Chor Machaye Shor - 2 in Hindi Children Stories by Virendra Dewangan books and stories PDF | चोर मचाये शोर - 2

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चोर मचाये शोर - 2

बब्बू ने ख्वाब में देखा कि बनवाड़ी के झोपड़ी की परछी में कुत्ता ऐसा उछलकूद मचाने लगा, जैसे अजनबियों व चोरों को देख कर संकल से बंधे कुत्ते उछल-कूद मचाया करते हैं।

उसकी भौं-भौं की कानफोड़ू आवाज से साहूकार के दामाद की नींद टूट गई, जो दोपहर का खाना खाकर घासफूस की झोपड़ी में बाग की रखवाली करता हुआ आराम फरमा रहा था। वह उठा और बालकों की उम्मीदों के विपरीत बाहर निकल पड़ा।

उसकी नजर जैसे ही अमवाड़ी पर पड़ी, वह जोरों से चीखा, ‘‘कौन है यहां?’’

इतना सुनना था कि अंदर घुसे चारों लड़के मारे डर के हड़बड़ा गए।

बब्बू व मानू, जो आम तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़े थे, वे यहां-वहां नीचे कूदे और इधर-उधर दौड़ने-भागने लगे।

तभी बब्बू का पैर घांस के झुरमुट में जा फंसा और वह खाद के गड्ढे में जा धंसा।

पेड़ से गिरते ही उसके मुख से जोरों की चीख निकल गई, ‘‘ऊई मां’’-जो शासकीय जिला अस्पताल के आइसीयू वार्ड के बेड नंबर पांच पर जोरों से गूंजी।

चीख सुनकर मनमोहन व शिवांगी, मनमोहन की दीदी सरस्वती व जीजा प्रेमशंकर दौड़े-दौड़े उसके पास पहुंचे, जो अस्पताल के बरामदे में बाकी बच्चों से कल की घटना के बारे में बारीकी से मालूमात कर रहे थे।

बब्बू, जो बनैला पंचायत के सरपंच शिवांगी का इकलौता बेटा था, वह अपने-आपको गौर से देखा, तो अस्पताल के बेड में बेंडेज लगा हुआ पाया।

वह जब अपने मम्मी-पापा व बुआ-फूफा को अपने करीब देखा, तो उसकी जान में आया।

उसकी मम्मी-शिवांगी उसके सिर पर हाथ रखकर पूछी,‘‘अब कैसा लग रहा है बब्बू?’’

बब्बू संतोषजनक सिर हिलाया, जिसका आशय था,‘‘चंगा हूं मैं।’’

अब, उसे समझते देर न लगी कि कल वह साहूकार के अमवाड़ी के गड्ढे में किस कदर गिरा था कि उसके पैरों में मोच आ गई थी और आज वह अस्पताल में पड़ा हुआ है।

उसे होश आता देखकर पास में ही खड़ा साहूकार ताना मारा,‘‘क्यों रे बछुआ! आम चोरी करने का शौक रखते हो, पर बचाव का तरीका नहीं जानते?’’

अब बब्बू बोले, तो क्या बोले? अमवाड़ी में घुसकर गलती जो कर चुका था वह।

वह खामोशी ओढ़ लिया। बाकी बच्चों की ओर गौर से देखा, तो उनकी हालत भी पतली नजर आ रही थी। वे सभी डरे-सहमे से थे।

वहां सबके पालक पहुंच चुके थे और अपने-अपने लाडलों व लाडलियों का कान उमेठकर डपट रहे थे कि आम की चोरी करने की क्या जरूरत थी? जितना बोलते, बाजार से खरीद कर या जंगल से तोड़कर ला देते।

साहूकार तुम्हें पुलिस के हवाले करेंगे, तो समझ में आएगा कि चोरी करने की सजा क्या होती है? पुलिस अभी आनेवाली है। साहूकार ने पुलिस को फोन लगा दिया है। पुलिस आएगी और उनको ले जाकर कुटाई करेगी।

यह सुनकर पारूल और बबीता सुबकने लगीं और लड़कों को दोषी ठहराने लगीं कि ये डंगाल को जोरों से नहीं खींच़ते, तो हमारी चोरी पकड़ी न जाती।

बच्चों की मनोदशा भांपकर साहूकार बोला, ‘‘इसके लिए तुम सबको भरपूर सजा मिलेगी।’’

