"सौतेली माँ कभी किसी की अपनी नहीं हो सकती, रोहन... वो सिर्फ तुम्हारे पापा के पैसे और इस घर पर कब्ज़ा करने आई है!"
पड़ोस वाली चाची के ये शब्द नौ साल के रोहन के दिमाग में किसी जहरीले तीर की तरह बिंध गए थे।
अपनी सगी माँ को खोए रोहन को अभी एक साल ही बीता था। उस खालीपन ने उसके मासूम दिल को एक सख्त पत्थर बना दिया था। जब पिता राकेश ने अपनी तन्हाई और रोहन के अकेलेपन को दूर करने के लिए सुनीता से शादी की, तो रोहन ने अपने चारों तरफ नफरत और डर की एक ऊंची दीवार खड़ी कर ली।
शादी के बाद जब सुनीता पहली बार उस घर की देहलीज़ पार करके आई, तो उसके चेहरे पर एक सहमी हुई मुस्कान थी। वह जानती थी कि इस घर में कदम रखना आसान नहीं है, खासकर रोहन के दिल में जगह बनाना। रोहन ने सुनीता की तरफ देखा भी नहीं और धाड़ से अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया।
"रोहन बेटा! देखो मैं तुम्हारे लिए क्या लाई हूँ," सुनीता ने बड़े प्यार से कमरे का दरवाजा खटखटाते हुए कहा। उसने प्लेट में गरम-गरम समोसे और जलेबी सजा रखी थी—वही जो रोहन को सबसे ज्यादा पसंद थे।
लेकिन कमरे के अंदर से सिर्फ खामोशी आई। रोहन बिस्तर पर मुंह ढक कर पड़ा रहा। उसके मन में रह-रहकर चाची की बातें गूंज रही थीं—'यह औरत दिखावा कर रही है, असलियत जल्द ही सामने आएगी।'
दिन बीतते गए। सुनीता ने कभी रोहन के रूखे व्यवहार का बुरा नहीं माना। वह सुबह 6 बजे उठकर रोहन के स्कूल का टिफिन तैयार करती, उसकी यूनिफॉर्म प्रेस करती और उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखती। वह चाहती तो रोहन पर अपना हक जता सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वह बस एक खामोश साये की तरह रोहन की देखभाल करती रही।
एक दिन रोहन के स्कूल में पेरेंट्स-टीचर मीटिंग (PTM) थी। रोहन नहीं चाहता था कि सुनीता उसके स्कूल आए। उसने जानबूझकर सुनीता को गलत समय बता दिया। जब सुनीता सही समय पर स्कूल नहीं पहुंच सकी, तो रोहन की टीचर ने सबके सामने रोहन को डांट दिया।
रोहन को लगा कि आज तो घर पर हंगामा होगा। जब वह शाम को घर लौटा, तो सुनीता दरवाजे पर ही उसका इंतजार कर रही थी।
"मुझे माफ कर देना रोहन," सुनीता ने रोहन के आगे घुटने के बल बैठते हुए कहा, उसकी आंखों में अपराधबोध के आंसू थे, "मुझे थोड़ा और ध्यान रखना चाहिए था। मेरी वजह से तुम्हें टीचर से डांट सुननी पड़ी।"
रोहन हैरत से सुनीता को देखता रह गया। गलती उसकी खुद की थी, लेकिन माफी सुनीता मांग रही थी। रोहन का दिल पहली बार थोड़ा सा पिघला, लेकिन उसके अंदर छुपा डर अब भी खत्म नहीं हुआ था।
फिर आई वह भयानक तूफानी रात, जिसने सब कुछ बदलकर रख दिया।
राकेश ऑफिस के काम से शहर से बाहर गए हुए थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और बिजली कड़क रही थी। आधी रात को रोहन को अचानक बहुत तेज ठंड लगने लगी और उसका शरीर तपने लगा। उसे 104 डिग्री तेज बुखार था। रोहन दर्द से कराहने लगा।
सुनीता की नींद खुली तो वह तुरंत रोहन के कमरे की तरफ भागी। रोहन को इस हालत में देखकर सुनीता के हाथ-पांव फूल गए। राकेश का फोन बंद आ रहा था। बाहर कोई गाड़ी या ऑटो मिलने की दूर-दूर तक उम्मीद नहीं थी।
"कुछ नहीं होगा मेरे बच्चे को, मैं कुछ नहीं होने दूंगी," सुनीता ने खुद से कहा।
उसने बिना एक पल गंवाए रोहन को अपनी पीठ पर लादा और उसी मुसलाधार बारिश में नंगे पांव सड़क पर दौड़ पड़ी। बारिश की तेज बौछारें सुनीता के चेहरे पर पड़ रही थीं, लेकिन उसका पूरा ध्यान सिर्फ रोहन की सांसों पर था। रास्ते में कई बार सुनीता का पैर फिसला, उसके घुटने छिल गए और खून निकलने लगा, लेकिन उसने रोहन की पकड़ ढीली नहीं होने दी।
लगभग दो किलोमीटर पैदल दौड़ने के बाद वह रोहन को लेकर पास के एक प्राइवेट अस्पताल पहुंची।
पूरी रात सुनीता अस्पताल के ICU के बाहर गैलरी में टहलती रही। उसने एक घूंट पानी तक नहीं पिया। वह लगातार हाथ जोड़कर ईश्वर से रोहन की सलामती की भीख मांगती रही। डॉक्टरों ने जब रोहन को ड्रिप चढ़ाई और बुखार थोड़ा कम हुआ, तब जाकर सुनीता को थोड़ी राहत मिली।
सुबह के 5 बज रहे थे। रोहन की धीरे-धीरे आंखें खुलीं।
उसने देखा कि सुनीता उसके बेड के पास ही कुर्सी पर बैठी हुई थी। उसकी साड़ी बारिश के पानी से पूरी तरह भीगी हुई थी, घुटनों से खून रिस रहा था और आंखों के नीचे चिंता के काले घेरे बन चुके थे। सुनीता का हाथ रोहन के माथे पर था और वह हल्की झपकी ले रही थी।
रोहन ने जब सुनीता के छिले हुए हाथों को देखा, तो उसके दिल की दीवार पल भर में ढह गई। उसे समझ आ गया कि माँ सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, माँ तो वह होती है जो औलाद के लिए अपनी जान की बाजी लगा दे।
रोहन ने धीरे से सुनीता की उंगलियों को दबाया। सुनीता की आंख तुरंत खुल गई।
"रोहन! तुम ठीक हो बेटा? दर्द तो नहीं हो रहा?" सुनीता ने बदहवास होकर पूछा।
रोहन की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। उसने अपनी नन्हीं बांहों को सुनीता के गले में डाल दिया और रोते हुए पहली बार कहा, "मुझे माफ कर दो... माँ!"
'माँ' शब्द सुनते ही सुनीता का पूरा शरीर कांप उठा। उसकी मेहनत, उसकी तपस्या और उसका सब्र आज पूरा हो गया था। उसने रोहन को छाती से भींच लिया। अस्पताल का वह कमरा दो इंसानों के नहीं, बल्कि एक सच्चे माँ-बेटे के मिलन का साक्षी बन रहा था।
(क्या रोहन और सुनीता का यह रिश्ता हमेशा के लिए ऐसा ही हंसता-खेलता रहेगा? या राकेश के वापस आने पर समाज के तानों से इस नए रिश्ते पर फिर कोई आंच आएगी? जानिए अगले भाग में...)
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(अगला भाग जल्द ही आ रहा है!)