचने लगी।
“नहीं।”
“मेरा नाम किसी ने नहीं दिया।”
उसकी आँखों में सुनहरी रोशनी फैल गई।
“मैंने खुद चुना था।”
काली ताकत कमजोर होने लगी।
“मैं अनन्या हूँ।”
दूसरी लड़की चीख उठी—
“नहीं!”
अनन्या जमीन पर वापस आ गई।
वह कुछ पल तक हाँफती रही।
नैना उसे गले लगाकर रोने लगी।
“दीदी...”
अनन्या ने उसकी पीठ थपथपाई।
“मैं ठीक हूँ।”
लेकिन सामने खड़ी दूसरी लड़की अब गुस्से में थी।
उसकी आँखों की सुनहरी चमक लाल हो गई।
“तुमने अपना नाम खुद चुन लिया?”
अनन्या खड़ी हो गई।
“हाँ।”
“तो अब मैं तुम्हारा नाम छीन लूँगी।”
उसने हाथ उठाया।
अचानक अनन्या की आवाज़ गायब हो गई।
उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था।
नैना घबरा गई।
“दीदी?”
अनन्या बोलने की कोशिश करती रही।
लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
कबीर समझ गया।
“वह उसका नाम मिटा रही है!”
अर्णव ने पूछा—
“कैसे रोकें?”
कबीर ने कहा—
“अनन्या को अपना नाम लिखना होगा।”
“कहाँ?”
“किताब पर।”
अर्णव ने किताब उठाई।
लेकिन पन्ने पर कुछ भी नहीं था।
कबीर ने कहा—
“नहीं।”
“उसे खुद लिखना होगा।”
अनन्या ने किताब की तरफ देखा।
वह आगे बढ़ी।
उसने कलम उठाई।
लेकिन जैसे ही उसने पन्ने पर लिखने की कोशिश की...
दूसरी लड़की ने उसका हाथ रोक लिया।
दोनों आमने-सामने थीं।
“तुम मुझे खत्म नहीं कर सकती।”
अनन्या ने उसकी आँखों में देखा।
उसकी आवाज़ अभी भी गायब थी।
लेकिन उसके चेहरे पर दृढ़ता थी।
उसने अपनी उँगली काटी।
एक बूंद खून पन्ने पर गिरा।
फिर उसने उसी खून से लिखा—
अनन्या।
पूरा कमरा रोशनी से भर गया।
दूसरी लड़की चीख उठी।
“नहीं!”
उसका शरीर टूटने लगा।
लेकिन गायब होने से पहले उसने अनन्या की तरफ देखा और मुस्कुराई।
“तुमने अपना नाम बचा लिया।”
“लेकिन मेरी यादें?”
अनन्या ने पूछा।
दूसरी लड़की ने कहा—
“अब वे तुम्हारी नहीं रहेंगी।”
और वह हवा में घुल गई।
उसी पल अनन्या के दिमाग में हजारों यादें एक साथ प्रवेश कर गईं।
वह दर्द से चीख उठी।
नैना ने उसे पकड़ लिया।
“दीदी!”
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
फिर अचानक...
उसने एक आवाज़ सुनी।
बहुत परिचित।
उसके पिता की।
“अनन्या...”
उसने आँखें खोलीं।
सामने कोई नहीं था।
लेकिन आवाज़ फिर आई—
“मुझ पर भरोसा मत करना।”
अनन्या की आँखें फैल गईं।
कबीर ने पूछा—
“क्या हुआ?”
अनन्या ने धीरे से कहा—
“मेरे पिता...”
“उन्होंने मुझे चेतावनी दी।”
“किस बारे में?”
अनन्या ने किताब की तरफ देखा।
उस पर एक नया वाक्य लिखा जा चुका था—
“पहला कहानीकार मर चुका है।”
उसके नीचे दूसरा वाक्य उभरा—
“लेकिन उसका वारिस जिंदा है।”
नैना ने पूछा—
“कौन?”
किताब का पन्ना अपने आप पलटा।
और वहाँ एक तस्वीर बनी।
एक आदमी की।
अनन्या उसे देखते ही जम गई।
क्योंकि वह चेहरा...
अर्णव का था।
अर्णव ने तस्वीर देखी।
उसके चेहरे पर भी सदमा था।
कबीर पीछे हट गया।
“नहीं...”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“कबीर?”
कबीर ने काँपती आवाज़ में कहा—
“अब समझ आया...”
“क्या?”
उसने अर्णव की तरफ देखा।
“तुम्हें कहानी से क्यों मिटाया गया था।”
अर्णव ने पूछा—
“क्यों?”
कबीर ने जवाब दिया—
“क्योंकि तुम कहानीकार के वारिस हो।”
और उसी क्षण...
अर्णव की आँखों में सुनहरी रोशनी जल उठी।
क्रमशः...