Mr. & Ms. Fake
Episode 42 – The Truth Behind The Silence
“अमन पापा…”
सान्वी की आवाज़ काँप रही थी।
“क्या आपने माँ को मारा था?”
जंगल के बीच खड़े हर इंसान की नजर अमन पर टिक गई।
अमन का चेहरा सफेद पड़ चुका था।
लेकिन उसकी जुबान से एक शब्द तक नहीं निकला।
सान्वी की आँखों में आँसू भरने लगे।
“बोलिए।”
अमन अब भी चुप था।
“विक्रम झूठ बोल रहा है ना?”
अमन ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में दर्द था।
लेकिन जवाब नहीं।
सान्वी ने अपना सिर हिलाया।
“नहीं…”
वह एक कदम पीछे हट गई।
“आपकी ये चुप्पी मुझे डरा रही है।”
आर्यवीर तुरंत उसके पास आया।
“सान्वी…”
“नहीं, आर्यवीर।”
उसने अपना हाथ छुड़ा लिया।
“मुझे जवाब चाहिए।”
विक्रम कुछ दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था।
“देखा?”
“सच कभी-कभी शब्दों से नहीं, खामोशी से सामने आता है।”
आर्यवीर ने उसकी तरफ गुस्से से देखा।
“तुम्हारी बातों पर कोई भरोसा नहीं करेगा।”
विक्रम ने कहा—
“मैंने उससे कुछ नहीं कहा।”
“मैंने सिर्फ सवाल पूछा है।”
फिर उसने अमन की तरफ देखा।
“जवाब तुम देना।”
अमन ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद उसने कहा—
“हाँ।”
सान्वी जैसे वहीं जम गई।
“हाँ…?”
अमन ने भारी आवाज़ में कहा—
“मैं उस रात वहाँ था।”
सान्वी की आँखों से आँसू गिर पड़े।
“तो आपने…”
“नहीं!”
अमन अचानक चिल्लाया।
“मैंने तुम्हारी माँ को नहीं मारा।”
सान्वी ने काँपते हुए पूछा—
“फिर आपने ‘हाँ’ क्यों कहा?”
अमन की आँखें भर आईं।
“क्योंकि सवाल ये नहीं था कि मैंने उसे मारा या नहीं।”
“सवाल था कि मैं उस रात वहाँ था या नहीं।”
सान्वी ने उसे घूरकर देखा।
“तो बताइए।”
अमन ने गहरी साँस ली।
“मैं उस रात तुम्हारी माँ को बचाने गया था।”
“लेकिन जब मैं पहुँचा…”
उसकी आवाज टूट गई।
“घर में आग लग चुकी थी।”
सान्वी की आँखों के सामने अपनी बचपन की वही रात घूम गई।
लपटें…
धुआँ…
माँ की चीख…
और फिर…
एक अजीब-सी परछाईं।
सान्वी ने अचानक अपना सिर पकड़ लिया।
“मुझे कुछ याद आ रहा है…”
आर्यवीर ने तुरंत उसे संभाला।
“क्या?”
“उस रात…”
सान्वी की साँस तेज हो गई।
“माँ मुझे गोद में लेकर भाग रही थीं।”
“फिर उन्होंने मुझे एक कमरे में बंद किया।”
“और बाहर…”
वह रुक गई।
“बाहर कोई आदमी था।”
अमन की आँखें फैल गईं।
“तुम्हें वो आदमी याद है?”
सान्वी ने सिर हिलाया।
“चेहरा नहीं।”
“लेकिन…”
“उसके हाथ में एक अंगूठी थी।”
विक्रम के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
रुद्र ने तुरंत पूछा—
“कैसी अंगूठी?”
सान्वी ने आँखें बंद करके याद करने की कोशिश की।
“काली…”
“उस पर एक साँप बना था।”
रुद्र और राजवीर ने एक-दूसरे को देखा।
अमन ने धीरे से कहा—
“नागमुद्रा।”
आर्यवीर ने पूछा—
“क्या?”
रुद्र ने कहा—
“ये हमारे परिवार की अंगूठी नहीं थी।”
“ये उस संगठन की पहचान थी…”
“जिसने Project S-21 शुरू किया था।”
सान्वी ने तुरंत पूछा—
“वो संगठन कौन था?”
अमन चुप हो गया।
रुद्र ने विक्रम की तरफ देखा।
“उसे पता है।”
सान्वी की नजर विक्रम पर गई।
“आपको पता है?”
विक्रम मुस्कुराया।
“बिल्कुल।”
“तो बताइए।”
“इतनी जल्दी क्या है?”
सान्वी उसके करीब बढ़ी।
“मेरी माँ मर गई।”
“मेरा बचपन छीन लिया गया।”
“मेरी बहनों को मुझसे अलग कर दिया गया।”
“और आप कह रहे हैं जल्दी क्या है?”