इतना सुनना था कि सब बच्चे फिर सुबक-सुबक कर रोने लग़ गए।

साहूकार ने फिर धमकी भरे लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें कालकोठरी में डाला जाएगा और कैदियों की तरह पीटा जाएगा।’’

इस पर पारूल और बबीता साहूकार के पैर पकड़ लीं, ‘‘हमे माफ कर दो काका। हमसे भारी भूल हो गई। हम आगे से ऐसी बदमाशियां नहीं करेंगे।’’

‘‘माफ कर दंू! क्यों करूं माफ? चोरी की है, तो सजा भुगतनी पड़ेगी!’’ अब की बार साहूकार के स्वर में दृढ़ता के साथ जरा नरमी नजर आ थी।

इतना सुनना था कि बच्चे अपने-अपने माता-पिता से लिपट गए और फफक-फफक कर रो पड़े। अस्पताल में कोहराम मच गया।

‘‘लेकिन सजा क्या है? यह भी तो जानो।’’ साहूकार ने रोना-धोना बढ़ता देखकर खुलासा किया,‘‘तुम सभी बच्चे सजा के तौर पर आज के बाद रोज मेरे अमवाड़ी में जाओगे और आम तोड़कर खाओगे।’’

उलटी पहेली मासूम बच्चों की बालबुद्धि में नहीं समाया, तो वे अचरज से साहूकार को देखने लगे, गोया उन्हें कोई अनोखी पहेली बूझनी रह गई हो।

सब को चकित होता देख कर साहूकार ने अपने कथन का खुलासा किया,‘‘आज के बाद आम भी खाओगे और अमवाड़ी की साफ-सफाई में हाथ भी बटाओगे। साथ ही, पेड़-पौधों की देखभाल भी करोगे। मैं ठहरा अकेला आदमी। मेरे बेटी-दामाद हैं, पर वे दूर गांव में रहते हैं। अभी दामाद आया है, इसीलिए वह रखवाली के लिए अमवाड़ी चला गया था। मैं यह सब नहीं कर पाता। दो-दो नौकर हैं। पर, वे भी अन्य कामों में लगे रहते हैं।’’

‘‘सच काका!’’ बच्चों के मुख से एक साथ हैरत से निकल पड़ा।

उनके मासूमियत भरे चेहरों पर खुशी के भाव आने-जाने लगे और वे दौड़कर साहूकार से लिपट गए।

साहूकार ने सबके सिर पर बारी-बारी से स्नेह का हाथ फेरा, ‘‘अब तक मेरी अमवाड़ी सुनी पड़ी थी बच्चों! कोई नहीं जाता था वहां। तुम्हारे कलरव ने उसे आबाद कर दिया है। अब उसी शोर से उसे फिर से गूंजित कर दो।’’

इसके बाद गरमी की छुट्टी भर रोज बच्चे अमवाड़ी जाने लगे।

स्कूल खुलने के बाद भी यही सिलसिला जारी रहा। जिस दिन छुट्टी होती थी, वे विवेक व विजय को लेकर अमवाड़ी पहुंच जाते थे, जो छुट्टियों में अपने मामा के घर गए हुए थे और ‘आपरेशन मैंगो’ में शुमार नहीं थे।

वे सब नौकर के साथ मिलकर अमवाड़ी को स्वेच्छा से खूबसूरत बनाते थे। उसके झाड़-झंकाड़ उसी तरह उखाड़ा करते थे, जैसे घरबाड़ी या घर की खेती में ये बच्चे काम किया करते हैं।

सिंचाई, निंदाई, गुड़ाई करने में भी वे नौकर का हाथ दिल से बंटाते थे। फिर मौसम के मुताबिक पके ताजे फलों का मजा लेते थे। अब, उनके पास न आम-जाम की कमी रह गई थी, न टाइम पास करने की।

इससे जहां बनैला गांव के आबोहवा की रक्षा हो रही थी; बच्चे मेहनती बन रहे थे; वहीं वे तंदुरुस्त भी दिखने लगे थे।

लेकिन, अफसोस बनैला के सरपंच के इकलौते पुत्र बब्बू का अपहरण एक दिन आखिर किसने कर लिया कि इलाकेभर में कोहराम मच गया। जानने के लिए पढ़ते रहिए रोचक धारावाहिक-‘‘आतंकी साये में पंचायतें’’।

दो भागों में प्रकाशित बालकहानी समाप्त।