उसकी आवाज में पहली बार इतना गुस्सा था कि खुद विक्रम भी कुछ पल चुप हो गया।
सान्वी ने कहा—
“आज मैं हर सच जानकर रहूँगी।”
विक्रम ने धीरे से कहा—
“तो फिर सुनो।”
“उस रात तुम्हारी माँ ने Project S-21 की फाइल चुरा ली थी।”
“वो फाइल लेकर वह भाग रही थी।”
“और उसी रात…”
वह रुका।
“उसने तुम तीनों को अलग-अलग जगह भेज दिया।”
आरोही ने पूछा—
“क्यों?”
विक्रम ने कहा—
“क्योंकि उसे पता था कि अगर तीनों बहनें एक साथ रहीं…”
“तो वो लोग तुम्हें ढूँढ लेंगे।”
नैना ने पूछा—
“कौन लोग?”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें सच में नहीं पता?”
नैना चुप रही।
विक्रम ने कहा—
“तुम्हें लगता है मैं इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी हूँ?”
उसने हल्की हँसी के साथ कहा—
“मैं सिर्फ एक मोहरा हूँ।”
सभी हैरान रह गए।
“मोहरा?”
आर्यवीर ने पूछा।
विक्रम ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“मेरे ऊपर भी कोई है।”
“और वो…”
वह अचानक रुक गया।
उसकी नजर सान्वी की तरफ गई।
“वो तुम्हें ढूँढ रहा है।”
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अमन का सबसे बड़ा राज
अमन अचानक आगे आया।
“बस!”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
अमन ने कहा—
“अब और नहीं।”
“सान्वी को इस खेल से दूर रखो।”
विक्रम हँसा।
“तुम्हें अभी भी लगता है कि तुम उसे बचा सकते हो?”
अमन ने कहा—
“मैंने पच्चीस साल तक उसे बचाया है।”
सान्वी ने उसकी तरफ देखा।
“तो फिर मुझे सबकुछ बताइए।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा।
“ठीक है।”
“लेकिन उसके बाद तुम मुझे कभी माफ नहीं करोगी।”
“फिर भी बताइए।”
अमन ने कहा—
“तुम्हारी माँ की मौत से पहले…”
“उसने मुझे तीनों बच्चियों को अलग करने के लिए कहा था।”
आरोही चौंक गई।
“माँ ने खुद?”
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसे पता चल गया था कि तुम तीनों को ढूँढने के लिए लोग अस्पताल तक पहुँच चुके हैं।”
अमन ने आगे कहा—
“उसने मुझे सान्वी दी।”
“राजवीर ने आरोही को लिया।”
“और…”
उसने नैना की तरफ देखा।
“नैना को रुद्र के एक भरोसेमंद दोस्त के पास भेजा गया।”
नैना की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तो मैं आप लोगों के लिए सिर्फ एक बच्ची थी जिसे छुपाना था?”
अमन ने कहा—
“नहीं।”
“तुम तीनों मेरी जिम्मेदारी थीं।”
“और मैंने अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की कोशिश की।”
सान्वी ने धीरे से पूछा—
“फिर माँ क्यों मरीं?”
अमन की आँखों में दर्द उतर आया।
“क्योंकि वो आखिरी वक्त तक तुम्हें बचाती रहीं।”
“आग किसने लगाई?”
अमन ने जवाब नहीं दिया।
सान्वी ने उसकी तरफ देखा।
“किसने?”
अमन ने आखिरकार विक्रम की तरफ उंगली उठाई।
“वो।”
सबकी नजर विक्रम पर गई।
विक्रम का चेहरा कठोर हो गया।
“झूठ।”
अमन ने कहा—
“तुमने आग लगाई थी।”
“लेकिन तुमने मुझे वहाँ मरने के लिए छोड़ दिया।”
विक्रम ने गुस्से में कहा—
“तुम्हें मारना मेरा मकसद नहीं था।”
“मेरा मकसद फाइल थी।”
“तुम्हारी माँ ने फाइल कहाँ छुपाई थी?”
अमन ने कहा—
“मुझे नहीं पता।”
विक्रम हँसा।
“झूठ!”
“तुम जानते हो।”
अमन चुप रहा।
Saanvi ने पूछा—
“कौन-सी फाइल?”
अमन ने उसकी तरफ देखा।
“वही फाइल…”
“जिसमें तुम्हारे जन्म का पूरा रहस्य है।”
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तीनों निशान
अचानक Saanvi की कलाई पर बना निशान चमक उठा।
“आह!”
उसने अपनी कलाई पकड़ ली।
उसी वक्त Aarohi और Naina के निशान भी चमकने लगे।
तीनों बहनों के बीच जैसे कोई अदृश्य ऊर्जा फैल गई।
हवा तेज हो गई।
पेड़ों की पत्तियाँ जोर-जोर से हिलने लगीं।
आर्यवीर ने सान्वी को पकड़ लिया।
“तुम ठीक हो?”
“मुझे नहीं पता…”
तीनों बहनों ने एक साथ आँखें बंद कर लीं।
और फिर…
उनके सामने जमीन पर एक तस्वीर उभर आई।
एक अस्पताल।
पच्चीस साल पुराना।
एक महिला बिस्तर पर लेटी हुई थी।
उसके पास तीन नवजात बच्चियाँ थीं।
वह उनकी माँ थी।
सान्वी की आँखों से आँसू बहने लगे।
“माँ…”
तस्वीर में माँ कुछ कह रही थी।
आवाज बहुत धीमी थी।
लेकिन इस बार सभी सुन सकते थे।
“मेरी बेटियों को अलग कर दो…”
“लेकिन उन्हें कभी अकेला मत होने देना।”
फिर उसने किसी व्यक्ति की तरफ देखा।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ उसकी कलाई पर…
नागमुद्रा वाली अंगूठी।
सान्वी ने अचानक कहा—
“यही आदमी था!”
विक्रम का चेहरा बदल गया।
“नहीं…”
रुद्र ने उसकी तरफ देखा।
“तुम पहचानते हो।”
विक्रम पीछे हटने लगा।
“मैंने उसे नहीं बुलाया था।”
राजवीर ने पूछा—
“कौन था वो?”
विक्रम चुप।
अमन ने कहा—
“अब बोलो।”
विक्रम की आँखों में पहली बार डर दिखाई दिया।
“वो…”
तभी एक गोली चली।
धाँय!
विक्रम के कंधे से खून निकल आया।
वह जमीन पर गिर पड़ा।
सभी घबरा गए।
आर्यवीर ने तुरंत सान्वी को अपने पीछे कर लिया।
रुद्र ने चारों तरफ देखा।
“स्नाइपर!”
अमन ने चिल्लाकर कहा—
“सब नीचे!”
दूसरी गोली एक पेड़ में लगी।
तीसरी गोली जमीन के पास से निकल गई।
फिर अचानक…
सन्नाटा।
आर्यवीर ने कहा—
“वो भाग गया।”
लेकिन तभी Saanvi की नजर जमीन पर पड़ी।
एक छोटी-सी काली अंगूठी वहाँ पड़ी थी।
उस पर वही निशान था।
नागमुद्रा।
सान्वी ने उसे उठाया।
और जैसे ही उसने अंगूठी को छुआ…
उसके दिमाग में एक आवाज गूँजी।
एक आदमी की आवाज।
“सान्वी…”
उसने डरकर अंगूठी गिरा दी।
Aryveer ने पूछा—
“क्या हुआ?”
सान्वी ने काँपते हुए कहा—
“उसने मेरा नाम लिया।”
“किसने?”
सान्वी ने धीरे से सामने देखा।
“जिसने माँ को मारा था।”
अमन का चेहरा गंभीर हो गया।
“नहीं।”
सान्वी ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
अमन ने कहा—
“अगर अंगूठी तुम्हारे हाथ में आते ही उसने तुम्हारा नाम लिया…”
वह रुक गया।
“तो इसका मतलब…”
“वो आदमी तुम्हें सिर्फ पहचानता नहीं है।”
“वो तुम्हें…”
अमन ने घबराकर कहा—
“जन्म से देख रहा है।”
सान्वी की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
आर्यवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“जो भी है…”
उसने दृढ़ आवाज़ में कहा—
“अब उसे तुम्हारे करीब आने के लिए पहले मुझसे गुजरना होगा।”
सान्वी ने उसकी तरफ देखा।
इस बार उसने अपना हाथ नहीं छुड़ाया।
बल्कि उसकी उंगलियों को और कसकर पकड़ लिया।
लेकिन कुछ दूर खड़ी नैना की नजर उस काली अंगूठी पर थी।
उसका चेहरा अचानक बदल गया।
वह फुसफुसाई—
“ये अंगूठी…”
सान्वी ने पूछा—
“क्या?”
नैना ने धीरे से कहा—
“मेरे पास भी ऐसी ही एक अंगूठी थी।”
आर्यवीर ने चौंककर पूछा—
“क्या?”
नैना ने अपनी जेब से एक पुराना कपड़ा निकाला।
उसमें एक दूसरी अंगूठी लिपटी हुई थी।
उसी तरह की नागमुद्रा।
सान्वी की आँखें फैल गईं।
“तुम्हारे पास ये कब से है?”
नैना ने कहा—
“जब से मुझे होश है।”
फिर उसने अंगूठी को गौर से देखा।
“लेकिन मुझे हमेशा कहा गया था…”
उसकी आवाज काँप गई।
“कि ये मेरी माँ की निशानी है।”
सान्वी ने धीरे से पूछा—
“कौन-सी माँ?”
नैना ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे नहीं पता।”
तभी पीछे खड़े राजवीर ने बहुत धीमी आवाज में कहा—
“मुझे पता है।”
सभी उसकी तरफ मुड़े।
राजवीर की आँखें नम थीं।
“ये अंगूठी…”
वह कुछ पल रुका।
फिर बोला—
“तुम्हारी माँ की नहीं थी।”
“ये उस आदमी की थी…”
“जिसने तुम्हारी माँ को मारा।”
क्रमशः…